नवनिधियों के लक्षणों से युक्त पुरुष के ऐश्वर्य एवं स्वभाव का वर्णन
सूतजी ने कहा—भगवान् विष्णु से अष्टनिधियों के विषय में सुनकर ब्रह्माजी ने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि ‘पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शङ्ख नाम की अष्टनिधियाँ’ हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूप का वर्णन करता हूँ।
पद्मनिधि के लक्षणों से सम्पन्न मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुण से सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण-चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओं का संग्रह कर के यतियों, देवताओं और याचिकों को दान करता है। महापद्म-चिह्न से लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदि का दान धार्मिक जनों को करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधिसम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाव वाले कहे गये हैं।
मकरनिधि के चिह्न से चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त (भाला) आदि अस्त्रों का संग्रह करने वाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दान देता है और राजाओं के साथ उस की सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादि का आहरण करने के लिये यह शत्रुओं का विनाश करता है और युद्ध के लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि-सहित व्यक्ति तामस गुण वाले होते हैं। कच्छप-चिह्न से युक्त व्यक्ति किसी पर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्ति का स्वयं उपभोग करता है और न तो उस में से वह किसी को कुछ देता ही है। वह एकान्त में जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति को पृथ्वी में गाड़ कर छिपा देता है। उस की सम्पत्ति एक पौढ़ी तक रहती है।
मुकुन्दनिधि के चिह्न से अंकित पुरुष रजोगुणसम्पन्न होता है। वह राज्य-संग्रह में लगा रहता है, वह भोगों का उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदि को धन देता है। नन्दनिधि से युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणों वाला होता है। वही कुल का आधार बनता है। वह स्तुति करने पर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियों का पति होता है। पूर्वकाल के मित्रों में उस को प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रों के साथ प्रेम करने लगता है।
नीलनिधि के चिह्न से सुशोभित मानव सात्त्विक तेज से संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादि का संग्रह तथा तड़ागादि का निर्माण करता है। उस के द्वारा (जनहित में) आरादि के उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उस की सम्पत्ति तीन पौढ़ी तक रहती है।
शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पौढ़ी)-के लिये होती है। इस से समन्वित मनुष्य धनादि का स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उस के परिजन कुत्सित अन्न का भोजन तथा अच्छे न लगने वाले मैले-कुचैले वस्त्रों से जीवनयापन करते हैं। वह स्वयं के भरण-पोषण में सदैव तत्पर रहता है। यदि यह किसी को कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थ की वस्तु होती है (जिस का कोई उपयोग नहीं होता)।
मिश्र (मिली-जुली)-निधि के चिह्न से युक्त होने पर मनुष्य के स्वभाव में मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।
भगवान् विष्णु ने भी निधियों के ऐसे ही स्वरूप का वर्णन शिव आदि देवों से किया था (उस को मैंने आप सभी को सुना दिया)। अब हरि ने भुवनकोशादि का जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)
सूतजी ने कहा—भगवान् विष्णु से अष्टनिधियों के विषय में सुनकर ब्रह्माजी ने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि ‘पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शङ्ख नाम की अष्टनिधियाँ’ हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूप का वर्णन करता हूँ।
पद्मनिधि के लक्षणों से सम्पन्न मनुष्य सात्त्विक और दाक्षिण्य गुण से सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण-चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओं का संग्रह कर के यतियों, देवताओं और याचिकों को दान करता है। महापद्म-चिह्न से लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदि का दान धार्मिक जनों को करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधिसम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाव वाले कहे गये हैं।
मकरनिधि के चिह्न से चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त (भाला) आदि अस्त्रों का संग्रह करने वाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दान देता है और राजाओं के साथ उस की सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादि का आहरण करने के लिये यह शत्रुओं का विनाश करता है और युद्ध के लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि-सहित व्यक्ति तामस गुण वाले होते हैं। कच्छप-चिह्न से युक्त व्यक्ति किसी पर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्ति का स्वयं उपभोग करता है और न तो उस में से वह किसी को कुछ देता ही है। वह एकान्त में जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति को पृथ्वी में गाड़ कर छिपा देता है। उस की सम्पत्ति एक पौढ़ी तक रहती है।
मुकुन्दनिधि के चिह्न से अंकित पुरुष रजोगुणसम्पन्न होता है। वह राज्य-संग्रह में लगा रहता है, वह भोगों का उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदि को धन देता है। नन्दनिधि से युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणों वाला होता है। वही कुल का आधार बनता है। वह स्तुति करने पर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियों का पति होता है। पूर्वकाल के मित्रों में उस को प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रों के साथ प्रेम करने लगता है।
नीलनिधि के चिह्न से सुशोभित मानव सात्त्विक तेज से संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादि का संग्रह तथा तड़ागादि का निर्माण करता है। उस के द्वारा (जनहित में) आरादि के उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उस की सम्पत्ति तीन पौढ़ी तक रहती है।
शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पौढ़ी)-के लिये होती है। इस से समन्वित मनुष्य धनादि का स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उस के परिजन कुत्सित अन्न का भोजन तथा अच्छे न लगने वाले मैले-कुचैले वस्त्रों से जीवनयापन करते हैं। वह स्वयं के भरण-पोषण में सदैव तत्पर रहता है। यदि यह किसी को कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थ की वस्तु होती है (जिस का कोई उपयोग नहीं होता)।
मिश्र (मिली-जुली)-निधि के चिह्न से युक्त होने पर मनुष्य के स्वभाव में मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।
भगवान् विष्णु ने भी निधियों के ऐसे ही स्वरूप का वर्णन शिव आदि देवों से किया था (उस को मैंने आप सभी को सुना दिया)। अब हरि ने भुवनकोशादि का जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: निधि