सुदर्शनचक्र पूजा-विधि

रुद्रने कहा—हे लक्ष्म-गदाधर! उस सुदर्शनकी पूजाके विषयमें मुझे बतायें, जिससे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि-सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।

श्रीहरिने कहा—हे वृषध्वज! सुदर्शनचक्रकी पूजा-विधिको मैं कह रहा हूँ, आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करके हरि का पूजन करे। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं शुभ हृदय-कमलमें भगवान् सुदर्शनदेव विष्णुका ध्यान करे। हे महादेव! उसके बाद मण्डलमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण करनेवाले, सौम्य आकृतिवाले, किरीटी भगवान् विष्णुदेवका आवाहन करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि विविध उपचारोंसे पूजा करे।

हे रुद्र! ‘ॐ सहस्रार हुं फट्’ इस सुदर्शन मन्त्रका १०८ बार जप करे। पूजाके अन्तमें पुष्कर पूजनपत्रकका उत्तम पूजन करता है, वह इस लोकमें समस्त रोगोंसे विमुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। मन्त्र-जपके पश्चात् सभी व्याधियोंको विनष्ट करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये—

नमः सुदर्शनायैव सहस्रादित्यवर्चसे॥ज्वालामालाप्रदीप्ताय सहस्राराय चक्षुषे।सर्वदुष्टविनाशाय सर्वपापविभेदिने॥सुचक्राय विचक्राय सर्वमन्त्रविभेदिने।प्रदात्रे च जगद्धात्रे जगद्विध्वंसिने नमः॥पालनाय च लोकानां दुष्टसंहारिणे नमः।उग्राय चैव सौम्याय चण्डाय च नमो नमः॥नमश्चक्षुःस्वरूपाय संसारभयभेदिने।मायापञ्जरभेत्त्रे च शिवाय च नमो नमः॥ग्रहारिष्टप्रहन्त्रे च ग्रहाणां पतये नमः।कालाय मृत्यवे चैव भीमाय च नमो नमः॥भक्तानुग्रहदात्रे च भक्तगोप्त्रे नमो नमः।विष्णुरूराय चक्राय स्वायुधानां धराय च॥विष्णुशस्त्राय चक्राय नमो भूयो नमो नमः।इति स्तोत्रं महापुण्यं चक्रस्य तव कीर्तितम्॥यः पठेत् परया भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति।चक्रपूजामिमां यश्च पठेद्यस्तु दिनेदिने।स पापै र्भस्मसात्कृत्य विष्णुलोकय गच्छति॥ (३३।८-१६)

सहस्रों सूर्यके समान तेजःसम्पन्न सुदर्शनचक्रके लिये नमस्कार है। तेजस्वी किरणोंकी मालाओंसे प्रदीप्त हजारों नेत्रस्वरूप, सर्वदुष्टविनाशक तथा सभी प्रकारके पापोंको नष्ट करनेवाले आपको नमन है। सुचक्र तथा विचक्र नामधारी, सम्पूर्ण मन्त्रका भेदन करनेवाले, जगत्‌की सृष्टि करनेवाले, पालन-पोषण करनेवाले एवं जगत्‌को संहार करनेवाले हे सुदर्शनचक्र! आपको नमस्कार है। (संसारकी रक्षा करनेके लिये) देवनाओंका कल्याण करनेवाले, दुष्ट राक्षसोंका विनाश करनेवाले, दुष्टोंका संहार करनेके लिये उग्र-स्वरूप एवं प्रचण्ड-स्वरूप और सज्जनोंके लिये सौम्य-स्वरूप धारण करनेवाले आपको बारम्बार नमस्कार है। जगत्‌के लिये नेत्रस्वरूप संसारभयको काटनेवाले मायारूपी पिंजड़ेका भेदन करनेवाले, कल्याणकारी सुदर्शनचक्रको नमस्कार है। ग्रह एवं अरिष्टस्वरूप, ग्रहपति, कालस्वरूप, मृत्युस्वरूप, पापात्माओंके लिये महाभयंकर आपके लिये बार-बार नमन है। भक्तोंपर कृपा करनेवाले, उनके अभिरक्षक, विष्णुस्वरूप, शस्त्रस्वरूप, समस्त आयुधोंको शक्तिको अपनेमें धारणकर स्थित रहनेवाले विष्णुके शस्त्रभूत हे सुदर्शनचक्र! आपके लिये बारम्बार नमस्कार है।

हे शङ्कर! सुदर्शनचक्रके इस महापुण्यशाली स्तोत्रका जो मनुष्य परम भक्तिसे पाठ करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। 

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पूजन विधि