देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि

सूतजीने कहा—अब मैं सभी देवताओंकी प्रतिष्ठा-विधिको संक्षेपमें कह रहा हूँ। प्रशस्त तिथि-नक्षत्रादिमें प्रतिष्ठा करवानी चाहिये।

सर्वप्रथम अपनी वैदिक शाखामें कहे गये विधानके अनुसार या प्रणव-मन्त्र (ॐकार)-का उच्चारण करके पीठ या उससे अधिक प्रदक्षिणाके साथ मध्य स्थानमें स्थित आधारचक्रका वरण करे। तदनन्तर पाद्य, अर्घ्य और मृत्तिका, वस्त्र-गन्ध-माल्य एवं अनुलेपनीय द्रव्योंसे उनका पूजन करे। गुरुको चाहिये कि वे मन्त्रन्यासपूर्वक प्रतिष्ठाकर्मका समारम्भ करें।

प्रासादके अग्रभागमें दस अथवा बारह हाथका एक वर्गाकार सोलह खम्भोंवाला मण्डप तैयार करके उसमें (पूर्वादि चारों दिशाओं और ईशानादिक चार विदिशाओंमें एक-एक ध्वजा—इस तरह) कुल आठ ध्वजोंको प्रतिष्ठित करना चाहिये। तदनन्तर मण्डपके मध्यभागमें चार हाथ परिमाणकी एक वेदीका निर्माण करायें। उस वेदीके ऊपरकी भागमें नदके संगम-स्थलके किनारेसे लायी गयी बालुका बिछावे। प्रधान कुण्डका निर्माण करवाकर उसके पूर्वमें वर्गाकार, दक्षिणमें अर्धचन्द्रकार, पश्चिममें वर्तुलाकार और उत्तरमें पद्माकार—इस प्रकार पाँच कुण्डोंका निर्माण करवाकर उनमें सभी कुण्ड चौकोर रहे जा सकते हैं।

कुण्ड-निर्माणके पश्चात् समूल कामनाओंकी सिद्धिके लिये आचार्य, शान्तिकर्मके लिये विधिवत हवन करे। कुछ लोग मण्डपके ईशानकोणकी भूमिको गायके गोबर या स्वच्छ मिट्टीसे लीपकर उसपर होम करते हैं।

मण्डपमें लगे तोरणोंके समीप ही पूर्वादि दिशाओंमें चार द्वारोंका निर्माण करवाना चाहिये। मण्डपके तोरणस्तम्भ न्यग्रोध (वट), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), बिल्व, पलाश, खदिर (खैर) काष्ठसे निर्मित होने चाहिये। प्रत्येक तोरणस्तम्भका परिमाण पाँच हाथ होना चाहिये और प्रत्येक स्तम्भको वस्त्र-पुष्पादिसे अलंकृत करना चाहिये तथा उसके निचले भागको एक हाथ नापकर पृथ्वीमें गाड़ देना चाहिये। शेष चार हाथ परिमाणका भाग ऊपर रहे। इसी प्रकार उन्हें मण्डपके चारों ओरकी दिशाओंमें स्थापित करवाना चाहिये।

मण्डपके पूर्व द्वारपर मुरेन्द्र, दक्षिण द्वारपर हयराज, पश्चिम द्वारपर गोपति तथा उसी द्वारपर देवशार्दूलका न्यास करे। पहले ‘अग्निकोणके’ इस मन्त्रसे पूर्व द्वारकी दिशामें मृगेन्द्रका न्यास करे। तदनन्तर ‘ऐरावतं च’ इस मन्त्रसे दक्षिण द्वारकी दिशामें हयराजका, ‘अनश्व आरुहि०’ इस मन्त्रसे पश्चिम द्वारकी दिशामें गोपतिका और ‘मं नो देवो०’ मन्त्रसे उत्तर द्वारकी दिशामें देवशार्दूलका न्यास करना चाहिये।

मण्डपकी पूर्व दिशामें मेषवर्णके समान श्याम, अग्निकोणमें धूम्रवर्ण, दक्षिण दिशामें कृष्णवर्ण, नैर्ऋत्यकोणमें धूम्रवर्ण, पश्चिम दिशामें पाण्डुवर्ण, वायव्यकोणमें पोतवर्ण, उत्तर दिशामें रक्तवर्ण, ईशानकोणमें शुक्लवर्ण तथा मण्डपके मध्यभागमें अनेक वर्णवाली पताकाको स्थापित करे।

