स्त्री एवं पुरुषों के शुभाशुभ लक्षण

स्त्री एवं पुरुषों के शुभाशुभ लक्षण

श्रीहरि ने कहा—अब मैं सामुद्रिकशास्त्र में कहे गये स्त्री और पुरुष के शुभाशुभ लक्षणों का वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेने से भ्रष्ट तथा भविष्य का ज्ञान हो जाता है।

मार्ग में गमन करने पर विषम रूप से पड़ने वाले, कषाय वर्ण से युक्त विविध प्रकार के बने हुए चरण वंश का नाश करते हैं। शङ्ख के आकार चरणों से युक्त मनुष्य ब्रह्महत्या करता है तथा आगम्य स्त्री के साथ रमण करने की इच्छा रखता है।

विरल रोमराज युक्त जंघा तथा हाथी के सूँड़ के समान सुन्दर ऊरु भागों वाले अंग राजा के शरीर में सुशोभित होते हैं।

दरिद्र की जंघाएँ सियार की जंघाओं के समान होती हैं। कुञ्चित केश राशि वाले मनुष्य की मृत्यु विदेश में होती है।

मांस रहित जानु-प्रदेश वाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। अल्प और छोटी-छोटी जानुओं के होने से मनुष्य स्त्री-प्रेमी तथा विशाल विकटकाकार होने पर दरिद्र होता है।

मांस से भरपूर जानुओं के होने पर मनुष्य को राज्य की प्राप्ति होती है। बड़ी जानुओं के होने पर मनुष्य दीर्घायु होता है।

मांसल स्फिक् (कुल्हा)-प्रदेश वाला व्यक्ति सुखी तथा सिंह के समान स्फिक् होने पर वह राज पुरुष माना गया है। इसी प्रकार सिंह के सदृश कटि प्रदेश के होने पर वह राजा होता है, किंतु काक के समान कटि भाग वाला व्यक्ति निर्धन होता है।

समान कक्षा (काँख)-प्रदेश वाले अत्यधिक भोग-विलासी होते हैं। निम्न कक्षा वाले धनहीन तथा उन्नत एवं विषम कक्षा वाले कुटिल होते हैं।

मस्तक के समान उदर वाले प्रचुर धनवान् होते हैं। विस्तीर्ण नाभि प्रदेश से सुशोभित जन सुखी एवं अत्यधिक गहरी नाभि होने के होने पर भोगी होता है।

त्रिवली के मध्य भाग में नाभि के अवस्थित होने पर प्राणी शूल रोग से ग्रस्त होते हैं। वामावर्त नाभि के होने पर शठ प्रिय और दक्षिणावर्त होने पर मेधावी होते हैं। पार्श्वदेश में नाभि के विमुख होने से मनुष्य चिरजीवी, उन्नत होने पर ऐश्वर्यशाली, अपूर्ण होने पर गोधन से सम्पन्न एवं पार्श्व कातिक के सदृश सुन्दर होने पर वे राजत्व को प्राप्त करते हैं।

उदर भाग पर एक वलि के रहने पर मनुष्य शतायु होता है। दो वलिओं के होने से वह ऐश्वर्य का भोग करने वाला तथा त्रिवलियों के होने पर राजा या आचार्य की पदवी को प्राप्त करता है। सरल वलि वाला मनुष्य सुखी होता है। वक्र वलि वाला व्यक्ति अगम्य गामी होता है।

जिस के दोनों पार्श्व भाग मांसल होते हैं, वह राजा होता है। मृदु, कोमल, सुन्दर और समभाग की दूरियों पर अवस्थित दक्षिणावर्त रोमावलियों से सुशोभित व्यक्ति भी राजा होता है। यदि उदर-प्रदेश पर इन लक्षणों के विपरीत रोम-राशियाँ होती हैं तो ऐसे मनुष्य दूत-कर्म करने वाले, निर्धन तथा सुख से रहित होते हैं।

समुन्नत, पीन तथा कमल रहित विशाल वक्षःस्थल राजाओं का होता है। अधम जनों का वक्षःस्थल तो गर्भों की रोमा राशि के समान, कर्कश तथा रोमावलियों से युक्त स्पष्ट परिलक्षित होने वाली नसों से व्याप्त रहता है।

समवक्षःस्थल वाले मनुष्य धन-सम्पन्न होते हैं। पीन (मांसल) वक्षःस्थलों से युक्त प्राणी शास्त्र सम्पन्न होता है। विषम वक्षःस्थल के होने पर मनुष्य निर्धन होता है और उस की मृत्यु शास्त्र यात्रा से होती है।

