गरुडपुराण की उत्पत्ति, विषय-वस्तु, एवं भगवान् विष्णु द्वारा अपने स्वरूप का वर्णन
महर्षिगणों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में सूतजी बोले कि प्राचीन काल में नारद और प्रजापति दक्ष आदि ने यह पुराण सुना था। इस पर व्यासजी ने सूतजी से पूछा कि उन्होंने यह गरुडमहापुराण किस प्रकार सुना? तब सूतजी ने बताया कि वह एक बार बदरीकाश्रम में परमेश्वर के ध्यान में मग्न थे। वहीं पर परमेश्वर भगवान् व्यासजी आ गए और उन्होंने उनसे पूछा, “हे व्यासजी! आप परमेश्वर भगवान् श्रीहरि के स्वरूप और जगत् की सृष्टि आदि का मुझे उपदेश दें, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप उनकी परम पूजा का ध्यान कर रहे हैं और उन सर्वैक स्वरूप परमात्मा के ही विरक्त हैं।”
व्यासजी ने कहा कि उन्होंने एक बार नारद तथा दक्ष प्रभु आदि महातेजस्वी विद्वानों से यह ज्ञान प्राप्त किया और उन्हें प्रणाम कर यह प्रार्थना की कि वे सम्पूर्ण तत्वज्ञान की कृपा करें। ब्रह्माजी बोले – यह गरुडमहापुराण अन्य सभी शास्त्रों का सारभूत है। आदि काल में भगवान् विष्णु अपने देवताओं सहित उनके शिव आदि देवताओं को जिस प्रकार कहते हैं, मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ।
व्यासजी ने पुनः कहा – भगवान् श्रीहरि ने अन्य देवताओं के साथ रूद्रदेव को किस प्रकार अपने स्वरूप और महत्त्व को बतलाया है? यह गरुडमहापुराण सुनिए।
ब्रह्माजी बोले – एक बार इन्द्रादि देवताओं के साथ वे कैलास पर्वत पर पहुँचे। वहाँ रुद्रदेव शंकर के साथ विराजमान थे। इन्द्रादि देवताओं ने उन्हें प्रणाम कर पूछा, “हे महादेव! हम आपको तथा आप किस देव को प्रणाम करते हैं? हम किसी देवता को नहीं जानते, इसलिए आप उसी परम सत्यस्वरूप को जानने की इच्छा रखते हैं।”
श्रीरुद्रदेव ने ब्रह्माजी से कहा – “मैं तो सर्वफलदायक, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, सभी प्राणियों के हृदय में अवस्थित परमात्मा तथा सर्वस्वरूप उन भगवान् विष्णु का ध्यान करता हूँ। हे पितामह! उन्हीं विष्णु की आराधना करने के लिए मैं स्वयं कष्टमय रुद्रविग्रह धारण करके प्रलटाग्निवेश में निरत रहता हूँ। जो सर्वव्यापक, जयशील, अद्वैत, निराकार एवं पञ्चमहान हैं, जो नित्य (शुद्ध) तथा पवित्र हंसरूप हैं, मैं उन्हीं परमपद परमेश्वर भगवान् श्रीहरि का ध्यान करता हूँ। इस सारतत्त्व को (वैष्णवी) विद्या के उपदेश के लिए मैं उन्हीं के उपदेश के कारण समस्त लोकों का हित करने हेतु चमकता रहता हूँ।”
सम्पूर्ण जगत् मेरे ही भीतर समाया हुआ है। मैं सर्वभूतात्मक, रूपी और अवरूपी हूँ। मुझमें सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण एक सूत्र में अनुबंधित महिमा के समान विद्यमान रहते हैं। मैं हज़ार-हज़ार भुजा, हज़ार-हज़ार नेत्र तथा हज़ार मुख वाला हूँ। जो सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल, गुह्य से गुह्यतम और पूज्य में पूज्यतम है, मैं ही हूँ। मैं ही सत्यलोक और सत्यकर्मा हूँ। मैं ही पुराणों (प्राचीन शास्त्रों) एवं दिव्यादि क्रियाओं से प्रलयकाल में सर्वगुण कहलाता हूँ। मैं उन्हीं परम पुरुष के स्वरूप का ध्यान करता हूँ। मैं ही सत्-असत् से परे, अकृत (सत्यस्वरूप), आकाश (परमस्वरूप), परमदेवी के देव, यक्ष, राक्षस और नागों का हरण करने वाला हूँ, जिनमें सभी लोक तथा सभी महान् स्फूर्त होते हैं। मैं ही हूँ जिनका प्रकार जिनमें छोटी-छोटी महान् प्रलयों से स्फूर्ति होती है, जिनका मूल मैं हूँ, आदि, मध्य, मूलक, नभ (आकाश), चरण (विष्णु) के देव का पूजक और चन्द्र हूँ।