‘इन्द्रायवि०’ इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें इन्द्र, ‘संस्तुतो०’ इस मन्त्रसे अग्निकोणमें अग्नि, ‘यमश्विना०’ इस मन्त्रसे दक्षिणमें यम, ‘रक्षोहणमिति०’ मन्त्रसे (नैर्ऋत्यमें निर्ऋति) पश्चिममें वरुण तथा ‘त्वं वायुश्च०’ मन्त्रसे वायव्यमें वायुदेवका करे। उत्तरमें ‘ॐ आप्यायस्व०’ मन्त्रसे कुबेरकी पूजा करे। ‘ॐ तमीशानं०’ इस मन्त्रसे ईशान दिशामें ईशान और मण्डपके मध्यभागमें ‘ॐ विष्णोर्नुकमिति०’ मन्त्रसे विष्णुकी पूजा करना चाहिये।

प्रत्येक तोरणके समीप दो-दो कलश स्थापित करके पश्चात् वस्त्र तथा उपवस्त्रसे आच्छादित, चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अलंकृत, पुष्प, विद्वान एवं अन्न-यज्ञ-उपचारोंसे सुशोभित देवताओंको पूजा करनी चाहिये।

‘ॐ शतधारमि०’ मन्त्रसे इन्द्र, ‘ॐ अग्निर्मूर्धा०’ मन्त्रसे अग्नि, ‘ॐ अश्वि०’ मन्त्रसे कि वे यम, ‘ॐ रक्षोहण०’ मन्त्रसे वरुण, ‘ॐ आत्वायां०’ मन्त्रसे कुबेर, ‘ॐ तमीशानं०’ मन्त्रसे आदि दिशाओंको पूजा करके विद्वान् आपस्तंबके मन्त्रसे आदि दिशाओंमें होमद्रव्य एवं अन्न-घृतसे प्रयुक्त वस्तुओंको स्थापित करे।

तदनन्तर वह गुरु वहीं रखी गयी शेन शंख्यादिक शाख-विहित समस्त वस्तुओंपर एक बार दृष्टिपात कर ले, ऐसा करनेसे निश्चित द्रव्योंकी शुद्धि हो जाती है।

तत्पश्चात् हृदयादि षडङ्गोंका न्यास व्याहृति और प्रणवमन्त्रसे संयुक्त करके क्रमशः—’ॐ हृदयाय नमः; ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्; ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ भूर्भुवः स्वः करालकराभ्यां०’ (अस्त्राय फट्; मन्त्रसे करे, मुखसे हुए) हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र, कराल और करभपृष्ठका स्पर्श करे। तदनन्तर ‘ॐ अस्त्राय फट्’ मन्त्रसे अस्त्रका न्यास भी करना चाहिये, क्योंकि यह न्यास-कर्म समस्त इच्छાઓको पूर्ण करनेवाला होता है।

अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अस्त्र और विष्टरको अभिमन्त्रित करके उसी विष्टरके द्वारा यज्ञमण्डपमें एकत्रित समस्त द्रव्योंका स्पर्श करे। तदनन्तर पवित्र पाणिसे किये गये उन अस्त्रोंको अपने चारों ओर बिखेर दे। उसके बाद पूर्व दिशासे लेकर अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत्यकोण, पश्चिम, वायुकोण, उत्तर और ईशानकोणपर्यन्त मण्डपमें अभिमन्त्रित अक्षतोंका निक्षेप करके सम्पूर्ण यज्ञ-मण्डपका लेपन करवाना चाहिये।

तदनन्तर याज्ञिक गुरुको चाहिये कि वह अर्घ्यपात्रमें गन्धाक्षतसे युक्त जलको पूर्णकर मन्त्रसमुच्चयसे उसे अभिमन्त्रित करे। उसी अभिमन्त्रित जलसे यज्ञमन्त्रका प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद जिस देवकी प्रतिष्ठा करनी है, उसी देवके नामसे मण्डपके ईशानकोण कलश स्थापितकर उसके दक्षिण भागमें अन्य-मन्त्रसे अभिमन्त्रित वर्धनीको स्थापना करे। उसके बाद कलश, वर्धनी, ग्रह और वास्तुके लिये देवहित यवाक्षतसे आस्तरणपर प्रतिष्ठाके साथ पूजा करके आचार्य प्रणव-मन्त्रका जप करे। तदनन्तर ध्रुवसे वेष्टित, पञ्चशोंसे युक्त दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर अंगुलि कर करके पुनः पूजा करे, साथ ही उस कलशमें प्रतिष्ठित देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये।

तदनन्तर उत्तम वस्त्रसे वर्धनीको आच्छादित करके उसके साथ करशको घुमाये। वर्धनीको जलधारासे उस कुम्भको सिञ्चित करके उसके आगे ही वर्धनीको स्थापित करे। वर्धनीके साथ उस कुम्भका पूजन करके स्थलमें मूल देवताकी पूजा करे।