स्कन्ध-प्रदेश के सन्धिबन्धन (पखुरा)-में विषमता तथा अस्थि-संलग्नता के होने पर भी मनुष्य निर्धन होता है। उन्नत स्कन्ध-प्रदेश के रहने से व्यक्ति भोगी, निम्न होने पर धनहीन तथा स्थूल होने पर धनी होते हैं।

चिपटाकार कन्धे से युक्त पुरुष निर्धन, शुष्क एवं उन्नत शिराओं से व्याप्त गर्दन वाला सुखी होता है। महिष के सदृश ग्रीवा वाला वीर तथा मृग के समान कण्ठ वाला शास्त्रों में पारंगत होता है। शंख के समान ग्रीवा वाला मनुष्य राजा और लम्बे कण्ठ वाला बहुत भोजन करने वाला होता है।

रोमरहित एवं मृदु हुआ पृष्ठ-प्रदेश शुभ तथा उस के विपरीत रहने पर अशुभ माना गया है।

पीपल-पत्ते के सदृश, सुगन्धित तथा मृग के सदृश रोमावलियों वाली कक्षाएँ उत्तम होती हैं। इस के विपरीत कक्षाओं के जो लक्षण होते हैं, वे निर्धनों की दरिद्रता के कारक हैं।

मांसल, शिथिल, विशाल, वलित, वृत्ताकार तथा जानु पूर्ण लम्बी सुन्दर भुजाएँ राजाओं का होती हैं। प्रचुर रोमावलियों से युक्त छोटे-छोटे हाथ निर्धनों के होते हैं। हाथी की सूण्ड के समान सुन्दर भुजाएँ श्रेष्ठ मानी गयी हैं।

भवन में वायु-प्रवेश के लिये बने द्वार के समान बनी हुई अँगुलियाँ शुभ होती हैं। मेधावी जनों की अँगुलियाँ छोटी होती हैं। चिपटाकार अँगुलियाँ भूतों में पायी जाती हैं। स्थूल अँगुलियों पर मनुष्य निर्धन होता है। जब मनुष्य की अँगुलियाँ कृश होती हैं तो वे विनयी होते हैं।

बन्दर के सदृश हाथों के होने पर मनुष्य निर्धन और बाधक के समान हाथ होने पर बलवान् होते हैं।

करतल भाग के निम्न होने से मनुष्य पिता के द्वारा संचित धन को नष्ट करने वाले होते हैं। मणिक के सुशोभित, शिथिल तथा सुगन्धयुक्त होने पर व्यक्ति राजाओं को प्राप्त होते हैं।

फटे-फटे कर-भाग से युक्त, शब्द करने वाले मणिबन्धों के रहने से मनुष्य धनहीन और नीच प्रकृति के माने जाते हैं।

संवृत अर्थात् गोलाकार एवं गहरे करतल के होने से मनुष्य को धनवान् कहा गया है। उन्नत करतल के होने पर व्यक्ति दानी और विषम भाग वाले व्यक्ति कठोर होते हैं।

लाक्षा के समान करतल के होने से प्राणी राजा होता है। पीतवर्ण वाले करतल से युक्त व्यक्ति पर स्त्री के साथ रमण करने वाले होते हैं। जिन के हाथ और तल-प्रदेश सूखे होते हैं, वे मनुष्य निर्धन होते हैं।

तुष (भूसी)-के समान रङ्ग वाले नख वाले लोग नपुंसक, कुटिल तथा पके हुए नख वाले धनहीन होते हैं। विवर्ण नख वाले दूसरे के साथ तर्क करने वाले होते हैं।

ताम्र के सदृश रक्त वर्ण नख वाले मनुष्य राजा होते हैं। रक्त-बिन्दु के सदृश नख वाले व्यक्ति अत्यधिक धन-वैभव से युक्त होता है। अङ्गुष्ठ के मूल भाग में यव-चिह्न के होने से व्यक्ति पुत्रवान् होता है। लम्बे यव से युक्त अँगुलियों के होने पर दौर्पद्य तथा पुत्र-पौत्रादि से परिपूर्ण होता है। विषम अँगुलियों वाला व्यक्ति मनुष्य धन-सम्पन्न होता है। महिष के समान विरल तीन रेखाएँ जिस के करतल भाग को पार कर जाती हैं, वह राजा होता है।