मैं समस्त दिशाओं के पूजकों का, समस्त दिशाओं का हूँ, पवन (वायु) आदि समस्त देवों का देव हूँ। मैं ही सब लोकों का स्वामी हूँ। देवों का मैं इन्द्र हूँ, पृथ्वी और सूर्य के सुख से सृष्टि करने वाला हूँ। मैं मनुष्यों से पूजित होकर उन्हें परम गति प्रदान करता हूँ तथा व्रत, नियम और सदाचरण से सन्तुष्ट होकर रहता हूँ। मैं ही इस संसार की स्थिति का मूल हूँ। मैं ही जगत् की रचना करनेवाला हूँ। मैं ही शत्रुओं का विनाश करता हूँ। मैं ही मत्स्य के रूप में अवतरित होकर अखिल ब्रह्माण्ड का पालन करता हूँ। मैं ही मन हूँ। मैं ही मनका अर्थ हूँ और मैं ही पूजा तथा ध्यान के द्वारा होनेवाला परम तत्त्व हूँ। मैं ही सर्व स्वर्गों आदि की सृष्टि हूँ और मैं ही स्वर्गादि की वृद्धि हूँ। मैं ही योगी, आयु योग और पुराण हूँ। मैं ही स्रोता हूँ तथा मन में सद्बुद्धि हूँ। मैं वक्ता और सम्पादन का विषय भी हूँ। मैं इस जगत् के समस्त पदों में मेरे ही स्वरुप हूँ और मैं ही सब कुछ हूँ।
मैं ही भोग और मोक्ष का प्रदायक परम देव हूँ। ध्यान, पूजा, उपचार और सर्वोत्तम मण्डल आदि मेरे रूप में ही हैं। मैं शिव हूँ! मैं ही सम्पूर्ण वेद हूँ! मैं ही इतिहास स्वरूप हूँ! मैं ही सर्वजगत हूँ। मैं ही ब्रह्म और सर्वलोक हूँ। मैं ही सर्वलोक में हूँ तथा मैं ही सभी देवों का आश्रय हूँ। मैं ही साक्षात् सद्गुरु हूँ और मैं ही धर्म हूँ। मैं ही कल्प हूँ। मैं ही वाणी हूँ। मैं ही सभी कर्मों और आसक्तियों का सनातन धर्म हूँ। मैं ही यश–नियम और विविध प्रकार का व्रत हूँ। मैं ही सूर्य, चन्द्र और मंगल आदि हूँ।
व्यासजी ने कहा – “प्राचीन काल में मुनिगणों के तपस्या के द्वारा मेरी यह आराधना की गई थी। उन तपस्याओं से संतुष्ट होकर उन्होंने मुझसे कहा था कि आप मुझसे अभिष्ट वर माँगे लें।”
भगवान् विष्णु ने गरुड से कहा, “हे नागों को जीतनेवाले! माता विनिता को दासता से मुक्त करने तथा देवताओं के लिए अमृत प्राप्त करने के लिए जैसा तुम चाहते हो, वैसा सब कुछ होगा। तुम समस्त देवताओं को जीतकर अमृत ग्रहण करने में सफल हो जाओगे। तुम अत्यन्त शक्तिमान् होकर मेरे वाहन होगे। क्योंकि विनाशक की शक्ति भी आपको प्राप्त होगी। मेरी कृपा से आप अपनी माता विनिता को मुक्त कर सकोगे।”
गरुडजी बोले – “हे मुनिवर! जिस गरुडमहापुराण को ब्रह्मा और शिवने भगवान् विष्णु से, मुनिजनों ने व्यास से और मैंने व्यास से सुना था, उसे ही इस नैमिषारण्य में आप सबको सुना रहा हूँ। इस गरुडमहापुराण में प्रारम्भ में सर्वावलोकन तथा वेद दर्शन, तीर्थ महात्म्य, भुवन तत्त्व, मनु तत्त्व, वर्णधर्म, आश्रम धर्म, राज धर्म, दान धर्म, युग धर्म, कल धर्म, अर्थ, काम, उत्तर ज्ञान और भगवान् विष्णु की माया से सजग लोकों का विस्तार पूर्वक कहा गया है।”
भगवान् वासुदेव के अनुग्रह से इस गरुडमहापुराण के उपदेश में श्रीगरुड सब प्रकार से अलंकृत हो गए और उनके प्रभाव से उन्होंने देवासुर युद्ध में विजय तथा प्रलय के कारण का ज्ञान प्राप्त किया।