उसके बाद वायव्यकोणमें एक घटकी स्थापना करनी चाहिये। उसमें गणपतिका आवाहनकर ‘ॐ गणानां त्वेति०’ मन्त्रसे उनकी पूजा करके ईशानकोणमें दूसरा घट स्थापित करे। उसमें वास्तुदेव-परिवारके लिये ‘ॐ वास्तोष्पते०’ मन्त्रसे पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार स्नान-सम्पन्न उस देवप्रतिमाको सुन्दर वेष-भूषासे अलंकृत करके गुरुपूजाका धूप प्रदान करे। तत्पश्चात् पुनः कुम्भमें पृथ्वीपर विद्यमान सभी तीर्थों, नदियों तथा सागरोंका विन्यास करना चाहिये। उन कुम्भोंको ‘ॐ या ओषधीः०’ मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उनके पुनः उस देवप्रतिमाका अभिषेक करे। जो व्यक्ति अभिषेकके अवशिष्ट जलसे स्नान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

समुद्रके प्रतिनिधिरूप उन कुम्भोंसे उस देवमूर्तिका अभिषेक-कृत्य सम्पन्न होनेके पश्चात् अर्घ्य प्रदान करके ‘ॐ गन्धद्वारेति०’ मन्त्रसे सुगन्धित चन्दनादि पदार्थोंद्वारा अनुलेप करे। साथ ही शास्त्रोंमें विविध वेदमन्त्रोंसे देवमूर्ति-न्यासकी प्रक्रिया भी सम्पन्न करे। तत्पश्चात् ‘ॐ इदं सस्येति०’ मन्त्रके द्वारा वस्त्रोंसे मूर्तिको आच्छादित करे। उसके बाद ‘ॐ कयिष्ठावेति०’ मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस प्रतिमाको सुन्दर मण्डपमें ला करके ‘ॐ शंविश्वा०’ मन्त्रसे शय्यापर स्थापित करे। तदनन्तर ‘ॐ विश्वरूप०’ मन्त्रका उच्चारकर समूल पुण्याहवाचनको सब प्रकारसे परिपूर्ण करे। तत्पश्चात् यहाँपर बैठकर मनतत्वोंका ध्यान करते हुए आचार्यको शास्त्रीय विधानके अनुसार मन्त्रन्यास करना चाहिये। मन्त्रन्यासकी प्रक्रिया परमतत्वोंसे बतायी गयी है। इस न्यासके बाद मण्डपमें प्रतिष्ठापित देवप्रतिमाको वस्त्रसे आच्छादित करना चाहिये और उसकी यथाविधि पुनः पूजा भी करनी चाहिये। शास्त्रीय विधिके अनुसार जो देवकी समर्पित करना है, वह उनके पादमूलमें समर्पित करना चाहिये। इसके अतिरिक्त देवत्वके तिरोभागमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित, स्वर्णसे युक्त एवं प्रणवसे अंकित कलश स्थापित करना चाहिये।

तदनन्तर कुम्भके सन्निकट बैठकर आचार्य वेदमन्त्रोच्चारके साथ अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर पूर्वादिदेशमें ऋग्वेदादि सुकोके कुण्डके समीप बैठकर श्रीसूक्त तथा पवमान आदि सूक्तोंका पाठ करे।

कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित अश्वत्थ अर्थात् यजुर्वेदवेत्ता आचार्य हंसरूप तथा पुरुषसूक्तका परायण करे। कुण्डके पश्चिममें बैठा हुआ उद्गाता सामवेदीय आचार्य वेदव्रत, वामदेव्य, ज्येष्ठसाम, रथन्तर एवं भैरवदेसम्मका पाठ करे। कुण्डके उत्तर दिशामें स्थित वेदीपर उस ब्रह्मवेदीके पास अथर्ववेदी आचार्य भृगु, शान्तिक, पौष्टिक, आभिचारिक, कुम्भसूक्त, नीलरुद्रसूक्त एवं भैषज्यसूक्तका पाठन करे।

तदनन्तर आचार्य अस्त्र-मन्त्रके द्वारा भलीभाँति कुण्डका प्रोक्षण करके स्वसामर्थ्यके अनुसार प्राप्त ताम्र या अन्य किसी धातुके निर्मित पात्रमें अग्नि ग्रहणकर उस युक्तिके आगे स्थापित करे। तत्पश्चात् उस अग्निको अस्त्र-मन्त्रसे प्रक्षालित करके कवच-मन्त्रके द्वारा वेष्टित कर देना चाहिये (इसे अग्निका अमृतीकरण-कृत्य कहते हैं)।

