लग्न-फल, राशियों के चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहों का स्वभाव तथा विवाह में किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य
श्रीहरि ने कहा—हे शिव! सूर्य उदकाल में मेषादि राशियों को आरम्भ में शेष छः राशियाँ हैं। वे दिन में क्रमशः पराक्रान्त होती हैं।
मेष लग्न के जन्म होने पर वह वन्ध्या होती है। वृष लग्न में उत्पन्न हुई कन्या दुःखित होती है, मिथुन-लग्न वाली सौभाग्य शालिनी तथा कर्क लग्न में उत्पन्न हुई कन्या वेश्या होती है। सिंह लग्न में जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्र वाली, कन्या लग्न वाली रूप से सम्पन्न, तुला लग्न वाली रूप और ऐश्वर्य से युक्त तथा वृश्चिक लग्न वाली कर्कशा स्वभाव की होती है। धनु लग्न में उत्पन्न हुई कन्या सौभाग्य वती तथा मकर लग्न वाली निम्न पुरुष गामिनी होती है। कुम्भ लग्न में उत्पन्न कन्या अल्पपुत्री तथा मीन लग्न वाली वैराग्य युक्त होती है। तुला, कर्क, मेष और मकर—ये चर राशियाँ हैं, इन में यात्रादि के कार्य करने चाहिये। सिंह, वृष, कुम्भ और वृश्चिक स्थिर राशि हैं। इन में स्थिर कार्य करने चाहिये। कन्या, धनु, मीन एवं मिथुन राशि द्वस्वभाव की होती हैं। विद्वान् व्यक्ति को इन राशियों में द्वस्वभाव के युक्त कार्य करने चाहिये। यात्रा करने में तथा गृह-प्रवेशादि का स्थिर लग्न में करना चाहिये। देवताओं की स्थापना और वैवाहिक संस्कारों को द्वस्वभाव के लग्न में करना श्रेयस्कर है।
हे वृषध्वज! प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी तिथियाँ नन्दा मानी जाती हैं। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ भद्रा कही गयी हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियाँ जया कहलाती हैं। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी—ये रिक्ता तिथि हैं। ये शुभ कार्य के लिये वर्जित हैं।
सौम्य स्वभाव वाला बुध ग्रह चर स्वभाव है। गुरु छिद्र, शुक्र मृदु और रवि ध्रुव स्वभाव का है। शनि दारुण, मंगल उग्र तथा चन्द्र को सम स्वभाव का जानना चाहिये।
चर और स्थिर स्वभाव वाले (अर्थात् बुध एवं बृहस्पति) कार्य में यात्रा करनी चाहिये तथा मृदु और ध्रुव स्वभाव से संयुक्त शुक्र अथवा रवि वार को ग्रह-प्रवेशादि का कार्य करना चाहिये। दारुण और उग्र स्वभाव वाले शनि तथा मंगलवार को विजय प्राप्त करने की अभिलाषा से क्षत्रियादि वीरों को युद्ध के लिये प्रस्थान करना चाहिये।
राज्याभिषेक और अग्नि कार्य सोमवार को प्रशस्त माना गया है। सोमवार से विद्या का कार्य एवं गुरु का शुभारम्भ करना श्रेयस्कर है। मंगलवार को सेनापति का पद-भार वहन करना, शौर्य, पराक्रम का कार्य तथा शस्त्राभ्यास करना शुभ है। बुध के दिन किसी कार्य की सिद्धि के लिये प्रबन्धन करना, मन्त्रणा करना और यात्रा करना सफलता दायक माना गया है। बृहस्पतिवार को वेदपाठ, देवपूजा, यज्ञ तथा अलंकारादि धारण के कार्य करने चाहिये। शुक्रवार को कन्यादान, गजरोहण तथा स्त्री विलास उचित है। शनिवार को गृह प्रवेश, गृह प्रवेश और राजस्व सम्बन्धी के कार्य शुभ माने गये हैं। (अध्याय ६२)