महर्षिगणों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में सूतजी बोले कि प्राचीन काल में नारद और प्रजापति दक्ष आदि ने यह पुराण सुना था। इस पर व्यासजी ने सूतजी से पूछा कि उन्होंने यह गरुडमहापुराण किस प्रकार सुना? तब सूतजी ने बताया कि वह एक बार बदरीकाश्रम में परमेश्वर के ध्यान में मग्न थे। वहीं पर परमेश्वर भगवान् व्यासजी आ गए और उन्होंने उनसे पूछा, “हे व्यासजी! आप परमेश्वर भगवान् श्रीहरि के स्वरूप और जगत् की सृष्टि आदि का मुझे उपदेश दें, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप उनकी परम पूजा का ध्यान कर रहे हैं और उन सर्वैक स्वरूप परमात्मा के ही विरक्त हैं।”
व्यासजी ने कहा कि उन्होंने एक बार नारद तथा दक्ष प्रभु आदि महातेजस्वी विद्वानों से यह ज्ञान प्राप्त किया और उन्हें प्रणाम कर यह प्रार्थना की कि वे सम्पूर्ण तत्वज्ञान की कृपा करें। ब्रह्माजी बोले – यह गरुडमहापुराण अन्य सभी शास्त्रों का सारभूत है। आदि काल में भगवान् विष्णु अपने देवताओं सहित उनके शिव आदि देवताओं को जिस प्रकार कहते हैं, मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ।
व्यासजी ने पुनः कहा – भगवान् श्रीहरि ने अन्य देवताओं के साथ रूद्रदेव को किस प्रकार अपने स्वरूप और महत्त्व को बतलाया है? यह गरुडमहापुराण सुनिए।
ब्रह्माजी बोले – एक बार इन्द्रादि देवताओं के साथ वे कैलास पर्वत पर पहुँचे। वहाँ रुद्रदेव शंकर के साथ विराजमान थे। इन्द्रादि देवताओं ने उन्हें प्रणाम कर पूछा, “हे महादेव! हम आपको तथा आप किस देव को प्रणाम करते हैं? हम किसी देवता को नहीं जानते, इसलिए आप उसी परम सत्यस्वरूप को जानने की इच्छा रखते हैं।”
श्रीरुद्रदेव ने ब्रह्माजी से कहा – “मैं तो सर्वफलदायक, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, सभी प्राणियों के हृदय में अवस्थित परमात्मा तथा सर्वस्वरूप उन भगवान् विष्णु का ध्यान करता हूँ। हे पितामह! उन्हीं विष्णु की आराधना करने के लिए मैं स्वयं कष्टमय रुद्रविग्रह धारण करके प्रलटाग्निवेश में निरत रहता हूँ। जो सर्वव्यापक, जयशील, अद्वैत, निराकार एवं पञ्चमहान हैं, जो नित्य (शुद्ध) तथा पवित्र हंसरूप हैं, मैं उन्हीं परमपद परमेश्वर भगवान् श्रीहरि का ध्यान करता हूँ। इस सारतत्त्व को (वैष्णवी) विद्या के उपदेश के लिए मैं उन्हीं के उपदेश के कारण समस्त लोकों का हित करने हेतु चमकता रहता हूँ।”
सम्पूर्ण जगत् मेरे ही भीतर समाया हुआ है। मैं सर्वभूतात्मक, रूपी और अवरूपी हूँ। मुझमें सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण एक सूत्र में अनुबंधित महिमा के समान विद्यमान रहते हैं। मैं हज़ार-हज़ार भुजा, हज़ार-हज़ार नेत्र तथा हज़ार मुख वाला हूँ। जो सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल, गुह्य से गुह्यतम और पूज्य में पूज्यतम है, मैं ही हूँ। मैं ही सत्यलोक और सत्यकर्मा हूँ। मैं ही पुराणों (प्राचीन शास्त्रों) एवं दिव्यादि क्रियाओं से प्रलयकाल में सर्वगुण कहलाता हूँ। मैं उन्हीं परम पुरुष के स्वरूप का ध्यान करता हूँ। मैं ही सत्-असत् से परे, अकृत (सत्यस्वरूप), आकाश (परमस्वरूप), परमदेवी के देव, यक्ष, राक्षस और नागों का हरण करने वाला हूँ, जिनमें सभी लोक तथा सभी महान् स्फूर्त होते हैं। मैं ही हूँ जिनका प्रकार जिनमें छोटी-छोटी महान् प्रलयों से स्फूर्ति होती है, जिनका मूल मैं हूँ, आदि, मध्य, मूलक, नभ (आकाश), चरण (विष्णु) के देव का पूजक और चन्द्र हूँ।
