उपासना का विधान

भगवान् विष्णु की आराधना भक्त को भवबन्धन से मुक्ति प्रदान करती है। तदनन्तर जीवात्मा उसका कल्याण करती है। भगवान् की प्रसन्नता और मुक्तिदाता के रूप में पूजा करनी चाहिए। इस तरह मनुष्य मृत्यु और दरिद्रता को जीतने का सामर्थ्य रखता है।

भगवान् विष्णु दिव्य, विष्णु, सूर्य आदि देवों की महिमा करते हैं। विष्णु करुणा के कारण हैं, और उन्हें ‘ॐ जुं सः’ इस महामन्त्र से ‘अमृतबीज’ के नाम से पूजा जाता है। इस मन्त्र का जाप करने से प्राणी सम्पूर्ण भोगों को भोगता है और मुक्तिहित हो जाता है। यह व्यक्ति को अमृत के समान होने वाला सुख देता है।

भगवान् विष्णु श्वेतकमल के ऊपर बैठे हुए, वरदान देने वाले, अभयमुद्रा धारण किए हुए और हाथ में अमृताकुम्भ धारण किए हुए हैं। उनके दाहिने हाथ में अमृतघड़ा और बाएं हाथ में वरदमुद्रा है। इस रूप में अमृतदेवता का ध्यान करना चाहिए। वह भगवत्स्वरूप है, और उनकी आराधना करने वाले भक्तों को अमृतत्व प्रदान करता है। जो भक्त उनका ध्यान करते हैं, वे दिव्य भोगों को प्राप्त करते हैं और मोक्ष के भागी होते हैं।

भगवान् ने प्रथम बार इस उपासना से पार्वती को संतुष्ट किया। इसके बाद शिवजी ने इस उपदेश को सनकादिकों को दिया, और फिर यह पराम्परा से प्राप्त हुआ।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: उपासना