इस प्रकार अमुद्रिकृत अग्निको गुरु वेदमन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके शास्त्रकेत कुण्डके चारों ओर घुमाये और वैष्णवयोगसे उसे प्रज्वलितकर वहाँ कुण्डके मध्य स्थापित करे।

अग्निके दक्षिणमें ब्रह्मा और उत्तरमें प्रणीताको स्थापितकर कुण्डकी प्रत्येक दिशाओं एवं विदिशाओंमें कुशके विष्टरोंसे परिधिका निर्माण करे।

तदनन्तर गुरु ब्रह्मा, विष्णु, हर और ईशानकी पूजा करके दर्भोके ऊपर अग्निको रखकर दर्भसे ही वेष्टित करके दर्भजलसे ही प्रोक्षण करे, क्योंकि कुशद्वारा प्रदान जलका प्रोक्षण करनेसे बिना मन्त्रके भी शुद्धि हो जाती है और पूर्वार्ध, उत्तरार्ध एवं पश्चिमाग्र अखण्डित तथा विस्तृत कुशाओंसे वेष्टित ब्रह्मके देवताका सान्निध्य स्वयं ही हो जाता है।

अग्निको रक्षके लिये मन्त्रज्ञोंसे जो उपर्युक्त नियम कहे हैं, उनके विषयमें कुछ आचार्योंका विचार है कि उन सभी कृत्योंको जातकर्मा-संस्कारके पश्चात् करना चाहिये।

अग्निका पवित्रीकरण करके आचार्यको आत्म-संस्कार करना चाहिये। अनन्तर आभ्य (घृत)-की आहुतियोग्य बनानेके लिये उसका अवेक्षण, निनोञ्जन, नीराञ्जन एवं अभ्यषण एवं अभिघार’ नामका कृत्यसमूहसे पूर्ण करना चाहिये। तदनन्तर उस आभ्यसे पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। उसके बाद गर्भधान-संस्कारसे लेकर गेन्दन-संस्कारपर्यन्त अग्निका संस्कार करके आचार्यको अपनी शाखाके अनुसार विहित मन्त्रोंसे अथवा प्रणवसे आहुति प्रदान कर करे? पूर्णाहुतिके पश्चात् आचार्य अन्तमें पूर्णाहुति प्रदान करे, क्योंकि पूर्णाहुतिसे ही यजमानकी अभिलाषा पूर्ण हो जाती है।

इन वेदि-विहित नियमोंसे उत्पन्न हुई अग्नि सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली होती है। अतएव पुनः उसकी पूजा करके अन्य सभी कुण्डोंमें उसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। वहाँ प्रत्येक आचार्य अपने शास्त्रमन्त्रोंसे इन्द्रादि सभी देवोंको सौ-सौ आहुतियाँ प्रदान करे। सौ आहुतियोंके पश्चात् पूर्णाहुति समर्पित करके सभी देवोंको एक-एक आहुति पुनः प्रदान करनी चाहिये।

होता अपने द्वारा अनुष्ठित आग्न्याहुतिके शेष भागको यथाविधान कलशमें समर्पित करे। इसके बाद भगवान् देवता, मन्त्र एवं अग्निके साथ अपने तादात्म्यकी भावना करते हुए, पूर्णाहुति सम्पन्न कराये।

यज्ञमण्डपसे बाहर आकर आचार्य दिक्पालोंको बलि प्रदान करे। इस बलिकृत्यके साथ पुष्प, देवताओं और नागोंको बलि देनी चाहिये। तिल और सर्षिया—यही दो होम-पदार्थ विहित हैं। आभ्य तो उन दोनोंका सहयोगी है, क्योंकि घृतके बिना हवनीय द्रव्य अक्षम्य (परिपूर्ण) नहीं होता।

इस हवनकृत्यमें पुरुषसूक्त, हंसरूप, ज्येष्ठसाम तथा ‘त्र्यम्बकं’ इस मन्त्रसे युक्त भार्गवसूक्त, महामन्त्रके रूपमें प्रसिद्ध नीलरुद्रसूक्त एवं अथर्वके कुम्भसूक्तका परायण यथाक्रम पूर्व, दक्षिण तथा पश्चिम आदि दिशाओंमें आसीन ऋषियोंसे करवाना चाहिये। इस हवन-कर्ममें एक-एक सहस्र आहुतिका विधान है और इन आहुतियोंमें वेदोंके आदि मन्त्रों, देवताके नाम-मन्त्रों, अपनी शाखाके विहित मन्त्रों, गायत्री-मन्त्रके साथ पञ्चविधान व्याहृति एवं प्रणवका प्रयोग करना चाहिये। साथ ही यह भावना करनी चाहिये कि इन हम आहुतियोंको देवताके तिरोभाग, मध्यभाग तथा पादभाग आदिमें समर्पित कर रहे हैं और स्वयंको देवमय समझना चाहिये।

