पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि

सूतजी ने कहा – हे ऋषियो! अब मैं पञ्चमुख शिव की पूजा का वर्णन करूँगा, जो साधक को भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। साधक को सबसे पहले निम्न मन्त्र से उन देव का आवाहन करना चाहिये-

‘ॐ भूर्भुवः स्वः आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्तये स्वाहा’।

पुनः ‘ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः।’ कहकर साधक सद्योजात का आवाहन करे। इन सद्योजात की आठ कलाएँ कही गयी हैं। उनका नाम सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति है। सद्योजात की पूजा करने के पश्चात् ‘ॐ सिद्धये नमः’ इत्यादि मन्त्रों से उन सभी आठ कलाओं की पूजा करने का विधान है। तदनन्तर ‘ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः’ इस मन्त्र से साधक वामदेव की पूजा करे। वामदेव की तेरह कलाएँ हैं, जिन्हें रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कामिनी, कला, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओं के अतिरिक्त मनोन्मनी, अघोरा, घोरा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया तथा भयरूपा नाम की आठ कलाएँ (अघोर की) हैं।

उक्त समस्त कलाओं का पूजन करने के बाद साधक को ‘ॐ ह्रीं तत्पुरुषाय नमः’ इस मन्त्र से तत्पुरुष देव की पूजा करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और सम्पूर्णा – ये पाँच कलाएँ हैं। साधक कलाओं की पूजा करके ‘ॐ ह्रीं ईशानाय नमः’ इस मन्त्र से ईशान देव की पूजा करे। तत्पश्चात् ईशान देव की निश्चला, निरञ्जना, शशिवी, अंगदा, मरीचि और ज्वालिनी नाम की जो छः कलाएँ हैं, उनकी पूजा करके पूजन पूर्ण करे।

सूतजी ने पुनः कहा – हे ऋषियो! अब मैं शिव की अर्चना का वर्णन करूँगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करने वाली है। बारह अंगुल के माप में बिन्दुमद्रा (किसी पात्र में) भगवान् शिव की मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, सर्वगत और निराकार का चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुद्वारा बनानी गयी मूर्ति में कर की और पाँच बिन्दु लगाने चाहिये, जो शिव का मुख है। वह छोटे आकार में होना चाहिये और नीचे की ओर मुक्ति के अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े-बड़े अङ्ग बनाने चाहिये। मूर्ति के अधोभाग में छोटा बिन्दु विसर्ग के साथ होना चाहिये, जो अचल है। इसके साथ ‘ह्रीं’ लिख देना चाहिये – यह महामन्त्र है और सम्पूर्ण अर्थों को देने वाला है। साधक मुक्ति के ऊर्ध्वभाग से लेकर मूर्ति के चरण पर्यन्त अपने दोनों हाथों से स्पर्श करे और महामुद्रा दिखाये; इसके बाद सम्पूर्ण अङ्गों में न्यास-करन्यास आदि करे।

तदनन्तर वह अस्त्रमन्त्र ‘ॐ फट्’ का उच्चारण करता हुआ दाहिनी हथेली से स्पर्श करके शोधन करे। उसके बाद कनिष्ठा अँगुली से लेकर महामन्त्र से ही तर्जनी अँगुली तक न्यास करना चाहिये।

अब मैं हृदय-कमल की कर्णिका में पूजन की विधि बतलाऊँगा। उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादि की अर्चना करे। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान अर्पित करे तथा अन्य विविध मानस उपचारों को करके तदाकार हो जाय। उसके बाद अग्नि में आहुति देने की विधि कह रहा हूँ। साधक को पूजा-स्थल पर अग्नि प्रज्वलित करने के लिये ‘ॐ फट्’ अस्त्रमन्त्र से एक कुण्ड का निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् ‘ॐ हूं’ इस मन्त्रमन्त्र से उस कुण्ड का अभ्युक्षण करके मानसरूप से उसमें शक्ति का विन्यास करे। उसके बाद साधक को हृदय अथवा शक्ति कुण्ड में क्रमशः ज्ञानाग्नी तेज तथा अग्नि का विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्नि के निष्कृति-संस्कारों को छोड़कर गर्भाधानादि समस्त संस्कार करने का विधान है। निष्कृति या मोक्ष-संस्कार आहुति के पश्चात् किया जाता है। इसलिये आहुति के पूर्व उस संस्कार का निषेध है। समस्त संस्कारों के बाद साधक को उस प्रज्वलित अग्नि में समस्त आदिदेवों के साथ मानसरूप से शिव की आहुति देनी चाहिये।

