भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवों की पूजा-विधि

सूतजी ने कहा – अब मैं गणेश आदि देवों की तथा त्रिपुरसुन्दरी की पूजा को कहूँगा, जो अपने भक्तों को सर्वदा अभीष्ट प्रदान करने वाली तथा श्रेष्ठ है। साधक को सबसे पहले गजपतिदेव के आसन एवं उनके मूर्तिस्वरूप का पूजन करके ध्यानपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। साधक ‘गां’ आदि बीजमन्त्रों से निम्न रीति से हृदयादिन्यास करे-

ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट्, ॐ गैं कवचाय हुम्, ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ गः अस्त्राय फट्।

इस न्यास के पश्चात् साधक को – ‘ॐ दुर्गायाः पादुकाभ्यां नमः’, ‘ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः’ – मन्त्र से माता दुर्गा और गुरु की पादुकाओं को नमस्कार करके देवी त्रिपुरा के आसन और मूर्ति को प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् वह (साधक) ‘ॐ ह्रीं दुर्गां रक्षिणि’ – इस मन्त्र से हृदयादिन्यास करे और फिर इसी मन्त्र से ‘खड्गधृक्, प्रचण्डमुण्डा, चण्डघोषा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, खड्गिका तथा दुर्गा’ – इन नौ शक्तियों की पूजा करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग आदि मुद्राओं का प्रदर्शन कर उसके अग्निकोण में सदाशिव आदि देवों की पूजा करे। अतः साधक पहले ‘ॐ सदाशिवमहाप्रेतासनाय नमः’ कहकर प्रणाम करे। तत्पश्चात् ‘ॐ ऐं क्लीं (ह्रीं) सौं त्रिपुरायै नमः’ यह मन्त्र बोलते हुए उस त्रिपुरशक्ति को नमस्कार करे।

साधक उसके बाद भगवती त्रिपुरा के पद्मासन, मूर्ति और हृदयादि अङ्गों को प्रणाम करे। तत्पश्चात् उस पीठ पर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका – इन आठ देवियों की पूजा करे। इन देवियों की पूजा के बाद ‘भैरव’ नामक देवों की पूजा का विधान है। असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण तथा संहार नाम वाले – ये आठ भैरव हैं।

भैरव-पूजा के पश्चात् रति, प्रीति, कामदेव, पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्नराज, गुरु और क्षेत्रपाल – देवों की भी पूजन करे।

साधक को पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपीठ बनाकर उस पर इष्टदेव में भुवनेशी वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक और अभय-मुद्रा से सुशोभित भगवती सरस्वती का भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्र का जप और हवन करने से भगवती त्रिपुरेश्वरी साधक के लिये सिद्धिदात्री हो जाती हैं। पूजा में देवी के आसन तथा पादुका की पूजा का भी विधान है। विशेष पूजन में मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिये। 

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पूजन विधि