दो मत्साकृति करतल भाग वाला पुरुष यज्ञकर्ता एवं दानी होता है। वज्राकार चित्त वाले करतल धनी-जनों के होते हैं। विझान का करतल भाग मौन-चिह्न से अद्भुत राजा के करतल में शङ्ख, छत्र, शिविका (डोली), गज और पद्माकार चिह्न रहते हैं। अङ्गुलाग्र में ऐश्वर्य सम्पन्न राजा के करतल में कुम्भ, अङ्कुर, पताका तथा मृणाल के समान चिह्न रहते हैं। गोधन के स्वामिजनों के करतल में रस्सी के चिह्न रहते हैं। जिस के हाथ में स्वस्तिक का चिह्न होता है, वह सम्राट् होता है। राजा के हाथ में चक्र, कृपाण, तोमर, अङ्कुश और विन्ध्यके चिह्न से युक्त व्यक्ति मण्डलिक कर्म काण्डों में निष्णात होता है। जिन के हाथों में वेणुकाकार रेखा होती है, वे अग्नहोत्री होते हैं। वायव्य, देवकुल तथा त्रिकोण रेखाओं के रहने पर मनुष्य धार्मिक होता है।

यदि वे रेखाएँ मूल भाग से होती हैं तो उन्हें कार्यायु कहते हैं। यदि वे रेखाएँ तर्जनी से होती हैं तो उन्हें कार्यायु कहते हैं। कनिष्ठिका के मूल से निकलकर तर्जनी के मूल तक स्थित या रेखाएँ मनुष्य को शतायु होती हैं, किंतु किसी स्थान पर उस के चिह्नों ने होने पर भी उस को वेणुका से गिरकर मनुष्य का भय बना रहता है। बहुत-सी रेखाओं के होने से मनुष्य दरिद्र होता है।

चिबुक (ठुड्डी)-के होने पर भी मनुष्यों को धनहीन समझना चाहिये, किंतु जिन की टुड़ियाँ मांसल होती हैं, वे धन-सम्पदाओं से परिपूर्ण होती हैं। अरुण, बिम्बाफल के समान अधरोष्ठों से सुशोभित मुख राजाओं का माना गया है; किंतु जिस के ओष्ठ रूखे, खण्डित, फटे हुए तथा विषम (निचले) चमकते हुए, सघन एवं समभाग वाले सुन्दर तीक्ष्ण दाँतों से युक्त होव है। राज्याओं का मुख कठोर, सौम्य, गोल, मनोहर तथा लम्बा होता है। दुष्ट भोगने वाले लोगों में इन लक्षणों के विपरीत लक्षण होते हैं। कुटिल एवं भङ्गकार तथा स्त्रीमुखी पुरुष मुख होता है।

ललिका का पार्श्व भाग में गोकर्ण के समान होते हैं। भ्रुवो के शृंग के समान होते हैं, जो मध्य भाग में होते हैं। भ्रुवों के शृंग के समान होते हैं, जो मध्य भाग में होते हैं। भ्रुवों के शृंग के समान होते हैं, जो मध्य भाग में होते हैं।

घोर-वृत्ति वाले व्यक्ति निरञ्जन, पुरुषार्थी हुई लाल वर्ण की दाढ़ी और मूँछों वाले होते हैं। रक्त वर्ण के तथा कड़े बालों वाले दाढ़ी वाले और छोटे-छोटे कानों वाले मनुष्य की मृत्यु पापकर्म करने से होती है। मांस रहित, चिपटे कानों वाले लोग भोगी और अत्यन्त छोटे-छोटे कानों से युक्त मनुष्य कंजूस होते हैं। शङ्ख के आकार कानों के होने पर मनुष्य राजा होता है तथा रोम राशि से भरे होने पर उसे क्षीण आयु की प्राप्ति होती है। बड़े कानों वाले धनी अथवा राजा माने जाते हैं। स्निग्ध, विस्तृत, मांसल तथा दीर्घ कानों वाले राजा होते हैं। निम्न गण्डस्थल वाला भोगी और पूर्ण सुडौल एवं सुन्दर होने पर मनुष्य मन्त्री होता है।

