ज्योतिश्चक्र में वर्णित नक्षत्र, उन के देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तों का वर्णन

श्रीसूतजी ने कहा—[ऋषियो!] केशव ने भगवान् शिव से पृथिव्यादि का परिमाण बता कर कहा कि हे रुद्र! ज्योतिष्-शास्त्र की गणना चार लाख में है, पर उन में से अब ज्योतिर्विद आचार्य नक्षत्रों से युक्त राशिचक्र का संक्षेप से वर्णन करूँगा, जो सब कुछ देने वाला है।

श्रीहरि ने कहा—हे शिव! कृत्तिका नक्षत्र के देवता अग्नि हैं। रोहिणी नक्षत्र के देवता ब्रह्मा हैं। मृगशिरा के चन्द्रमा तथा आर्द्रा के रुद्र देवता कहे गये हैं। इसी प्रकार पुनर्वसु के आदित्य तथा तिष्य पुष्य के गुरु हैं। आश्लेषा नक्षत्र के सर्प तथा मघा नक्षत्र के देवता पितृगण हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के देवता भगव (भग), उत्तराफाल्गुरी के अर्यमा, हस्त के सविता और चित्रा के देवता त्वष्टा हैं। स्वाती नक्षत्र के देवता वायु और विशाखा नक्षत्र के देवता इन्द्राग्नि हैं। अनुराधा नक्षत्र के देवता मित्र और ज्येष्ठा के शुक्र (इन्द्र) देवता कहे गये हैं। नक्षत्रज्ञ विद्वानों ने मूल नक्षत्र का देवता निर्ऋति को बताया है। पूर्वाषाढ नक्षत्र के देवता आप् तथा उत्तराषाढ के विश्वदेव हैं। अभिजित् नक्षत्र के देवता ब्रह्मा और श्रवण के विष्णु कहे गये हैं। धनिष्ठा नक्षत्र के देवता वसु तथा शतभिषक् के वरुण कहे गये हैं। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के देवता अजपाद, उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुध्न्य, रेवती के पूषा, अश्विनी के अश्विनीकुमार और भरणी के यम देवता कहे गये हैं।

प्रतिपदा तथा नवमी तिथि में ब्रह्माणी नाम की योगिनी पूर्व दिशा में अवस्थित रहती है। द्वितीया और दशमी तिथि में माहेश्वरी नामक योगिनी उत्तर दिशा में रहती है। पञ्चमी तथा त्रयोदशी तिथि में वाराही नामक योगिनी दक्षिण दिशा में स्थित रहती है।

षष्ठी और चतुर्दशी तिथि में इन्द्राणी नाम की योगिनी का वास पश्चिम में होता है। सप्तमी और पौर्णमासी तिथि में चामुण्डा नाम से अभिहित योगिनी का निवास वायव्यकोण में रहता है। अष्टमी तथा अमावस्या में महालक्ष्मी नाम की योगिनी ईशानकोण में रहती है। एकादशी एवं तृतीया तिथि में वैष्णवी नाम की योगिनी अग्निकोण में वास करती है। द्वादशी और चतुर्थी तिथि में कौमारी योगिनी का समूह नैर्ऋत्यपर यात्रा नहीं करनी चाहिये।

अश्विनी, अनुराधा, रेवती, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त और ज्येष्ठा नक्षत्र प्रस्थान (यात्रा)-के लिये प्रशस्त कहे गये हैं।

हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा—ये पाँच नक्षत्र तथा उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र नवीन वस्त्र धारण करने के लिये श्रेष्ठ हैं।

कृत्तिका, भरणी, आश्लेषा, मघा, मूल, विशाखा तथा पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ और पूर्वाफाल्गुनी—इन नक्षत्रों को उग्रदंष्ट्र कहा गया है। इन अधोमुखी नक्षत्रों में वापी, तड़ाग, सरोवर, कूप, भूमि, तृण आदि का खनन, देवालय के लिये नीव आदि के खनन का शुभ कार्य, भूमि में गड़े हुए धन-सम्पत्ति की खुदाई, ज्योतिषचक्र का गणना रूप और सुवर्ण, रक्त, रञ्जन तथा अन्य धातुओं को प्राप्त करने के लिये भूमि-खनन, ज्योतिष आदि अन्य अधोमुखी कार्य इन अधोमुखी नक्षत्रों में करने चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा एवं ज्येष्ठा नक्षत्र पार्श्वमुखी हैं। इन पार्श्वमुखी नक्षत्रों में हाथी, ऊँट, अश्व, बैल तथा भैंसे को वश में करने का उपाय करना चाहिये (अर्थात् इन के नाम आदि के छेदने करके छल्ला या रस्सी डालने का कार्य करना चाहिये।)

खेतों में बीज बोना, गमनागमन, चक्रयन्त्र (चरखी, चरखा, रहट आदि यन्त्र) अथवा रथ एवं नौकादि का क्रय और निर्माण उक्त पार्श्वमुखी नक्षत्रों में करना चाहिये और अन्य पार्श्व कार्यों को भी इन पार्श्व नक्षत्रों में करना चाहिये।

रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, धनिष्ठा, उत्तराषाढ, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, शतभिषक् (वारुण) तथा श्रवण—ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुखी कहे गये हैं। इन नक्षत्रों में राज्याभिषेक और षटुवन्ध आदि शुभ कार्य करने चाहिये।