मैं समस्त दिशाओं के पूजकों का, समस्त दिशाओं का हूँ, पवन (वायु) आदि समस्त देवों का देव हूँ। मैं ही सब लोकों का स्वामी हूँ। देवों का मैं इन्द्र हूँ, पृथ्वी और सूर्य के सुख से सृष्टि करने वाला हूँ। मैं मनुष्यों से पूजित होकर उन्हें परम गति प्रदान करता हूँ तथा व्रत, नियम और सदाचरण से सन्तुष्ट होकर रहता हूँ। मैं ही इस संसार की स्थिति का मूल हूँ। मैं ही जगत् की रचना करनेवाला हूँ। मैं ही शत्रुओं का विनाश करता हूँ। मैं ही मत्स्य के रूप में अवतरित होकर अखिल ब्रह्माण्ड का पालन करता हूँ। मैं ही मन हूँ। मैं ही मनका अर्थ हूँ और मैं ही पूजा तथा ध्यान के द्वारा होनेवाला परम तत्त्व हूँ। मैं ही सर्व स्वर्गों आदि की सृष्टि हूँ और मैं ही स्वर्गादि की वृद्धि हूँ। मैं ही योगी, आयु योग और पुराण हूँ। मैं ही स्रोता हूँ तथा मन में सद्बुद्धि हूँ। मैं वक्ता और सम्पादन का विषय भी हूँ। मैं इस जगत् के समस्त पदों में मेरे ही स्वरुप हूँ और मैं ही सब कुछ हूँ।
मैं ही भोग और मोक्ष का प्रदायक परम देव हूँ। ध्यान, पूजा, उपचार और सर्वोत्तम मण्डल आदि मेरे रूप में ही हैं। मैं शिव हूँ! मैं ही सम्पूर्ण वेद हूँ! मैं ही इतिहास स्वरूप हूँ! मैं ही सर्वजगत हूँ। मैं ही ब्रह्म और सर्वलोक हूँ। मैं ही सर्वलोक में हूँ तथा मैं ही सभी देवों का आश्रय हूँ। मैं ही साक्षात् सद्गुरु हूँ और मैं ही धर्म हूँ। मैं ही कल्प हूँ। मैं ही वाणी हूँ। मैं ही सभी कर्मों और आसक्तियों का सनातन धर्म हूँ। मैं ही यश–नियम और विविध प्रकार का व्रत हूँ। मैं ही सूर्य, चन्द्र और मंगल आदि हूँ।
व्यासजी ने कहा – “प्राचीन काल में मुनिगणों के तपस्या के द्वारा मेरी यह आराधना की गई थी। उन तपस्याओं से संतुष्ट होकर उन्होंने मुझसे कहा था कि आप मुझसे अभिष्ट वर माँगे लें।”
भगवान् विष्णु ने गरुड से कहा, “हे नागों को जीतनेवाले! माता विनिता को दासता से मुक्त करने तथा देवताओं के लिए अमृत प्राप्त करने के लिए जैसा तुम चाहते हो, वैसा सब कुछ होगा। तुम समस्त देवताओं को जीतकर अमृत ग्रहण करने में सफल हो जाओगे। तुम अत्यन्त शक्तिमान् होकर मेरे वाहन होगे। क्योंकि विनाशक की शक्ति भी आपको प्राप्त होगी। मेरी कृपा से आप अपनी माता विनिता को मुक्त कर सकोगे।”
गरुडजी बोले – “हे मुनिवर! जिस गरुडमहापुराण को ब्रह्मा और शिवने भगवान् विष्णु से, मुनिजनों ने व्यास से और मैंने व्यास से सुना था, उसे ही इस नैमिषारण्य में आप सबको सुना रहा हूँ। इस गरुडमहापुराण में प्रारम्भ में सर्वावलोकन तथा वेद दर्शन, तीर्थ महात्म्य, भुवन तत्त्व, मनु तत्त्व, वर्णधर्म, आश्रम धर्म, राज धर्म, दान धर्म, युग धर्म, कल धर्म, अर्थ, काम, उत्तर ज्ञान और भगवान् विष्णु की माया से सजग लोकों का विस्तार पूर्वक कहा गया है।”
भगवान् वासुदेव के अनुग्रह से इस गरुडमहापुराण के उपदेश में श्रीगरुड सब प्रकार से अलंकृत हो गए और उनके प्रभाव से उन्होंने देवासुर युद्ध में विजय तथा प्रलय के कारण का ज्ञान प्राप्त किया।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: आचारकाण्ड