श्रीहरि ने कहा—हे शिव! सूर्य उदकाल में मेषादि राशियों को आरम्भ में शेष छः राशियाँ हैं। वे दिन में क्रमशः पराक्रान्त होती हैं।
मेष लग्न के जन्म होने पर वह वन्ध्या होती है। वृष लग्न में उत्पन्न हुई कन्या दुःखित होती है, मिथुन-लग्न वाली सौभाग्य शालिनी तथा कर्क लग्न में उत्पन्न हुई कन्या वेश्या होती है। सिंह लग्न में जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्र वाली, कन्या लग्न वाली रूप से सम्पन्न, तुला लग्न वाली रूप और ऐश्वर्य से युक्त तथा वृश्चिक लग्न वाली कर्कशा स्वभाव की होती है। धनु लग्न में उत्पन्न हुई कन्या सौभाग्य वती तथा मकर लग्न वाली निम्न पुरुष गामिनी होती है। कुम्भ लग्न में उत्पन्न कन्या अल्पपुत्री तथा मीन लग्न वाली वैराग्य युक्त होती है। तुला, कर्क, मेष और मकर—ये चर राशियाँ हैं, इन में यात्रादि के कार्य करने चाहिये। सिंह, वृष, कुम्भ और वृश्चिक स्थिर राशि हैं। इन में स्थिर कार्य करने चाहिये। कन्या, धनु, मीन एवं मिथुन राशि द्वस्वभाव की होती हैं। विद्वान् व्यक्ति को इन राशियों में द्वस्वभाव के युक्त कार्य करने चाहिये। यात्रा करने में तथा गृह-प्रवेशादि का स्थिर लग्न में करना चाहिये। देवताओं की स्थापना और वैवाहिक संस्कारों को द्वस्वभाव के लग्न में करना श्रेयस्कर है।
हे वृषध्वज! प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी तिथियाँ नन्दा मानी जाती हैं। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ भद्रा कही गयी हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियाँ जया कहलाती हैं। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी—ये रिक्ता तिथि हैं। ये शुभ कार्य के लिये वर्जित हैं।
सौम्य स्वभाव वाला बुध ग्रह चर स्वभाव है। गुरु छिद्र, शुक्र मृदु और रवि ध्रुव स्वभाव का है। शनि दारुण, मंगल उग्र तथा चन्द्र को सम स्वभाव का जानना चाहिये।
चर और स्थिर स्वभाव वाले (अर्थात् बुध एवं बृहस्पति) कार्य में यात्रा करनी चाहिये तथा मृदु और ध्रुव स्वभाव से संयुक्त शुक्र अथवा रवि वार को ग्रह-प्रवेशादि का कार्य करना चाहिये। दारुण और उग्र स्वभाव वाले शनि तथा मंगलवार को विजय प्राप्त करने की अभिलाषा से क्षत्रियादि वीरों को युद्ध के लिये प्रस्थान करना चाहिये।
राज्याभिषेक और अग्नि कार्य सोमवार को प्रशस्त माना गया है। सोमवार से विद्या का कार्य एवं गुरु का शुभारम्भ करना श्रेयस्कर है। मंगलवार को सेनापति का पद-भार वहन करना, शौर्य, पराक्रम का कार्य तथा शस्त्राभ्यास करना शुभ है। बुध के दिन किसी कार्य की सिद्धि के लिये प्रबन्धन करना, मन्त्रणा करना और यात्रा करना सफलता दायक माना गया है। बृहस्पतिवार को वेदपाठ, देवपूजा, यज्ञ तथा अलंकारादि धारण के कार्य करने चाहिये। शुक्रवार को कन्यादान, गजरोहण तथा स्त्री विलास उचित है। शनिवार को गृह प्रवेश, गृह प्रवेश और राजस्व सम्बन्धी के कार्य शुभ माने गये हैं। (अध्याय ६२)
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: योगों तथा मुहूर्तों का वर्णन