सर्पों के विष निवारण के उपाय तथा दुष्ट-उपद्रवों को दूर करने के मंत्र (प्राणिविद्या)
ध्यान दें की यहाँ दी गई जानकारी पुरातन समय मे काम आने वाली जानकारी है और इसके इस्तेमाल सामान्य इंसान द्वारा करने से विष निवारण होने की कोई घोषणा हम नहीं कर रहे हैं। यह सिर्फ पाठन हेतु है और किसी भी प्रकार के चिकित्सा की जानकारी नहीं है।
सूतजी बोले – हे मुनिवरो! अब मैं शिवजी द्वारा गरुड़ को दिए गए प्राणेय महामंत्र का वर्णन करूँगा, जिससे सर्पदंश का विष नष्ट हो जाता है।
सर्प के दंश से मनुष्य असुर के समान हो जाता है। विष के दोषों को मुक्त करने के लिए उपाय दिए गए हैं।
- पवन, पर्वत, कुण्ड और वृक्ष के कोटर – इन स्थानों में स्थित सर्पों के दंश से विष दूर हो जाता है।
- तिथी और अश्वलेखा, मग और आश्लेषा नक्षत्रों में सर्पों का दंश निष्फल होता है।
विष का निवारण: जलादि सर्पों का विष हृदय, पेट, कंठ, गला, स्थान, मस्तक और कटि (कमर) में स्थित होता है, उसे काटने पर प्राणी जीवित नहीं रहता।
सूर्योदय के बाद प्रथम प्रहर और अश्विनी नक्षत्र के योग में सर्पदंश से उत्पन्न विष का निवारण होता है।
सर्पों के कुल (परिवार) और नागों के नाम:
- अनन्तः
- तक्षक
- वासुकि
- कुलिक
- शंख
- शंखपाल
- पद्म
- महापद्म
- शंखनाभ
- धृतराष्ट्र
मृत्युञ्जय-मंत्र जप की महिमा
सूतजी ने कहा – अब मैं मृत्युञ्जय–पूजा का वर्णन करूँगा, जिसे कश्यप ऋषि ने कहा था। यह सर्वदेव पूज्य, वेदमय और सर्व सिद्धि प्रदायक है।
मृत्युञ्जय–मंत्र: ॐ जूं सः
- ‘जूं’ (जूं) का उच्चारण उत्तम है।
- ‘सः’ का उच्चारण कल्याणकारी है।
यह मंत्र मृत्यु और दारिद्र्य को दूर करनेवाला है।
इस मंत्र के जप से पाप नष्ट होते हैं, धन और आयुष्य की प्राप्ति होती है, तथा मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
ध्यान दें की यहाँ दी गई जानकारी पुरातन समय मे काम आने वाली जानकारी है और इसके इस्तेमाल सामान्य इंसान द्वारा करने से विष निवारण होने की कोई घोषणा हम नहीं कर रहे हैं। यह सिर्फ पाठन हेतु है और किसी भी प्रकार के चिकित्सा की जानकारी नहीं है।
सूतजी बोले – हे मुनिवरो! अब मैं शिवजी द्वारा गरुड़ को दिए गए प्राणेय महामंत्र का वर्णन करूँगा, जिससे सर्पदंश का विष नष्ट हो जाता है।
सर्प के दंश से मनुष्य असुर के समान हो जाता है। विष के दोषों को मुक्त करने के लिए उपाय दिए गए हैं।
- पवन, पर्वत, कुण्ड और वृक्ष के कोटर – इन स्थानों में स्थित सर्पों के दंश से विष दूर हो जाता है।
- तिथी और अश्वलेखा, मग और आश्लेषा नक्षत्रों में सर्पों का दंश निष्फल होता है।
विष का निवारण: जलादि सर्पों का विष हृदय, पेट, कंठ, गला, स्थान, मस्तक और कटि (कमर) में स्थित होता है, उसे काटने पर प्राणी जीवित नहीं रहता।
सूर्योदय के बाद प्रथम प्रहर और अश्विनी नक्षत्र के योग में सर्पदंश से उत्पन्न विष का निवारण होता है।
सर्पों के कुल (परिवार) और नागों के नाम:
- अनन्तः
- तक्षक
- वासुकि
- कुलिक
- शंख
- शंखपाल
- पद्म
- महापद्म
- शंखनाभ
- धृतराष्ट्र
मृत्युञ्जय-मंत्र जप की महिमा
सूतजी ने कहा – अब मैं मृत्युञ्जय–पूजा का वर्णन करूँगा, जिसे कश्यप ऋषि ने कहा था। यह सर्वदेव पूज्य, वेदमय और सर्व सिद्धि प्रदायक है।
मृत्युञ्जय–मंत्र: ॐ जूं सः
- ‘जूं’ (जूं) का उच्चारण उत्तम है।
- ‘सः’ का उच्चारण कल्याणकारी है।
यह मंत्र मृत्यु और दारिद्र्य को दूर करनेवाला है।
इस मंत्र के जप से पाप नष्ट होते हैं, धन और आयुष्य की प्राप्ति होती है, तथा मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: प्राणिविद्या