देवपूजा-विधान
श्रीहरि कहने लगे – हे रुद्राक्ष! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली रुद्राक्ष की पूजा का मैं वर्णन करता हूँ। ग्रहदेवताएँ, आसन की पूजा का विधान निम्न है:
- ॐ नमः सूर्याय।
- ॐ नमः सोमाय नमः।
- ॐ नमः भौमाय नमः।
- ॐ नमः बुधाय नमः।
- ॐ नमः बृहस्पतये नमः।
- ॐ नमः शुक्राय नमः।
- ॐ नमः शनैश्चराय नमः।
- ॐ नमः राहवे नमः।
- ॐ नमः केतवे नमः।
- ॐ नमः तेभ्यश्चाद्यो नमः।
इन्हीं मन्त्रों से आवाहन, स्थापन, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा और विसर्जन आदि उपचारों की प्रदान पूर्वक सूर्यादि ग्रहों की पूजा करनी चाहिए।
- ॐ नमः शिवाय मन्त्र से आसन की पूजा कर शिवाधिष्ठित शिव मन्त्र से नैवेद्य कर और सात्विक शिवलिङ्ग से शिव मन्त्र से हृदय को ह्रं और शिर को ह्रं हृदयाय नमः से और नेत्र को ह्रं शिरसे स्वाहा से कवच को ह्रं कवचाय हूँ से तथा नेत्राभ्यां वौषट् से अस्त्र को ह्रं अस्त्राय फत् से। इन्हीं मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिए।
- ॐ नमः हं से हृदयाय नमः।
- ॐ नमः सों से शिरसे स्वाहा।
- ॐ नमः हं से शिखायै वषट्।
- ॐ नमः सों से कवचाय हूँ।
- ॐ नमः हं से नेत्राभ्यां वौषट्।
- ॐ नमः सों से अस्त्राय फत्।
- ॐ नमः ईशानाय नमः। ॐ नमः ईश्वराय नमः।
इन मन्त्रों के सिवाय पंचमुखी को भी पूजा करनी चाहिए।
इसी प्रकार विष्णुपूजाम् से विष्णूद्देवाय नमः मन्त्र से भगवान् विष्णु की आसन की पूजा कर और ॐ नमः वासुदेवाय नमः। ॐ नमः वासुदेवाय तुभ्यं नमः। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः। ॐ नमः भगवते सङ्कर्षणाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः भगवते अनिरुद्धाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः प्रद्युम्नाय नमः। ॐ। ॐ। ॐ। ॐ। ॐ नमः भगवते। ॐ नमः। ॐ। ॐ।
इन मन्त्रों द्वारा सम्पर्क (स्पर्श) पूर्वक रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए।
- ॐ हं ॐ नारायणाय नमः। ॐ तत्तत्।
- ॐ ह्रीं ॐ विष्णवे नमः। ॐ ह्रीं ॐ भगवते नारसिंहाय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ खं खे रं रुद्राय नमः। ॐ ह्रीं ॐ खं खे रं रुद्राय खे ह्रीं खं गदायै नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ हं सं खं तं पं हं पाञ्चजन्याय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ हं सं पं सं पुष्कर हं नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं पं सं वनासराय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं गुरू ॐ नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं कौस्तुभाय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं मुकुटायै नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं इन्दिरायै नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं वैकुण्ठाय नमः।
इन मन्त्रों से भगवान् श्रीहरि के अवतारों और आभूषणों आदि का पूजा उपचारों आदि का प्रदान करना चाहिए।
श्रीहरि कहने लगे – हे रुद्राक्ष! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली रुद्राक्ष की पूजा का मैं वर्णन करता हूँ। ग्रहदेवताएँ, आसन की पूजा का विधान निम्न है:
- ॐ नमः सूर्याय।
- ॐ नमः सोमाय नमः।
- ॐ नमः भौमाय नमः।
- ॐ नमः बुधाय नमः।
- ॐ नमः बृहस्पतये नमः।
- ॐ नमः शुक्राय नमः।
- ॐ नमः शनैश्चराय नमः।
- ॐ नमः राहवे नमः।
- ॐ नमः केतवे नमः।
- ॐ नमः तेभ्यश्चाद्यो नमः।
इन्हीं मन्त्रों से आवाहन, स्थापन, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा और विसर्जन आदि उपचारों की प्रदान पूर्वक सूर्यादि ग्रहों की पूजा करनी चाहिए।
- ॐ नमः शिवाय मन्त्र से आसन की पूजा कर शिवाधिष्ठित शिव मन्त्र से नैवेद्य कर और सात्विक शिवलिङ्ग से शिव मन्त्र से हृदय को ह्रं और शिर को ह्रं हृदयाय नमः से और नेत्र को ह्रं शिरसे स्वाहा से कवच को ह्रं कवचाय हूँ से तथा नेत्राभ्यां वौषट् से अस्त्र को ह्रं अस्त्राय फत् से। इन्हीं मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिए।
- ॐ नमः हं से हृदयाय नमः।
- ॐ नमः सों से शिरसे स्वाहा।
- ॐ नमः हं से शिखायै वषट्।
- ॐ नमः सों से कवचाय हूँ।
- ॐ नमः हं से नेत्राभ्यां वौषट्।
- ॐ नमः सों से अस्त्राय फत्।
- ॐ नमः ईशानाय नमः। ॐ नमः ईश्वराय नमः।
इन मन्त्रों के सिवाय पंचमुखी को भी पूजा करनी चाहिए।
इसी प्रकार विष्णुपूजाम् से विष्णूद्देवाय नमः मन्त्र से भगवान् विष्णु की आसन की पूजा कर और ॐ नमः वासुदेवाय नमः। ॐ नमः वासुदेवाय तुभ्यं नमः। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः। ॐ नमः भगवते सङ्कर्षणाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः भगवते अनिरुद्धाय नमः। ॐ नमः। ॐ नमः प्रद्युम्नाय नमः। ॐ। ॐ। ॐ। ॐ। ॐ नमः भगवते। ॐ नमः। ॐ। ॐ।
इन मन्त्रों द्वारा सम्पर्क (स्पर्श) पूर्वक रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए।
- ॐ हं ॐ नारायणाय नमः। ॐ तत्तत्।
- ॐ ह्रीं ॐ विष्णवे नमः। ॐ ह्रीं ॐ भगवते नारसिंहाय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ खं खे रं रुद्राय नमः। ॐ ह्रीं ॐ खं खे रं रुद्राय खे ह्रीं खं गदायै नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ हं सं खं तं पं हं पाञ्चजन्याय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ हं सं पं सं पुष्कर हं नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं पं सं वनासराय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं गुरू ॐ नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं कौस्तुभाय नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं मुकुटायै नमः। ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं इन्दिरायै नमः।
- ॐ ह्रीं ॐ सं सं सं वैकुण्ठाय नमः।
इन मन्त्रों से भगवान् श्रीहरि के अवतारों और आभूषणों आदि का पूजा उपचारों आदि का प्रदान करना चाहिए।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: देवपूजा-विधान