तदनन्तर कमलतन्तु से गर्भवाले उस मण्डल में गेरूस्वरूप शिव का पूजन करना चाहिये। इस मण्डल के त्रिकोण में अर्धचन्द्राकार कल्याणकारी एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये।

तदनन्तर अग्निदेवता के अस्त्रों से युक्त हृदयों वाले न्यास करने का विधान है। उसके बाद मण्डल के अन्तर्गत बने हुए कमल की कर्णिका पर सदाशिव की तथा दिशाओं में अस्त्र की पूजा करे।

अब श्रेष्ठ पञ्चतत्त्वों में स्थित पृथ्वी, जल आदि तत्त्वों की दोष बतलायी जाती है। इन दोनों शक्तियों के लिये पृथक्-पृथक् रूप से सौ-सौ आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिये। तत्पश्चात् साधक पूर्णाहुति देकर प्रस्तरात्पूर्वक त्रिशूली भगवान् शिव का ध्यान करे।

उसके बाद प्रायश्चित्त-शुद्धि के लिये आठ बार आहुति देनी चाहिये। यह आहुति अस्त्र-बीज ‘हुं फट्’ मन्त्र से प्रदान करने का विधान है। इस प्रकार संस्कार से शुद्ध हुआ वह साधक निःसन्देह शिव-स्वरूप हो जाता है।

शिव की विशेष पूजा में साधक को चाहिये कि वह प्रथम- ‘ॐ ह्रीं आत्मतत्त्वाय स्वाहा’, ‘ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा’ तथा ‘ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा’ – ऐसा उच्चारण करके आचमन करे। तत्पश्चात् उसे मानसिक रूप से कर्मेन्द्रियों का स्पर्श करना चाहिये। उसके बाद भस्म-धारण और तर्पण आदि क्रियाओं को सम्पन्न करना चाहिये। ‘ॐ ह्रां प्रपितामहेभ्यः स्वधा’, ‘ॐ ह्रां मातामहेभ्यः स्वधा’ और ‘ॐ ह्रां नमः सर्वभूतेभ्यः स्वधा’ इन मन्त्रों से तर्पण करे। इसी रीति से पिता, पितामह, प्रपितामह तथा वृद्धप्रमातामह आदि का भी तर्पण करे और फिर प्राणायाम करना चाहिये।

इसके बाद आचमन तथा मार्जन करके साधक को शिव के गायत्रीमन्त्र का जप करना चाहिये। वह मन्त्र इस प्रकार है-

‘ॐ ह्रां तत् महेशाय विद्महे, वाग्विशुद्धाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्’।

अर्थात् प्रणव से युक्त ‘ह्रां’ बीजाक्षर से सम्पन्न उन महेश्वर का हम सभी चिन्तन करते हैं। वाणी की पवित्रता के लिये उनका हम ध्यान करते हैं। वे रुद्र हम सभी को सन्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरणा प्रदान करें।

शिव-गायत्रीमन्त्र-जप के पश्चात् सूर्योपासना करके सूर्य-मन्त्रों से सूर्य का शिव की पूजा करनी चाहिये। उन मन्त्रों का स्वरूप इस प्रकार है-

‘ॐ ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रः शिवसूर्याय नमः।’ ‘ॐ हें खखोल्काय सूर्यमूर्तये नमः।’ ‘ॐ ह्रीं सूं सः सूर्याय नमः।’

  • इस पूजा के बाद क्रमशः नाम के आदि और अन्त में ‘ॐ नमः’ शब्द का प्रयोग करके दण्डी तथा पिङ्गल आदि भूतनायकों का स्मरण करे। तदनन्तर आदि आदि कोणों में ‘ॐ विमलायै नमः, ॐ ईशानायै नमः’ – आदि मन्त्रों से क्रमशः विल्वशा और ईशानादि शक्तियों की स्थापना करके पूजा करनी चाहिये। ऐसा करने से उपासक को परम सुख की प्राप्ति होती है। [इन शक्तियों की पूजा के लिये पृथक्-पृथक् बीजमन्त्र निर्दिष्ट हैं।] यथा-

‘ॐ रां पद्मायै नमः’ (अग्निकोण में), ‘रीं दीप्तायै नमः’ (नैर्ऋत्यकोण में), ‘रुं सूक्ष्मायै नमः’ (वायव्यकोण में), ‘रें जयायै नमः’ (ईशानकोण में), ‘रें भद्रायै नमः’ (पूर्व दिशा में), ‘रें विभूत्यै नमः’ (दक्षिण दिशा में), ‘रौं विमलायै नमः’ (पश्चिम दिशा में), ‘रं अमोघविक्रायै नमः’, ‘* विद्युतायै नमः’ (उत्तर दिशा में) और ‘रं सर्वतो मुख्यै नमः’ (मण्डल के मध्य में)।

