मनु-सृष्टि, वर्ण और दक्ष प्रजापति सहित अन्य प्रजापतियों की सन्ततियों का विस्तार

सूतजी ने महर्षियों से कहा कि जब ब्रह्माजी ने ध्यान किया तो उन्हें शुद्ध, शुक्ल, उपवृत्त एवं दीप्त नाम के चार सनत्कुमार आदि उत्पन्न हुए। ये सभी विरक्त थे और संसार में आसक्ति रहित थे। ब्रह्माजी ने उनसे सृष्टि के क्रम को बढ़ाने को कहा, परन्तु वे मोक्षमार्ग में लीन हो चुके थे इसलिए उन्होंने इस बात को अस्वीकार कर दिया।

इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि के लिए मन, कर्म, तनु, सनक, सनातन, प्रभु, सनत्कुमार, ऋषि, भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ नाम के नव ब्रह्मा (प्रजापति) को उत्पन्न किया। ये सभी ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र थे।

फिर ब्रह्माजी ने ईश्वर को विराज रूप धारण करने के लिए प्रेरित किया। इसी क्रोध के कारण उनका शरीर दो भाग में विभक्त हो गया—एक भाग देवताओं को धारण करनेवाला सत्त्वगुण का अंश था और दूसरा भाग असुरों (दैत्यों) को धारण करनेवाला तमोगुण का अंश था।

जब क्रोध की मात्रा अधिक हुई, तब ब्रह्माजी के भ्रू-मध्य से रुद्र (शंकर) उत्पन्न हुए। रुद्र के उत्पन्न होते ही ब्रह्माजी के शरीर से असुर और देव उत्पन्न हुए।

इसके बाद ब्रह्माजी के वक्षस्थल से स्वर्ग तथा पादभाग से पृथ्वी उत्पन्न हुई। उनके मुख से अग्नि, उदरभाग से महादेव, कटि और भेद की जंगों से जल, रोमावली से औषधि तथा चर्म से पशु उत्पन्न हुए।

मुख से विप्र (ब्राह्मण), बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।

इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों के लिए ब्रह्मलोक, क्षत्रिय के लिए इन्द्रलोक, वैश्य के लिए वायुलोक और शूद्र के लिए गंधर्वलोक को नियत किया।


दक्ष प्रजापति की सन्ततियों का वर्णन

मनु तथा उनकी पत्नी शतरूपा की सन्तति के रूप में प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा आकूति, देवहूति और प्रसूति नामक तीन पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं।

इनमें से प्रसूति नामक कन्या प्रजापति दक्ष को ब्याही गईं, जिससे दस हजार, साठ हजार अथवा बाईस हजार पुत्रों और साठ कन्याओं की उत्पत्ति हुई।

दक्ष ने अपनी चौदह पुत्रियों का विवाह धर्म के साथ किया, जिनसे श्रद्धा, लज्जा, बुद्धि, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वायु, शान्ति, स्रग् और कीर्ति नामक पुत्रों की तथा सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा नामक ग्यारह कन्याओं की उत्पत्ति हुई। इनमें से स्वाहा से अग्नि, पुनरुत्सव, पुलह, क्रतु आदि, बसिष्ठ, अत्रि और पितृगणों की उत्पत्ति हुई। श्रद्धा से काम, लक्ष्मी से दर्प, धृति से नियम, तुष्टि से संतोष तथा पुष्टि से लोभ उत्पन्न हुआ।

दक्ष ने अपनी सत्तावन पुत्रियाँ दीं, जिनमें से चार का विवाह अङ्गिरा के साथ, दो का कृशाश्व के साथ, दस का धर्म के साथ, तथा तेरह का विवाह कश्यप के साथ हुआ। कश्यप से ही दैत्य (असुर), दानव, यक्ष, नाग और गरुड़ आदि सभी की उत्पत्ति हुई।

इस प्रकार इन प्रजापतियों और उनकी सन्ततियों से सम्पूर्ण जगत् का विस्तार हुआ।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: प्रजापतियों की सन्ततियों का विस्तार