सुग्गे की नासिका के समान सुन्दर नासिका वाला व्यक्ति सुखी और शुष्क नासिका वाला दीर्घजीवी होता है। नासिका का अग्रभाग छिद्र तथा कूप के समान नासिका के होने पर मनुष्य अगम्य स्त्री के साथ सहवास करता है। दीर्घ नासिका के रहने पर सौभाग्यवान् एवं आकुञ्चित अर्थात् टेढ़ी नासिका होने से व्यक्ति चौर्यकार्य में प्रवृत्त होता है। नासिका के चिपटी होने पर मनुष्य की अकाल मृत्यु होती है। भाग्यवान् की नासिका छोटी होती है। चक्रवर्ती सम्राट् की नासिका में छोटे-छोटे गोल और सीधे छिद्र होते हैं। दक्षिण भाग की ओर नासिका के वक्र होने पर मनुष्यों में क्रूर-स्वभाव होता है।

वक्र उपान्त भागों से युक्त तथा पद्म-पत्र के समान सुन्दर नेत्र सुखी लोगों के होते हैं। बिल्ली के सदृश नेत्रों के होने पर मनुष्य पापी तथा मधु-पिंगल वर्ण वाले नेत्रों के होने पर वह दुरात्मा होता है। केकड़े के नेत्रों की भाँति नेत्र होने से व्यक्ति क्रूर और हरित वर्ण के नेत्र वाले पापकर्म में अनुरक्त होते हैं। वक्र नेत्र बलवान् पुरुषों का लक्षण है। हाथी के समान नेत्रों वाले मनुष्य सेनानी होते हैं। गम्भीर नेत्रों वाला पुरुष राजा तथा स्थूल नेत्रों वाला मन्त्री होता है। नील कमल के सदृश नेत्रों वाले व्यक्ति विद्वान् तथा श्याम वर्ण के नेत्र वाले सौभाग्यशाली होते हैं। कृष्ण वर्ण के तारक विन्दुओं से युक्त नेत्रों वाले पुरुषों में उत्पाटन-क्षमता होती है। मण्डलाकार नेत्रों के होने पर व्यक्ति पापी तथा दैन्य भावुक नेत्र वाले मनुष्य दरिद्र होते हैं। सुन्दर एवं विशाल नेत्रों वाले संसार में विभिन्न प्रकार के सुखों का उपभोग करते हैं। जिन के नेत्र अधिक उन्नत अर्थात् ऊपर की ओर अधिक उठे होते हैं, वे अल्पायु होते हैं। विशाल और उन्नत नेत्रों के होने पर मनुष्य सुखी होते हैं।

विषम भौंहों वाले दरिद्र होते हैं तथा दीर्घ, सघन, एक-दूसरे से संयुक्त, बाल चन्द्र के सदृश पतले, वक्र एवं उन्नत सुन्दर भौंहों से सुशोभित प्राणी धन-वैभव से सम्पन्न होते हैं। मध्य भाग में कटी हुई भौंहों के होने पर मनुष्य निर्धन तथा झुकी हुई भौंहों के होने से आगम्य स्त्रियों में रत रहने वाले और पुत्र से रहित होते हैं।

उन्नत, विशाल, शङ्काकार एवं विषम मस्तक होने पर पुरुषों में निर्धनता और अर्द्धचन्द्राकार ललाट के होने पर वे धन सम्पदाओं से परिपूर्ण रहते हैं। शंख के समान आभा वाले तथा विशाल मस्तक वाले आचार्य के पद को सुशोभित करते हैं, वे पापकर्म में लगे रहते हैं। उन्नत शिराओं से युक्त स्वस्तिकाकार, सुन्दर ललाट के होने पर मनुष्य धनवान् तथा निम्न ललाट के होने पर बन्दी बनाये जाने योग्य होते हैं और क्रूर कर्मों को करते हैं। गोल ललाट वाले कृष्ण और उन्नत भाल वाले राजा होते हैं।

ललाटों का अङ्ग रहित, दीनता रहित, स्निग्ध रुक्ष मङ्गलकारी होता है तथा अधर भाग वाला, दैर्घ्यभाष्य को प्रकट करता हुआ रूखा रूदन सुखी होता है।

कम्पन रहित हँसी श्रेष्ठ होती है। आँख मुँदकर हँसने वाला व्यक्ति पापी होता है। बार-बार हँसने वाला दुष्ट होता है और उन्मत्त की हँसी अनेक प्रकार की होती है।