इसके बाद शिवस्वरूप सूर्यदेवता की मूर्ति में प्रदान करके ‘हुं (हूं हूं)’ इस मन्त्र से भगवान् सूर्य की अर्चना करे और फिर निम्न मन्त्रों से न्यास करे-

‘ॐ आं हृद्बीजाय नमः’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिरसे स्वाहा’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिखायै वौषट्’, ‘ॐ हूं व्याप्तिन्यै नमः’, ‘ॐ हूं कवचाय हुम्’, ‘ॐ हूं अस्त्राय फट्’, ‘ॐ हूं फट् राज्ञे नमः’, ‘ॐ हूं फट् दंष्ट्रिणीभ्यो नमः।’

साधक को अङ्गपूजा के पश्चात् निम्न मन्त्रों से सूर्यादि सभी नवग्रहों की मानसी पूजा करनी चाहिये-

‘ॐ सः सूर्याय नमः, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ मं मंगलाय नमः, ॐ बुं बुधाय नमः, ॐ बृं बृहस्पतये नमः, ॐ शं शनैश्चराय नमः, ॐ रां राहवे नमः, ॐ के केतवे नमः, ॐ तेजोवृद्धाय नमः।’

इस प्रकार सूर्यदेव आदि की पूजा करके साधक को आचमन करना चाहिये। उसके बाद वह कनिष्ठिका आदि अँगुलियों में करन्यास तथा पुनः निम्नाङ्कित मन्त्रों से अङ्गन्यास करे-

‘ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वौषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।’

तदनन्तर भूतशुद्धि करे तथा पुनः न्यास करे। अर्घ्यस्थापन करके उसी जल से अपने शरीर का प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद वह साधक सिंहासनस्थ नन्दी आदि की पूजा करे। ‘ॐ ह्रीं शिवाय नमः’ मन्त्र से पद्म में स्थित शिव की पूजा करके नन्दी, महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्रीवत्स, वासुदेवता, ब्रह्मा, गणपति तथा गुरु की पूजा करे।

तत्पश्चात् साधक को पद्म के मध्य में शक्ति एवं अनन्त देव की पूजा करके पूर्व दिशा में धर्म, दक्षिण में ज्ञान, पश्चिम में वैराग्य, उत्तर में ऐश्वर्य, अग्निकोण में अधर्म, नैर्ऋत्य में अज्ञान, वायव्य में अवैराग्य, ईशान में अनैश्वर्य, पद्म की कर्णिका में वामा और ज्येष्ठा उसके बाद पूर्व आदि दिशाओं में रौद्री, काली, शिवा तथा असिता आदि शक्तियों की पूजा करनी चाहिये।

तदनन्तर साधक को शिव के आगे स्थित पीठ के मध्य में ‘ॐ ह्रीं कलविकरण्यै नमः, ॐ ह्रीं बलविकरण्यै नमः, ॐ ह्रीं बलप्रमथिन्यै नमः, ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः, ॐ मनोन्मन्यै नमः’ – इन मन्त्रों से कलविकरिणी एवं बलविकरिणी आदि शक्तियों की पूजा करनी चाहिये। साधक भगवान् शिव के लिये आसन प्रदान कर महामुद्रा की स्थापना करे। तदनन्तर मूर्ति में शिव की पीठ के ऊर्ध्व भाग में आवाहन-स्थापन-सन्निधान-सन्निरोध-सकलीकरण आदि मुद्रा दिखाये और अर्घ्य, पाद्य, आचमन, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन तथा स्नानीय जल समर्पित करे एवं अर्गन्धि-मध्यम करके पुष्पदेव की वस्त्र, गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्य में चर्च समर्पित करे। नैवेद्य के अनन्तर आचमन दे करके मुखशुद्धि के लिये ताम्बूल, करद्वर्तन, छत्र, चामर, पवित्रक (यज्ञोपवीत) प्रदान कर प्रदक्षिणा (अभीष्टार्थ देव में सर्वाङ्गकुण्ड का भाव) करे। तदनन्तर साधक आराध्य के साथ तदाकार होकर उनका जप करे तथा विनम्रभाव से स्तुति कर उन्हें प्रणाम करे। इसी हृदयादि न्यास आदि के साथ पूर्ण की गयी पूजा को ‘षडङ्गपूजा’ यह नाम दिया गया है।

