गरुड़ पुराण: वह ज्ञान जो जीवन और मोक्ष प्रदान करता है

नैमिषारण्य के पावन तीर्थ में, जहाँ सर्वशास्त्रपारंगत शान्तिप्रिय महात्मा सूतजी का पदार्पण हुआ था, वहाँ शौनकादि ऋषि-मुनियोंने उनसे परमार्थ के विषय में जिज्ञासापूर्वक प्रश्न किये। सभीने मिलकर पहले नरश्रेष्ठ नर-नारायण और भगवती सरस्वती तथा व्यासदेवको नमन किया।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

इसके पश्चात् सूतजी ने सभी पुराणों में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाले गरुड़महापुराण की कथा प्रारम्भ की। उन्होंने बताया कि यह महापुराण सर्वप्रथम परब्रह्म परमात्मा साक्षात् भगवान् विष्णु ने देवदेवेश्वर गरुड़ देव को समस्त शास्त्रों का सार और महान् अर्थ बताते हुए सुनाया था।

सूतजी ने कथा आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह वही आख्यान है, जिसे महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी विनता को सुनाया था। कश्यप के पुत्र, पक्षिराज गरुड ने घोर तपस्या द्वारा भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया। जब प्रभुने उन्हें वर माँगने के लिए कहा, तब गरुड ने अपनी माता विनता को नागिनों की दासता से मुक्त करने की सामर्थ्य एवं शक्ति की याचना की। भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर गरुड को यह वरदान दिया और साथ ही उन्हें अपना वाहन बनाया।

भगवान् श्रीहरि ने पक्षिराज गरुड से कहा कि वे उनकी कृपा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर एक पुराणसंहिता का प्रणयन करें। भगवान् ने गरुड के नाम पर ही इस पुराण के लोक में प्रसिद्ध होने की घोषणा की। उन्होंने स्वयं यह वचन दिया कि जिस प्रकार देवताओं के मध्य वे ऐश्वर्य और श्री के रूप में विख्यात हैं, उसी प्रकार यह गरुडमहापुराण भी सभी पुराणों में ख्याति अर्जित करेगा।

भगवान् ने गरुड से कहा कि उन्हें उनका ध्यान करके ही इस पुराण का प्रवचन करना चाहिए:

यथाहं देवदेवानां श्रीः स्रातो विनायकात्।

तथा ख्यातिं पुरेणष्वेदं गरुडोऽर्जयिष्यति॥

यथाहं देवदेवोऽस्मि तव त्वं त्वं गरुडस्तथा।

मां ध्यात्वा पक्षिमुख्येदं पुराणं प्रकथयिष्यसे॥

इस प्रकार भगवान् से ज्ञान प्राप्त कर गरुड ने महर्षि कश्यप को सुनाया, और कश्यप ने अपने शिष्यगणों को यह ज्ञान दिया। सूतजी ने इस परम पवित्र पुराण को स्वयं व्यासजी से सुना था। यह तार्क्ष्य कल्प में वर्णित है, जिसमें प्रारम्भ में सर्ग (सृष्टि) का वर्णन और फिर विष्णुधर्मोत्तर के विषय हैं। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ, जो शुक शास्त्र भी कहलाता है, भोग और मोक्ष दोनों को प्रदान करनेवाला है।

इस महापुराण के अध्ययन से उस आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है, जिसे प्राप्त करके जीव संसार-सागर से मुक्त हो जाता है। विद्वान् जन इस प्रकार के ध्यानयोग का पाठ करते हुए नित्य ही ईश्वर का सामीप्य प्राप्त कर लेते हैं। वह मोक्ष की अवस्था इस प्रकार वर्णित है, जहाँ साधक स्वयं को अनुभव करता है:

मैं ब्रह्मका सखा, अखण्ड नित्यना और परमानन्दस्वरूप हूँ। मैं जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन सभी अवस्थाओंमें जागरुक साक्षी होते हुए भी इनसे रहित हूँ। मैं ही निर्गुण, मुक्त, बुद्ध, शुद्ध-प्रबुद्ध, अजर, सर्वव्यापी, सत्यस्वरूप एवं चिदस्वरूप परमात्मा हूँ।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पुराण का महत्व