सौ वर्ष तक जीवन प्राप्त करने वाले लोगों के मस्तक पर तीन रेखाएँ होती हैं। मस्तक पर चार रेखाओं के होने से मनुष्य राजा होता है और उस की आयु पंचानवे वर्ष तक होती है। रेखा रहित ललाट वाला व्यक्ति नब्बे वर्ष जीवित रहता है। विचित्र रेखाओं से व्याप्त मस्तक वाले पुरुष सत्तर वर्ष पर्यन्त रहता है। मस्तक पर केशावर्त रेखाओं के होने से मनुष्य की आयु अस्सी वर्ष होती है। पाँच, छः अथवा सात रेखाओं के होने से प्राणों की आयु पचास वर्ष तथा चार रेखाओं के होने से चालीस वर्ष की आयु मानी चाहिये। मस्तक पर रेखाओं की वक्रता एवं भङ्ग पर्यन्त स्थिति होने से पुरुष तीस वर्ष तथा बन्नी और वक्र होने पर बीस वर्ष की आयु प्राप्त करता है। रेखाओं से युक्त होने पर मनुष्य अल्पायु होता है।

छिपकाकार मिरवाले मनुष्य राजा और निम्न सिर वाले भनी होते हैं। विरले मिरके युक्त पुरुष के पिता की मृत्यु शीघ्र ही होती हैं। मण्डलाकार सिर होने पर व्यक्ति गौ आदि प्राणियों से सम्पन्न होते हैं। घटकाकार मुण्ड़क होने पर मनुष्य पापकर्म में अभिरुचि रखने वाला तथा भयहीन होता है।

काले-काले घुँघराले, स्निग्ध, एक छिद्र में एक-एक उत्पन्न, अग्रिम प्रभाग वाले, अत्यधिक, न छोटे न बड़े, सुन्दर केशों वाले राजा होते हैं। एक छिद्र में अनेक बाल वाले, विषम, स्थूलाग्र तथा कपिलवर्ण के केशों से युक्त पुरुष निर्धन होते हैं। अत्यन्त कुटिल, सघन एवं काले बाल वाले भी निर्धन होते हैं।

मनुष्य के जो अङ्ग अतिशय रूक्ष, शिराओं से व्याप्त तथा मांस रहित होते हैं, वे सभी अशुभ हैं। यदि वे अङ्ग इस के विपरीत होते हैं तो उन्हें शुभ मानना चाहिये।

मानव-शरीर में तीन अङ्ग विशाल और तीन अङ्ग गम्भीर, पाँच अङ्ग दीर्घ तथा सूक्ष्म, छः अङ्ग उन्नत, चार ह्रस्व एवं सात अङ्ग रक्त वर्ण के होने पर वह राजा होता है।

नाभि, स्वर तथा सत्त्व (स्वभाव)’—ये तीन गम्भीर होने चाहिये। ललाट, मुख तथा वक्षःस्थल विशाल, नेत्र, कक्षा (काँख), नासिका तथा कृकाटिका अर्थात् गर्दन का उठा हुआ भाग, सिर और गरदन का जोड़—इन छः को उन्नत होना चाहिये, ऐसा होने पर मनुष्य राजा होता है। जंघा, ग्रीवा, लिङ्ग तथा पुरुष—ये चार अङ्ग ह्रस्व होने चाहिये।

करतल, तालु, अधर और नख—ये चार रक्त वर्ण होने चाहिये। नेत्रातभाग चरणतल, जिह्वा और दोनों ओष्ठ—ये पाँच सूक्ष्म होने चाहिये। दाँत, अँगुलि, पर्व, नख, केश और त्वचा—ये पाँच अङ्ग दीर्घ होने पर शुभाकारी हैं। दोनों स्तनों का मध्य भाग, दोनों भुजाएँ, दंष्ट्र, नेत्र और नासिका का भी दीर्घ होना शुभ है।

इस प्रकार मनुष्यों का लक्षण कहकर अब स्त्रियों का लक्षण कह रहा हूँ।

राजा के दोनों चरण स्निग्ध, समान पद तल वाले, ताम्रवर्ण की आभा से सुशोभित नखों से युक्त, सघन अँगुलियों से युक्त उन्नत अङ्गवाले होते हैं। ऐसी स्त्री को प्राप्त कर मनुष्य राजा बन जाता है।

गुरु पृष्ठ-प्रदेश से युक्त पद्म पत्र के समान चरण तल शुभ होते हैं। जिन के चरणों में पसीना नहीं छूटता है और वे कोमल होते हैं, उन में मत्स्य, अंकुश, ध्वज, वज्र, पद्म तथा हत्का चिह्न हो तो वह रानी होती है। इन लक्षणों से रहित चरण वाली स्त्री दासी होती है। स्त्रियों की रोम रहित, सुविभक्त, शिराहीन, गोल-गोल जंघाएँ शुभ हैं।