ध्रुव अर्थात् अनुदय प्रदान करने वाले अन्य विशिष्ट कार्यों को भी इन नक्षत्रों में करना प्रशस्त होता है।

चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा तिथि अशुभ होती हैं। इन तिथियों में शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा गुरुवार से युक्त द्वितीया तिथि शुभ होती है। यदि भूमिपुत्र मंगल से युक्त तृतीया हो, शनैश्चर से युक्त षष्ठी हो, गुरु से युक्त षष्ठी पड़ रही हो। षष्ठी, पञ्चमी या शुक्रवार हो तो वे तिथियाँ भी शुभ होती हैं। बुधवार को सप्तमी, मंगल तथा रविवार को अष्टमी, सोमवार को नवमी और गुरुवार को एकादशी दशमी तिथि शुभ होती है। एकादशी तिथि में गुरु तथा शुक्र होने पर शुभ है। द्वादशी तिथि में पञ्चगर, शुक्र तथा मंगलवार को त्रयोदशी और शनिवार को चतुर्दशी तिथि शुभ होती है। इसी प्रकार बृहस्पतिवार को पूर्णिमा या अमावस्या तिथि होने पर शुभ होता है।

द्वादशी तिथि रविवार, एकादशी सोमवार, दशमी मंगलवार, नवमी बुधवार, अष्टमी गुरुवार, सप्तमी शुक्रवार और षष्ठी तिथि शनिवार से युक्त होने पर शुभ है। ऐसे तिथि-नक्षत्र-योग में यात्रादि का शुभारम्भ नहीं करना चाहिये। प्रतिपदा, नवमी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियों में यदि बुधवार का संयोग हो तो उस तिथि में प्रथमादिक के विचार का दृढ़ा ही परित्याग करना चाहिये। मेष और कर्क-संक्रान्तिकी चतुर्दशी, तुला-संक्रान्तिकी अष्टमी, वृष तथा कुम्भ-संक्रान्तिकी चतुर्थी, मकर और तुला-संक्रान्तिकी द्वादशी, वृश्चिक और सिंह-संक्रान्तिकी दशमी तथा धनु और मीन-संक्रान्तिकी चतुर्दशी—ये दग्ध तिथियाँ हैं। इन तिथियों में यात्रादि नहीं करनी चाहिये। वे अनिष्टदायक होती हैं।

हे शिव! रविवार को विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा योग, सोमवार को दिन पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ तथा श्रवण नक्षत्र का योग, मंगलवार को धनिष्ठा, शतभिषक् और पूर्वाभाद्रपद योग, बुधवार में रेवती, अश्विनी तथा भरणी का योग, बृहस्पतिवार को रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्रा का योग, शुक्रवार में पुष्य, आश्लेषा एवं मघा का योग, शनिवार को उत्तराफाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा नक्षत्र का योग होने पर मृत्यु तुल्य योग होता है। इन योगों में गमनादि कार्य वर्जित है।

उत्पात, मृत्यु और रोग की उत्पत्ति होती है।

हे रुद्र! रविवार को मूल, सोमवार को श्रवण, मंगलवार को उत्तराभाद्रपद, बुधवार को कृत्तिका, बृहस्पतिवार के दिन पुनर्वसु, शुक्रवार को पूर्वाफाल्गुनी तथा शनिवार को स्वाती नक्षत्र हो तो अमृत योग होता है। ये सभी कार्यों को सिद्ध करने वाले हैं।

विष्कुम्भ योग की पाँच घटी, शूल योग की सात घटी, गण्ड तथा अतिगण्ड योग की छः-छः घटी, व्याघात और वज्र योग की नौ-नौ घटी एवं व्यतीपात, परिघ और वैभृति योग—ये मृत्यु तुल्य कहलाने वाले हैं, इन में सभी कर्मों का परित्याग करना चाहिये।

रविवार को हस्त, गुरुवार को पुष्य, बुधवार को अनुराधा नक्षत्र—ये शुभ होते हैं। शनिवार को रोहिणी उत्तम और सोमवार को मृगशिरा नक्षत्र शुभ है। इसी प्रकार शुक्रवार को रेवती तथा मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र शुभ फल देता है। इस प्रकार का योग होने पर सिद्धि योग बनता है। ये सिद्धि योग सभी प्रकार के दोषों का विनाश करने वाले होते हैं।

हे वृषध्वज! बुधवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ, बुधवार को धनिष्ठा, बृहस्पतिवार के शतभिषक्, शुक्रवार को रोहिणी और शनिवार को रेवती नक्षत्र होने पर विष योग होता है।

पुष्य, पुनर्वसु, रेवती, चित्रा, श्रवण, धनिष्ठा, हस्त, अश्विनी, मृगशिरा एवं शतभिषक् नक्षत्र होने पर जातकर्मादि संस्कार करने के लिये उत्तम माने गये हैं।

हे शिव! विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, मघा, आर्द्रा, भरणी, आश्लेषा और कृत्तिका नक्षत्र में यात्रा करने पर मृत्यु का भय रहता है। (अध्याय ५९)

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: योगों तथा मुहूर्तों का वर्णन