विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि

श्रीहरिने कहा—हे वृषध्वज! अब मैं आपसे विष्णुके पवित्रारोपणका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष दोनोंको देनेवाला है। प्राचीन समयमें हो रहे देवासुर-संग्राममें [अपनी विजय न होते देखकर] ब्रह्मादि देवगण विष्णुकी शरणमें गये। उन सबकी प्रार्थना सुन करके विष्णुने विजय-प्राप्तिके लिये उन्हें अपने गलेका हार, पवित्रक नामक त्रैवेयक तथा एक ध्वज प्रदान किया और कहा कि इन्हें देखते ही दानव नष्ट हो जायेंगे। तभीसे उन पवित्रकोंकी पूजा आरम्भ हुई।

हे हर! प्रतिपदसे लेकर पौर्णमासीतक जिस देवताकी जो तिथि कही गयी है, उसके अनुसार ही उस तिथिमें उन देवताओंका पवित्रारोपण करना चाहिये। हे शिव! शुक्ल-पक्ष ही अथवा कृष्णपक्ष, द्वादशी तिथिमें विष्णुके लिये पवित्रारोपणकी विधि है। छत्तीसोपराग, उत्तरायण, दक्षिणायन, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण, विवाहृदि मङ्गल एवं वृद्धि-कार्य तथा गुरुजनके आगमन इत्यादि अवसरपर यह पूजा करनी चाहिये। पवित्रकके उद्देश्यसे भी नित्य पूजन हो सकता है; किंतु वर्षान्तमें इसका पूजन आवश्यक है।

हे रुद्र! इन पवित्रकोंका निर्माण वर्णानुसार होना चाहिये, जैसे—ब्राह्मणोंका पवित्रक कौशेय’, कपास, क्षौम अथवा कुशसूत्रसे निर्मित होना चाहिये। क्षत्रियोंका पवित्रक कौशेयसूत्रसे, वैश्योंका क्षौमसूत्र तथा वल्कलसूत्रसे और आपसे शुद्धिकासे बना हुआ पवित्रक प्रशस्त माना गया है। कपास या पद्मज (कमल)-से निर्मित पवित्रक समस्त वर्णोंके लिये प्रशस्त है।

ॐकार, शिव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, शेष, सूर्य, गणेश और विष्णु—इन नौ देवताओंका इस पवित्रकके तन्तुओंमें निवास है।

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—वे पवित्रकके तीन सूत्रोंके देवता हैं। जो उनमें अधिष्ठित रहते हैं। इन सूत्रोंके सुवर्ण, रजत, ताम्र, काँस या मिट्टीके बने हुए पात्रमें रखना चाहिये। एक सौ आठ तन्तुओंका सूत्र उत्तम, चौवन तन्तुओंका सूत्र मध्यम तथा सत्ताईस तन्तुओंका पवित्रक कनिष्ठ होता है।

इन पवित्रकोंके प्रत्येक ग्रन्थि-सूत्रोंको कुंकुम, हल्दी या चन्दनसे चर्चितकर उपवास रहते हुए उन्हें शास्त्रसम्मत पात्रमें रखकर अधिवासित करे।

पवित्रकको पृथक्-पृथक् अभिर्मान्त्रित करके उसका सम्यक् दर्शन तथा पुनः पूजन करना चाहिये और यत्नपूर्वक उसका वस्त्राच्छादन करके उसे मण्डलस्थ देवप्रतिमाके समक्ष यत्नपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये।

ब्रह्मादिक अन्य देवोंकी स्थापना करके कलशकी पूजा करे। मण्डलका निर्माण करके नैवेद्य समर्पित करे। पवित्रकको पुनः अधिवासित करके तीन या नौ बार सूत घुमाकर वेदोंकी ऋचाएँ करे। तदनन्तर अपनेको तथा कलश, घी, अङ्किचण्ड, विमान, मण्डल और गृहको सूत्रसे आच्छादन करे। एक सूत्र देवताके मस्तकपर अर्पित करे। इस प्रकार सम्पूर्ण सामग्री निवेदितकर महेश्वर विष्णुकी पूजा करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये—

आत्मतेजोऽसि देवेश पुण्यार्थं धारयेत्परम्।तत्प्रभावाद्देविष्यमि सामग्र्याः संनिधौ भव॥ (४३।२८-२९)

हे परमेश्वर! देवदेवेश्वर! आप यहाँपर पूजाके लिये आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीसे प्रभाकालमें मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी संनिधि यहीं बनी रहे।

एक रात्रि या तीन रात्रितक पवित्रकको अधिवासित-कर स्वयं रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल भगवान् केशवका पूजन करे और नियमित पवित्रकोंको उन देवको अर्पित करे। पवित्रकको धूपसे धूपित करके मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।

गायत्री-मन्त्रसे पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव-पूजन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दे—

विष्णुस्त्वधिकं रम्यं महापातकनाशनम्।सर्वपापप्रशमनं देव तवाग्रे धारयाम्यहम्॥ (४३।३३)

हे देव! यह पवित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता हूँ। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना चाहिये—

पवित्रकं वैष्णवं तेजः सर्वपातकनाशनम्।धर्मकामार्थसिद्ध्यर्थं त्वत्कण्ठे धारयाम्यहम्॥ (४३।३४-३५)

[हे देव!] यह विष्णु-तेजःस्वरूप, सर्वपाप-विनाशक पवित्रक है। मैं धर्म, काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये इसे अपने कण्ठमें धारण करता हूँ। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करें—

वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि।तद्वत् पवित्रं तन्तुर्जा माला त्वं हृदये धरा॥ (४३।३९)

हे देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कौस्तुभ विराजते हैं, उसी प्रकार तन्तुओंकी बनी हुई यह माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें।

इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विसर्जन करें—

सावित्सरीमियां पूजां समाप्य विधिवन्मया।व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जितः॥ (४३।४३)

हे पवित्रक! मैंने इस सावित्सरी पूजाको विधिवत् सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप विष्णुलोकको पधारें। 

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पूजन विधि