सन्धि स्थान तथा दोनों जानु सत् हैं, रोम रहित तथा समान भाग वाले दोनों ऊरु श्रेष्ठ माने जाते हैं।

विस्तीर्ण, मांसल, गम्भीर, विशाल तथा दक्षिणावर्त नाभि तथा मध्य भाग में त्रिवलियाँ श्रेष्ठ होती हैं। स्त्रियों के रोम रहित, विशाल, भरे हुए, सघन एवं समान भाग वाले उन्नत स्तन-प्रदेश शुभ हैं। रोम रहित, शङ्ख के आकार वाली सुन्दर ग्रीवा प्रशस्त होती है। अष्टभङ्ग अथरोवाला तथा वर्तुलाकार मांसल धरा हुआ मुख श्रेष्ठ होता है। कुन्द-पुष्प के समान दाँत पंक्ति वाली वाणी शुभ होती है, जो सदैव दाक्षिण्य भाव से परिपूर्ण रहती है, उस में शठता नहीं होती, अपितु हँसने के समान मधुर शब्द का प्रयोग करके वह दूसरों को सुख प्रदान करती है, वही स्त्री श्रेष्ठ होती है। स्त्रियों की नासिका और नासिका-छिद्र समान होना मनोहर और मङ्गलदायी होता है।

स्त्रियों के नील कमल के समान नेत्र अच्छे होते हैं। बालचन्द्र के सदृश पीठों का होना शुभ है, किंतु उन का मोटा होना अच्छा नहीं है। उन का मस्तक अर्द्धचन्द्र के समान सुन्दर, समतल तथा रोमा रहित होना शुभ होता है।

सुन्दर, समान, मांसल एवं कोमल कान श्रेष्ठ होते हैं। स्त्रियों के चिकने, नीलवर्ण वाले, मृदु और घुँघराले केश प्रशस्त माने गये हैं। उन का सर्व प्रथम श्रेष्ठ होता है।

आपदा चरण अर्थात् करतल में अश्व, हस्ति, श्री, वृक्ष, यूप, वाण, यव, तोमर, छत्र, चामर, माला, पर्वत, कुण्डल, वेदी, शङ्ख, धूप, ध्वज, स्वस्तिक, रथ तथा अंकुश आदि चिह्न वाली स्त्रियाँ राजवल्लभा होती हैं।

स्त्रियों के मांसल मणिबन्ध वाले तथा कमलदल के समान हाथों को शुभ माना जाता है। स्त्रियों के करतलों का न तो अधिक निम्न और न अधिक उन्नत होना अच्छा होता है। बीच तक आने वाली शुभ रेखाओं से व्याप्त करतल वाली स्त्रियाँ आजीवन सधवा रहकर विभिन्न प्रकार के सुखों का उपभोग करती हैं। हाथ में जो रेखा मणिबन्ध से निकलकर मध्यमा अँगुलि तक जाती है, वह कर्म रेखा कही जाती है। ऐसी रेखा यदि स्त्री या पुरुष के करतल अथवा चरण तल में अवस्थित रहती है तो वे स्त्री या पुरुष राज्य अथवा अन्य प्रकार के सुखों का उपभोग करते हैं।

कनिष्ठिका अँगुलि के मूल से निकलकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों के मध्य भाग तक रेखा के पहुँचने पर स्त्री या पुरुष की आयु सौ वर्ष की होती है। यदि इन अँगुलियों की अग्रभाग से नीचे वाली रेखाओं के होने से तो उस अँगुलियों के मध्य भाग की आयु भी कम होती है।

अङ्गुलस्थ रेखाओं के रहने पर स्त्री या पुरुष बहुत-से पुत्रों को जन्म देने वाले होते हैं। स्थान-स्थान पर अङ्गुरेखा के छिन्न-भिन्न होने से मनुष्य की आयु अल्प हो जाती है। यदि यह रेखा दीर्घ एवं अविच्छिन्न हो तो उस पुरुष अथवा स्त्री को दीर्घायु माना जाता है। स्त्रियों के विषय में कहे गये ये सभी शुभ गुण हैं। इन के विपरीत लक्षणों के होने पर उन्हें अशुभ मानना चाहिये।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: लक्षण