पञ्चतत्त्वार्चन-विधि
महादेव ने कहा—हे शङ्ख-चक्र-गदाधर! आप पञ्चतत्त्वों की उस पूजा-विधि को मुझे बताने की कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेने मात्र से ही मनुष्य परमपद को प्राप्त कर लेता है।
श्रीहरि ने कहा—हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व-पूजा-विधि को कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टों की सिद्धि करने वाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष-विनाशक पूजन-विधि का आप श्रवण करें।
हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत्-स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य), अचल, शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्जन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी माया के प्रभाव से पाँच प्रकार से अवस्थित हैं। वे जगत् का कल्याण करने वाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण स्वरूप से पाँच रूपों (तत्त्वों)-में स्थित हैं।
हे सुव्रतत्र! जनार्दन विष्णु के उक्त पञ्चरूपों के वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं-
ॐ आं वासुदेवाय नमः, ॐ अं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः, ॐ अः अनिरुद्धाय नमः, ॐ अं नारायणाय नमः।
—ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओं के वाचक हैं, जो सभी पावक, महापापों के विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगों को दूर करने वाले हैं। अब मैं आपसे मण्डलमय पञ्चतत्त्वार्चन-विधि को कह रहा हूँ। हे शिव! उसकी जिस विधि से और जिन मन्त्रों के द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।
—इन पाँच देवों की पूजा में सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर पूजा-गृह में प्रवेश करके विद्वान् साधक को चाहिये कि वह आचमन करके मनोनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और—’ॐ ह्रां रम्’-इन मन्त्रों से सोषणादि क्रिया करे। वे वासुदेव कृष्ण जगत् के स्वामी, पीतवर्ण के कौशेय (रेशमी) वस्त्रों से विभूषित, सहस्रों सूर्यों की किरणों के समान तेजःस्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति-कुण्डलों से सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्ण का अपने हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् संकर्षण का ध्यान करे। उसके बाद यक्षकर्दम प्रभु का, अनिरुद्ध तथा श्रीनारायण के स्वरूप का ध्यान करके उन देवाधिदेव से प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवों का ध्यान करके मूल मन्त्र के द्वारा दोनों हाथों से व्यापक रूप में करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यास के मन्त्रों से अङ्गन्यास करे। हे महादेव! सुव्रत! उन न्यास एवं पूजा के मन्त्र इस प्रकार हैं-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारायगताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ आधारशक्तये नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अं अर्धमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ खं वासुदेवाय परब्रह्मणे शिवाय तेजोऽव्ययाय व्यापिने सर्वदेहस्थिताय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ पुष्ट्यै नमः, ॐ पृष्ठे नमः, ॐ गौर्यै नमः, ॐ शाक्यै नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।’
तत्पश्चात् ‘ॐ पद्माय नमः’ ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलों का निर्माण करके उस मण्डल में इन्हीं मन्त्रों से देवों का पूजन करना चाहिये।
मूल मन्त्र से पाठ आदि का निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्र का जप कर उसे प्रभु को समर्पित कर दे।
तदनन्तर भगवान् वासुदेव का स्मरण कर इस स्तोत्र का पाठ करे-
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥प्रद्युम्नायानिरुद्धायैव नमो नमो नमः।नमो नारायणायैव वराणां पतये नमः॥पुरुषाय पुराणाय वराय च।अनादिमध्यनिधनाय पुराणाय नमो नमः॥सृष्टिस्थित्यन्तकृते च ब्रह्मणः पतये नमः।नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्राय च॥कलिकल्मषहन्त्रे च सुरेशाय नमो नमः।संसारवृक्षछेत्रे च मायाबीजे नमो नमः॥चतुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।बहुरूपविहीनाय मोक्षदाय नमो नमः॥मोक्षद्वाराय धर्माय नित्याय नमो नमः।सर्वकारणकारणाय पारब्रह्मस्वरूपिणे॥संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर।त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्प्रभो॥त्वमेव सततं विष्णुं गतोऽहं शरणं तव।ज्ञानदीपप्रदानेन तमोयुक्तं प्रकाशय॥ (३२।३०-३८)
‘हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आददेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्यों से पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देने वाले, आदि तथा अन्त से रहित सनातन प्रभु को बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहारकर्ता, ब्रह्मा के भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु को नमस्कार है। नमस्कार है।’
कलिकाल के दोषों को नष्ट करने वाले, देवों के ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत्-रूपी मूल वृक्ष का छेदन करने वाले, माया का भेदन करने वाले, बहुत-से रूपों को धारण करने वाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीन रूपों में अवस्थित रहने वाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वर को नमस्कार है। मोक्ष के द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टों को प्रदान करने वाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये बार-बार नमस्कार है। इस गहन संसारसागर में मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर! हे जगत् के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहने वाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरण में हूँ। हे भगवन्! ज्ञानरूपी दीपक को प्रज्वलित कर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकार को दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।
इस प्रकार समस्त कर्मों को दूर करने वाले देवेश भगवान् वासुदेव की स्तुति करके हे नीललोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठों से भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वों से युक्त उन भगवान् विष्णु का अपने हृदय में ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओं की प्रदान करने वाली वासुदेव की श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजा के करने मात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चन को पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