इस प्रकार होम-विधिको सम्पन्न करके देवोंका (आचार्य)-को चाहिये कि वह देव-विग्रहमें मन्योंका न्यास करे। यथा—’ॐ अग्निरसोके’ देवके दोनों चरणोंमें, ‘ॐ इन्द्रवेति०’ मन्त्रका दोनों गुल्फोंमें, ‘ॐ शन्न आप्याहि०’ मन्त्रसे देवके दोनों जंघोंमें, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रका दोनों जानुओंमें, ‘ॐ बुधवादन्यन्त्र’ मन्त्रका दोनों ऊरुओंमें न्यास विहित है। देवके उदर भागमें भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। तदनन्तर ‘ॐ दीर्घाग्रव०’ मन्त्रका देवके हृदयमें, ‘ॐ श्रीसूक्ते०’ मन्त्रका गलेमें, ‘ॐ शतधारमि०’ मन्त्रका वक्षःस्थलमें, ‘ॐ त्र्यम्बक०’ मन्त्रका दोनों नेत्रोंमें तथा ‘ॐ मूर्धा भुव०’ मन्त्रका मस्तकमें न्यास करके विहित लग्नानुदृष्टमें हवन करे।

इसके पश्चात् ‘ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०’ मन्त्रसे देवमूर्तिका उत्थापन करके मन्त्रवेत्ता आचार्य ‘देवस्य त्वा०’ मन्त्रसे मूर्तिका स्पर्श करते हुए वेदोक्त पुण्याहवाचनके साथ देवप्रासादकी प्रदक्षिणा करे। इसके अनन्तर विविध रङ्ग, विविध धातु, लौहदव्य एवं विधानके अनुसार अनेक प्रकारके सिन्दूरोंके साथ दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रतिष्ठा विहित है। इसके अनन्तर यथास्थान प्रधान देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये।

देवमूर्तिको पीठके मुख्य गर्भभागमें स्थापित नहीं करना चाहिये और न उस गर्भका परित्याग करके अन्यत्र ही उसकी स्थापना होनी चाहिये, अपितु गर्भभागका कुछ भाग छोड़कर उसे स्थापित करनेसे दोषका परिहार हो जाता है। अतः लिङ्गके कणमात्र परिमाणमें मूर्तिको उपरकी ओर कुछ बढ़ा लेना चाहिये।

‘ॐ शिवो भव०’, ‘शिवो भव०’, प्रज्ञानायश्च नमो नमः’, ‘देवस्य त्वा सवितुः०’ आदि मन्त्रोंसे गुरु देवमूर्तिका यथाविधि विन्यास एवं अभिमन्त्रण करे। साथ ही सुप्रतिष्ठित देवप्रतिमाकी यथाविधान सम्पत्कलशके जलसे ही स्नान कराना चाहिये।

तदनन्तर धूप-दीप, अन्य सुगन्धित पदार्थ तथा नैवेद्यसे उस देवप्रतिमाकी विधिसे पूजा करके और प्रणाम निवेदन करके क्षमा-प्रार्थना करे।

इसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार यजमान ऋत्विकोंको पात्र, वस्त्र एवं उपवस्त्र, छत्र, सुन्दर वस्तुए और अँगूठी तथा दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। तदनन्तर सखवाचन होकर यजमान चतुर्गा होम करे। सौ आहुतियोंकी देकर अन्तमें वह पूर्णाहुति प्रदान करे।

इसके बाद आचार्य मण्डपसे बाहर आकर दिक्पालोंको बलि प्रदान करके पूजन लेकर ‘क्षमस्व’ इस वाक्यसे उन देवोंका विसर्जन कर दे।

इस प्रकार यह पूर्ण होनेके पश्चात् आचार्यको कपिला धेनु, चामर, मुकुट, कुण्डल, छत्र, केयूर, कटिसूत्र, व्यञ्जन (पङ्खा), वस्त्रादि वस्तुए और ग्राम तथा साज-सजापूर्ण सुन्दर भवन प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर आचार्य तथा अन्य सहयोगीजनोंको लिये सुन्दर विशाल भोजका आयोजन कराकर सबको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा करनेसे यजमान कृतार्थ हो जाता है और वासुदेवकी प्रसन्नतासे उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: वास्तु एवं गृहनिर्माण