सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार स्त्री-पुरुष के शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखा से आयु का परिज्ञान

श्रीहरि ने कहा—हे शिव! अब मैं स्त्री-पुरुष के लक्षणों का वर्णन संक्षेप में कर रहा हूँ। आप सुनें।

जिन के हाथ-पाँव के तल पसीने से रहित हों, कमल के भीतरी भाग की तरह मृदु एवं रक्त हों, अँगुलियाँ सटी हुई हों, नख रक्त वर्ण के समान थोड़े रक्त हों, पाँव सुन्दर गुल्फ वाले, नसों से रहित और कूर्म के समान उन्नत हों, उन्हें नृप श्रेष्ठ समझना चाहिये।

रूक्ष एवं थोड़ा पीलापन लिये, श्वेत नख वाले, वक्र तथा नसों से भरे हुए और विरल अँगुलियों से युक्त शुष्काकार चरणों वाले मनुष्य दुःख एवं दरिद्र होते हैं।

अत्यन्त रोये युक्त, गण्डस्थल के समान सुन्दर जंघा-प्रदेश तथा एक-एक रोये युक्त हेमसदृश रोमावली वाले शरीर राजाओं और महात्माओं का माना गया है। प्रत्येक रोमकूप में दो-दो रोम होने पर मनुष्य श्रोत्रिय या पण्डित होता है। तीन-तीन रोमों से व्याप्त रोमकूप दरिद्रों के होते हैं।

मांस रहित, अत्यन्त कृश जानुपुरुष वाला मनुष्य रोगी होता है। समान उदर भाग से सुशोभित मनुष्य अतिशय भोग से समृद्ध और कूर्म के सदृश उन्नत या सर्प के समान उदर भाग वाले लोग अत्यन्त दरिद्र होते हैं। रेखाओं के द्वारा आयु का निर्णय किया जाता है।

ललाट पर समान आकार वाली तीन रेखाएँ स्पष्ट दिखायी देती हैं, वह पुष्टादि से सम्पन्न रहकर सुख पूर्वक साठ वर्ष तक जीवित रहता है। मस्तक पर दो रेखाओं के दृष्टिगोचर होने पर मनुष्य की आयु चालीस वर्ष की होती है। एक रेखा के होने पर उस मनुष्य का जीवन बीस वर्ष मानना चाहिये, किंतु कर्म पर्यन्त एक रेखा होने पर वह शतायु होता है।

ललाट पर कान तक विस्तृत दो रेखाओं के होने पर मनुष्य की आयु सत्तर वर्ष तथा वैसी ही तीन रेखाओं के होने पर उस की आयु साठ वर्ष होती है। ललाट पर रेखाओं की व्यक्त (प्रकट)-अव्यक्त (अप्रकट) स्थिति होने पर रेखाहीन ललाट के होने पर मनुष्य चालीस वर्ष तक जीवित रहता है। रेखाओं के छिद्र-भिन्न रहने पर मनुष्य की अकाल मृत्यु होती है।

जिस के मस्तक पर त्रिशूल अथवा फरसे के समान चिह्न दिखायी देता है, वह धन-पुत्रादि से परिपूर्ण होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है।

हे रुद्र! तर्जनी और मध्यमा अँगुलि के मध्य भाग तक अङ्गुरेखा के पहुँचने पर मनुष्य शतायु होता है। अङ्गुष्ठ के मूल भाग से निकलने वाली प्रथम रेखा जानरेखा है। मध्यमा अँगुलि के मूल से जो रेखा जाती है, वह आयुरेखा है। इस रेखा कनिष्ठा अँगुलि के मूल से निकलकर मध्यमा के पार करती है। यदि यह रेखा विच्छिन्न या किसी अन्य रेखा से विभक्त नहीं होती है तो ऐसे व्यक्ति की आयु सौ वर्ष होती है।

हे रुद्र! जिस के हाथ में यह आपुरेखा स्पष्ट दिखायी देती है। उस की आयु सौ वर्ष अवश्य होती है, इस में सन्देह नहीं। जो रेखा कनिष्ठा अँगुलि के मूल से होकर मध्यमा अँगुलि के मूल तक विस्तृत प्राप्त करती है, वह मनुष्य को साठ वर्ष प्रदान करने में सक्षम होती है। (अध्याय ६३)

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: लक्षण