इस प्रकार शिवपूजन पूर्ण करने के पश्चात् साधक को अग्नि आदि चतुर्दिक् कोणों, मध्यभाग तथा पूर्वादि दिशाओं में अग्नि आदि हिरण्यताओं तथा इन्द्रादि दिक्पालों की पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उसको उन देवों के मध्य स्थित चण्डेश्वर की पूजा कर उनके लिये निर्माल्य समर्पित करना चाहिये। उसके बाद वह निम्नाङ्कित स्तुति से समापन (क्षमा-याचना) करके उनका विसर्जन करे-

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् त्वयि स्थितिः॥यत्किञ्चित् क्रियते कर्म सदा सुकृतदुष्कृतम्।तन्मे शिवपदस्थस्य रुद्र क्षपय शङ्कर॥शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत्।शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽयमेव च॥यत्कृतं यत् करिष्यामि तत् सर्वं सुकृतं तव।त्वं त्राता विश्वनेता च नान्यो नाथोऽस्ति मे शिव॥ (२३। २६-२९)

हे प्रभो! आप गुह्य से गुह्य तत्त्वों के संरक्षक हैं। आप मेरे किये हुए जप को स्वीकार करें। हे देव! मुझे सिद्धि प्राप्त हो। आपकी कृपा से आप में मेरी निष्ठा बनी रहे। हे रुद्र! हे भगवान् शङ्कर! मेरे द्वारा सर्वदा पाप-पुण्य रूप जो कर्म किया जाता है, उसे आप नष्ट करें। मैं आपके इन कल्याणकारी चरणों में पड़ा हूँ। हे शिव! आप अपने भक्तों को सर्वस्व देने वाले हैं। आप ही भोक्ता हैं, हे शिव! यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् भी तो आप ही हैं। हे शङ्कर! आपकी विजय हो। सर्वत्र जब शिव ही हैं तो मैं भी वही हूँ। जो कुछ मैंने किया है और जो कुछ भविष्य में करूँगा, वह सब आपके द्वारा ही किया हुआ है। आप रक्षक हैं। आप विश्वनायक हैं। हे शिव! आपके अतिरिक्त मेरा कोई स्वामी नहीं है।

(हरि ने पुनः कहा- हे रुद्र!) इसके बाद मैं शिवपूजा की दूसरी विधि कह रहा हूँ-

इस विधि के अनुसार गणेश-सरस्वती-नन्दी-महाकाल-गङ्गा-यमुना, अनन्त तथा वास्तुपति की पूजा मण्डल के द्वार पर करनी चाहिये और साधक पूर्वादि दिशाओं में इन्द्रादि सभी दिक्पालों की पूजा करे। उसके बाद कारणभूत समस्त तत्त्वों की पूजा करे।

उन तत्त्वों में ‘पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश’ – ये पञ्चमहाभूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द – ये उनकी पाँच तन्मात्राएँ हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ – ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण – ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इनके अतिरिक्त मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये अन्तःकरणचतुष्टय हैं। इनसे ऊपर ‘पुरुष’ की स्थिति है। इन्हीं (पुरुष) – को शिव कहा जाता है।

इन तत्त्वों के साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी पूजा होनी चाहिये। इन समस्त तत्त्वों में जो शिव और शक्ति अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति का तत्त्व अनुस्यूत है, उसको जानकर ज्ञानी साधक जीवन्मुक्त होकर शिवरूप हो जाता है। इन तत्त्वों से जो शिवतत्त्व है, वही विष्णु है, वही ब्रह्मा है और वही प्रजातत्त्व है।

भगवान् सदाशिव का मङ्गलमय ध्यानस्वरूप इस प्रकार है- वे देव पद्मासन पर विराजमान रहते हैं। उनका वर्ण शुक्ल है। सदैव सोलह वर्ष की आयु में स्थित रहते हैं। वे पाँच मुखों वाले हैं। उनके दसों हाथों में क्रमशः दक्षिणभाग की ओर अभयमुद्रा, प्रलयमुद्रा, शक्ति, शूल तथा खड्वाङ्ग और वामभाग की ओर सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल तथा श्रेष्ठ बीजपूरक (बिजौरा नींबू) स्थित रहता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया नामक तीन शक्तियाँ उनके तीन नेत्र हैं। ऐसे वे देव सर्वदा कल्याण की भावना में अवस्थित रहते हैं, इसीलिये इन्हें सदाशिव कहा गया है।

ऐसे मूर्तिमान् देव का चिन्तन करने वाला साधक सदैव कालभय से रहित रहता है। इस प्रकार शिवोपासना करने वाले साधक की न तो अकालमृत्यु होती है और न शीत तथा उष्णादि कारणों से ही उसकी मृत्यु होती है।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पूजन विधि