विविध शालग्रामशिलाओं के लक्षण

श्रीहरि ने कहा—हे वृषध्वज! अब मैं प्रभावमय शालग्राम का लक्षण कहता हूँ। शालग्रामशिला के स्पर्श मात्र से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। केशव, नारायण, गोविन्द तथा मधुसूदन आदि नामों वाली विविध शालग्रामशिलाएँ होती हैं, जो शंख, चक्र आदि चिह्नों से सुशोभित रहती हैं। इन शिलारूपी लक्षणों का इस प्रकार है-

  • शंख, चक्र, गदा तथा पद्म के चिह्न से सुशोभित शिला ‘केशव’, पद्म, कौमोदकी गदा, चक्र तथा शंख के चिह्न से सुशोभित शिला ‘नारायण’ शंख, पद्म तथा गदा के चिह्न से विभूषित शिला ‘माधव’ और पद्म, गदा, शंख तथा चक्र के चिह्न से शोभायमान शिला ‘गोविन्द’ नाम से जानी जाती है।
  • पद्म, शंख, चक्र, गदा से युक्त ‘विष्णु’ नाम की, शंख, पद्म, गदा तथा चक्र से युक्त ‘मधुसूदन’ नाम की, गदा, चक्र, शंख, पद्म से संयुक्त ‘त्रिविक्रम’ नाम की, चक्र, गदा, पद्म, शंख से चिह्नित ‘वामन’ नाम की, और पद्म, शंख एवं गदा से समन्वित ‘श्रीधर’ नाम की और पद्म, गदा, शंख, चक्र से अंकित ‘हृषीकेश’ नाम की शालग्राम-मूर्ति कही गयी है। इन देवमूर्तियों को बार-बार नमन है।
  • पद्म, चक्र, गदा, शंख-चिह्नयुक्त शालग्रामशिला ‘पद्मनाभ’, शंख, गदा-विभूषित पद्मयुक्त शालग्रामशिला ‘दामोदर’, चक्र, शंख, गदा तथा पद्म से संयुक्त शालग्रामशिला ‘वासुदेव’; शंख, पद्म, चक्र, गदा-चिह्नों से समन्वित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’; शंख, गदा, पद्म, चक्र से सुशोभित शालग्रामशिला ‘प्रद्युम्न’ तथा गदा, शंख, पद्म और चक्र से शोभित शालग्रामशिला ‘अनिरुद्ध’ नाम से अभिहित है। इन्हें बारम्बार प्रणाम है।
  • पद्म, शंख, गदा, चक्र के चिह्नों से विभूषित ‘पुरुषोत्तम’ नाम की, गदा, शंख, चक्र, पद्म-चिह्न से विभूषित ‘अधोक्षज’ नाम की, पद्म, गदा, शंख, चक्र से विभूषित ‘नृसिंह’ नाम की, पद्म, शंख, गदा, गदा से अंकित ‘अच्युत’ नाम की और शंख, चक्र, पद्म, गदा से संयुक्त ‘जनार्दन’ की शालग्राम-मूर्ति है–इन देवनामों से अभिहित मूर्तियों को नमस्कार है।
  • गदा, चक्र, पद्म, शंख से अंकित शालग्राम ‘उपेन्द्र’, पद्म, शंख से युक्त शालग्राम ‘हरि’; गदा, पद्म, शंख, चक्र-चिह्न से शोभित शालग्राम ‘श्रीकृष्ण’ नाम से प्रसिद्ध है और शालग्रामशिला के द्वारदेश पर स्थित दो चक्र धारण करने वाले, सुवर्णवर्ण वाले भगवान् वासुदेव हैं। इन सभी रूपों एवं नामों को धारण करने वाले हैं गदाधर भगवान् विष्णु। हम सबकी आप रक्षा करें।
  • दो चक्रों से युक्त, रक्त आभा वाली और पूर्वभाग में पद्म-चिह्न से अंकित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’ की मूर्ति होती है, किंतु छोटे-छोटे चक्रों वाली तथा पीतवर्ण की होने पर वह शिला ‘प्रद्युम्न’ कही जाती है। यदि शालग्रामशिला बड़ी तथा छिद्र से संयुक्त शिरोभाग वाली और वृत्ताकार हो तो उसे ‘अनिरुद्ध’ नामक शालग्राम-मूर्ति कहते हैं। जो द्वार भाग पर नीलवर्ण की तीन रेखाओं से युक्त होती है और जिसका शेष सम्पूर्ण भाग कृष्णवर्ण से सुशोभित रहता है, वह शालग्रामशिला ‘नारायण’ शिला के नाम से जानी जाती है।
