प्रेतयोनि से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के उपाय क्या हैं?

पातक कर्मों का वर्णन करते हुए कहते हैं-जो जीव पाप और पुण्य के कर्म विपाक के कारण नरक-लोक में जाता है और पुनः कर्म के कारण पुण्यलोक तथा स्वर्ग से गिरकर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेता है।

गर्भ में स्थित होकर यह जीव नौ मास तक अंधा मोह विहार कर दसों इन्द्रियों के दुःख से दुःख को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह जीव इस संसार-चक्र में घटी-यन्त्र के समान घूमता रहता है। पाप-कर्म करने वाला पितृ-पक्ष में जन्म लेता है।

यम-मीमांसा का वर्णन करते हुए कहते हैं- मीमांसा अपमान करने वाला कुकर्म नहीं करना सूर्य-देवता का घोर अपमान करता है। माता-पिता को कष्ट पहुँचाने वाले प्राणी को युक्री-योनि जन्म देता है। जो मनुष्य अपने स्वामी का विश्वसनीय बनकर उत्कृष्ट जीव-जीवन-यापन करता है वह स्वामी को अधिकार पहुँचाने से वंचित कर देता है।

गरुड़जी कहते हैं कि हे विष्णु! मैं कौतूहलवश सम्पूर्ण ज्ञान का प्रभुत्व जानना चाहता हूँ। रहस्यों को जानने से पुनरावृत्ति नहीं होती है। मैं उन अनेक कष्टों के बन्धन से विमुक्त होना चाहता हूँ जो जन्म–मृत्यु के चक्र से जुड़े हुए हैं। काल-वश मनुष्य अज्ञान में डूबकर पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त करता है। गरुड़ कहते हैं कि जीव किस प्रकार देह-त्याग कर मृत्यु के बाद पाप से मुक्ति प्राप्त करता है।

प्रेत योनि का दुःख और उसका कारण

गरुड़ कहते हैं कि मृत्यु के बाद जीव कुयोनि को प्राप्त करता है, दुराचारी मनुष्य पापी होकर मरने के बाद किस योनि को प्राप्त करता है? जो मनुष्य कुयोनि को प्राप्त करता है, अथवा बहुबुद्धि है, वह मरने के बाद किस योनि को प्राप्त करता है? जो चोर चोरी, परस्त्रीगमन, हत्या, ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी करते हैं, वे महापातक को प्राप्त कर क्या करते हैं?

हे माधवी! यदि यज्ञ यथा विधि यज्ञोपवीत का धारण करता है, तो वह बहुयुक्ति से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त करता है।

श्रीकृष्ण ने कहा कि हे विहंगम! जो मनुष्य यज्ञ नहीं करते, वे बहुत दुःख भोगते हैं। पुत्र और पौत्र को प्रेत योनि के दुःख से मुक्त करना चाहिए।

पितृ और पितृ का तर्पण करना आवश्यक है। देवता और पितृ का तर्पण करना चाहिए। शालग्राम को विशेष भाव माना गया है।

प्रेत मुक्ति के लिए पिण्डदान का महत्त्व

पिण्डदान का विधान यह है कि प्रेत के लिए सपिण्डीकरण क्यों होता है? इस कुल में प्रेतपिण्ड का दान कौन करता है, और उसका कल्याण कैसे होता है? जो मनुष्य दुराचारी होता है, अथवा बहुबुद्धि है, वह मरने के बाद किस योनि को प्राप्त करता है?

गरुड़ कहते हैं- हे विष्णु! मैं कौतूहल वश सम्पूर्ण ज्ञान का प्रभुत्व जानना चाहता हूँ। रहस्यों को जानने से पुनरावृत्ति नहीं होती है। मैं उन अनेक कष्टों के बन्धन से विमुक्त होना चाहता हूँ जो जन्म–मृत्यु के चक्र से जुड़े हुए हैं। काल-वश मनुष्य अज्ञान में डूबकर पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त करता है।

गरुड़ ने कहा कि मृत्यु के बाद जीव कुयोनि को प्राप्त करता है, दुराचारी मनुष्य पापी होकर मरने के बाद किस योनि को प्राप्त करता है? जो मनुष्य कुयोनि को प्राप्त करता है, अथवा बहुबुद्धि है, वह मरने के बाद किस योनि को प्राप्त करता है?

मोक्ष प्राप्ति के अन्य उपाय

वृषोत्सर्ग तथा तुलसी विमोहन द्वारा दुर्दशा से मुक्त होता है।

श्लोक: वृषोत्सर्गस्तु तुलसीं विमोहयेत् दुःखदर्शतैः। (१।२५।१२६)

वृषोत्सर्ग करने से पापों का नाश और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तुलसी दान से सभी पाप का क्षय और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शालग्राम शिला को विष्णु स्वरूप मानकर उसकी पूजा करनी चाहिए। रत्न-दान से उत्तम रूप की प्राप्ति होती है। गो-दान से उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है। भूमि-दान से समस्त अभिलषित पदार्थ प्राप्त होते हैं।

पुण्य का वर्जन कर न्याय-पूर्वक अर्थ संचय का सदुपयोग धर्म का अंग है। न्याय-पूर्वक उपार्जित अर्थ ही दान-भोग का मूल होता है।

गरुड़ पुराण का महात्म्य

यह महापुराण ज्ञान और मोक्ष के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कराता है। यह गरुड़ पुराण अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला सूर्य है। ज्ञान के कारण अनेक कर्म निष्क्रिय हो जाते हैं। जो मनुष्य इस पुराण का एक श्लोक भी पाठ करता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। यह गरुड़ पुराण अज्ञान के अन्धकार को नष्ट करने वाला सूर्य है, जो कल्याण करता है।

श्लोक: योन्यन्तरे तु सुखदुःखानन्तरम्। (१।२३।१५०)

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: प्रेतयोनि