महादेव ने कहा—हे शङ्ख-चक्र-गदाधर! आप पञ्चतत्त्वों की उस पूजा-विधि को मुझे बताने की कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेने मात्र से ही मनुष्य परमपद को प्राप्त कर लेता है।
श्रीहरि ने कहा—हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व-पूजा-विधि को कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टों की सिद्धि करने वाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष-विनाशक पूजन-विधि का आप श्रवण करें।
हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत्-स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य), अचल, शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्जन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी माया के प्रभाव से पाँच प्रकार से अवस्थित हैं। वे जगत् का कल्याण करने वाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण स्वरूप से पाँच रूपों (तत्त्वों)-में स्थित हैं।
हे सुव्रतत्र! जनार्दन विष्णु के उक्त पञ्चरूपों के वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं-
ॐ आं वासुदेवाय नमः, ॐ अं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः, ॐ अः अनिरुद्धाय नमः, ॐ अं नारायणाय नमः।
—ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओं के वाचक हैं, जो सभी पावक, महापापों के विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगों को दूर करने वाले हैं। अब मैं आपसे मण्डलमय पञ्चतत्त्वार्चन-विधि को कह रहा हूँ। हे शिव! उसकी जिस विधि से और जिन मन्त्रों के द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।
—इन पाँच देवों की पूजा में सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर पूजा-गृह में प्रवेश करके विद्वान् साधक को चाहिये कि वह आचमन करके मनोनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और—’ॐ ह्रां रम्’-इन मन्त्रों से सोषणादि क्रिया करे। वे वासुदेव कृष्ण जगत् के स्वामी, पीतवर्ण के कौशेय (रेशमी) वस्त्रों से विभूषित, सहस्रों सूर्यों की किरणों के समान तेजःस्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति-कुण्डलों से सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्ण का अपने हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् संकर्षण का ध्यान करे। उसके बाद यक्षकर्दम प्रभु का, अनिरुद्ध तथा श्रीनारायण के स्वरूप का ध्यान करके उन देवाधिदेव से प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवों का ध्यान करके मूल मन्त्र के द्वारा दोनों हाथों से व्यापक रूप में करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यास के मन्त्रों से अङ्गन्यास करे। हे महादेव! सुव्रत! उन न्यास एवं पूजा के मन्त्र इस प्रकार हैं-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारायगताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ आधारशक्तये नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अं अर्धमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ खं वासुदेवाय परब्रह्मणे शिवाय तेजोऽव्ययाय व्यापिने सर्वदेहस्थिताय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ पुष्ट्यै नमः, ॐ पृष्ठे नमः, ॐ गौर्यै नमः, ॐ शाक्यै नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।’
तत्पश्चात् ‘ॐ पद्माय नमः’ ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलों का निर्माण करके उस मण्डल में इन्हीं मन्त्रों से देवों का पूजन करना चाहिये।
मूल मन्त्र से पाठ आदि का निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्र का जप कर उसे प्रभु को समर्पित कर दे।
तदनन्तर भगवान् वासुदेव का स्मरण कर इस स्तोत्र का पाठ करे-
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥प्रद्युम्नायानिरुद्धायैव नमो नमो नमः।नमो नारायणायैव वराणां पतये नमः॥पुरुषाय पुराणाय वराय च।अनादिमध्यनिधनाय पुराणाय नमो नमः॥सृष्टिस्थित्यन्तकृते च ब्रह्मणः पतये नमः।नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्राय च॥कलिकल्मषहन्त्रे च सुरेशाय नमो नमः।संसारवृक्षछेत्रे च मायाबीजे नमो नमः॥चतुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।बहुरूपविहीनाय मोक्षदाय नमो नमः॥मोक्षद्वाराय धर्माय नित्याय नमो नमः।सर्वकारणकारणाय पारब्रह्मस्वरूपिणे॥संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर।त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्प्रभो॥त्वमेव सततं विष्णुं गतोऽहं शरणं तव।ज्ञानदीपप्रदानेन तमोयुक्तं प्रकाशय॥ (३२।३०-३८)
‘हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आददेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्यों से पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देने वाले, आदि तथा अन्त से रहित सनातन प्रभु को बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहारकर्ता, ब्रह्मा के भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु को नमस्कार है। नमस्कार है।’
कलिकाल के दोषों को नष्ट करने वाले, देवों के ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत्-रूपी मूल वृक्ष का छेदन करने वाले, माया का भेदन करने वाले, बहुत-से रूपों को धारण करने वाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीन रूपों में अवस्थित रहने वाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वर को नमस्कार है। मोक्ष के द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टों को प्रदान करने वाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये बार-बार नमस्कार है। इस गहन संसारसागर में मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर! हे जगत् के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहने वाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरण में हूँ। हे भगवन्! ज्ञानरूपी दीपक को प्रज्वलित कर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकार को दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।
इस प्रकार समस्त कर्मों को दूर करने वाले देवेश भगवान् वासुदेव की स्तुति करके हे नीललोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठों से भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वों से युक्त उन भगवान् विष्णु का अपने हृदय में ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओं की प्रदान करने वाली वासुदेव की श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजा के करने मात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चन को पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: पूजन विधि