  • जिस शिला के मध्य में गदा के समान रेखा हो, यथास्थान नाभिचक्र उन्नत हो तथा चक्र स्थूल विस्तृत हो, वह ‘नृसिंह’ नाम वाली शालग्रामशिला है और इन चिह्नों के साथ ही उसमें तीन बिंदु अथवा पाँच बिंदु हों तो वह ‘कपिल’ नामक शिला है, वह शिला हम सबकी रक्षा करे। उत्तम पूजन ब्रह्मचारियों को करना चाहिये। विषम परिमाण वाले दो चक्रों से चिह्नित शक्ति-चिह्न से युक्त शिला को ‘वराह’ शिला कहते हैं। वह हम सबकी रक्षा करे। नीलवर्ण वाली, तीन रेखाओं से युक्त, स्थूल तथा बिन्दुक शिला ‘कूर्ममूर्ति’ है और वही अगर कर्बुराकार है तथा उसका पीठ का भाग सुवर्ण की आभा से युक्त है तो वह शिला ‘कृष्ण’ कही गयी है, वह हम सबकी रक्षा करे। चौड़ी रेखा वाली शिला ‘श्रीधर’ नाम की कही जाती है। गदा से अंकित शिला ‘वनमाली’ है—ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी शिला ‘वामन’ है। श्याम वर्ण वाली, चक्रचिह्न से युक्त शिला ‘सुरेश’ की मूर्ति है। विभिन्न भाव में अनेक रूपों वाली, नागे के समान फणों से युक्त शिला ‘अनन्त’ है। स्थूल हो, नीलवर्ण की हो और मध्य में नीलवर्ण का चक्र हो तो वह ‘दामोदर’ शिला है।
  • संकुचित द्वार वाली, रक्तवर्ण वाली, लम्बी रेखाओं वाली, एक चक्र तथा एक कमल से विभूषित विशाल वर्ण की शिला ‘ब्रह्मशिला’ है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत छिद्र वाली तथा स्थूल चक्र वाली शिला ‘कृष्णशिला’ तथा बिलवाकार शिला ‘विष्णुशिला’ है। अंकुश के आकार वाली, पाँच रेखाओं वाली तथा कौस्तुभ-चिह्न से युक्त शिला ‘हयग्रीव’ शिला है। एक चक्र तथा एक कमल से अंकित, मणि तथा रत्नों की आभा से युक्त कृष्णवर्ण वाली शिला ‘वैकुण्ठ’ शिला और द्वार पर रेखा वाली, विस्तृत कमल सदृश शिला ‘मत्स्यशिला’ है—ये हमें सबकी रक्षा करें। दाहिनी ओर रेखा युक्त, श्यामवर्ण की समरेखा, चम्पक वर्ण की अविरल शिला ‘त्रिविक्रम’ नाम वाली शिला हम सबकी रक्षा करे। द्वारिका में स्थित, शालग्राम में निवास करने वाली गदाधारी भगवान् को नमस्कार है। एक द्वार वाली, चार चक्रों से युक्त, वनमाला से विभूषित, स्वर्णरेखा समन्वित, गोपद से सुशोभित तथा कष्ट को दूर करने वाली आकृति वाली ‘लक्ष्मीनारायण’ नाम वाली शिला हम सबकी रक्षा करे।
  • एक चक्र वाले शालग्राम को ‘सुदर्शन’ कहते हैं, उनके रूप में वे गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकी रक्षा करें। दो चक्र होने से शालग्रामशिला की ‘लक्ष्मीनारायण’ संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हैं, वह (शिला) ‘त्रिविक्रम’ की मूर्ति है। चार चक्र वाली ‘चतुर्व्यूह’, पाँच चक्र वाली ‘वासुदेव’, छः चक्र वाली शालग्रामशिला ‘प्रद्युम्न’ सात चक्र वाली शिला ‘संकर्षण’, आठ चक्र वाली ‘पुरुषोत्तम’, नव चक्र वाली शिला ‘नवाव्यूह’, दस चक्र वाली ‘दशावतार’ तथा ग्यारह चक्र वाली शिला ‘अनिबद्ध’ कहलाती है—ये हम सबकी रक्षा करें। बारह चक्रों से युक्त शिला ‘द्वादशात्मा’ है। बारह से अधिक चक्रों की शिला ‘अनन्त’ नाम वाली है। जो मनुष्य इस विष्णुमूर्ति मय स्तोत्र का पाठ करता है, स्वयं हरि का प्रिय बनता है और उसे सर्वकी प्राप्ति होती है। 

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: लक्षण