नवव्यूहचक्रविधान, पूजन-निरूपण और विष्णुस्तोत्र
सूतजी बोले – हे मुनिवरो! मैं सिद्ध प्राप्त करने के लिए स्फटिक आदि की जाज्वल्लीय श्रीहरि की पूजन पद्धति कह रहा हूँ।
सबसे पहले साधक षडङ्गन्यास करे, जिसमें ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं श्रीह्रीं – इन बीजमन्त्रों से हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र में न्यास करे। तदनन्तर न्यास के बाद दशार बीजमंत्र तथा द्वादशाक्षर मंत्र से वासुदेव नारायण का ध्यान करे।
नव्यूहचक्र के अनुसार शरीर-न्यास तथा ध्यान: साधक को पहले योग-क्रिया द्वारा जीवात्मा को मस्तक, नाभि और हृदय में स्थित करना चाहिए। फिर ‘व’ बीजमन्त्र से आकाश तत्त्व में और ‘रं’ बीजमन्त्र से वायु तत्त्व में शरीर को विलीन करे। ‘लं’ बीजमन्त्र से पृथ्वी को, ‘हं’ बीजमन्त्र से अग्नि को शरीर में संयुक्त करे। इस प्रकार तत्त्वों को बीजमन्त्रों के साथ संयुक्त करके शरीर का संशोधन करे।
तदनन्तर अमृत के अवलंबन से अपने शरीर को पूर्ण करे। पीताम्बरधारी चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि का ध्यान करने के पश्चात् उनके पाद से शिखर पर्यन्त न्यास करे।
षडङ्गन्यास:
- ॐ हृदयाय नमः (हृदय)
- ॐ शिरसे नमः (सिर)
- ॐ शिखायै नमः (शिखा)
- ॐ कवचाय नमः (कवच)
- ॐ नेत्रत्रयाय नमः (नेत्र)
- ॐ अस्त्राय फट् (अस्त्र)
तत्पश्चात् दशार बीजमन्त्रों से दिशाओं में न्यास करना चाहिए।
- पूर्व दिशा में: ॐ अं (अध्याय) नमः
- दक्षिण दिशा में: ॐ आं (अनादि) नमः
- पश्चिम दिशा में: ॐ इं (ईश) नमः
- उत्तर दिशा में: ॐ ईं (ईश्वर) नमः
- आग्नेय दिशा में: ॐ उं (उर्ध्वांग) नमः
- नैऋत्य दिशा में: ॐ ऊं (ऊर्ध्वगति) नमः
- वायव्य दिशा में: ॐ ऋं (ऋषि) नमः
- ईशान दिशा में: ॐ ॠं (ॠक्ष) नमः
- ऊपर की दिशा में: ॐ ळें (ळक्ष्मी) नमः
- नीचे की दिशा में: ॐ ळूं (ळकार) नमः
साधक को चाहिए कि वह अखण्ड मण्डलाकार सूर्य, चन्द्र तथा अग्निमण्डल के ऊपर सर्वेश्वर परमात्मा का चिन्तन करे। इसके बाद पूर्वादि दिशाओं में षडङ्गन्यासों को स्थापित करे।
इस प्रकार ध्यान करके साधक योगपीठिका (ध्यान करने का स्थान) की पूजा करे। उसे वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के ध्यान से युक्त होकर चतुर्भुज भगवान् का पूजन करना चाहिए।
द्वादशाक्षर मन्त्रों से न्यास:
- ॐ अं से हृदय
- ॐ आं से सिर
- ॐ इं से शिखा
- ॐ ईं से कवच
- ॐ उं से नेत्र
- ॐ ऊं से अस्त्र
साधक द्वादशाक्षर मन्त्रों के साथ बीजमन्त्रों का प्रयोग कर चार प्रकार से नमस्कार करे:
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
- ॐ नमो भगवते संकर्षणाय नमः
- ॐ नमो भगवते प्रद्युम्नाय नमः
- ॐ नमो भगवते अनिरुद्धाय नमः
द्वादशाक्षर मन्त्र से केशव, नारायण, माधव, गोविन्द आदि बारह नामों द्वारा नमस्कार करना चाहिए।
अर्घ्य आदि देने के बाद षडङ्गन्यास करके अग्नि की स्थापना करे। बीजमन्त्र द्वारा देवताओं को आहुति प्रदान करे।
पूजन के बाद श्रीविष्णु की स्तुति करें, जो महासौभाग्यरूप हैं और विष्णुस्तोत्र से उनकी स्तुति करनी चाहिए। इस स्तोत्र का नाम ‘विष्णुपञ्जर’ है, जो कल्याणकारी है।
अथ विष्णुपञ्जरस्तोत्र
प्रवक्ष्यामि महातेजं विष्णुपञ्जरमुत्तमम्॥ नमो नमस्ते गोविन्द चक्रेण सुदर्शन॥ आदित्यादिं च वन्देयं नमामि विष्णुमव्ययम्। सदामृतं च वन्देयं नमामि पद्मलोचनम्॥
इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए, जिनके अष्ट भुज हैं तथा जो सुदर्शनचक्र, गदा, पद्म और शङ्ख से सुशोभित हैं।
सूतजी बोले – हे मुनिवरो! मैं सिद्ध प्राप्त करने के लिए स्फटिक आदि की जाज्वल्लीय श्रीहरि की पूजन पद्धति कह रहा हूँ।
सबसे पहले साधक षडङ्गन्यास करे, जिसमें ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं श्रीह्रीं – इन बीजमन्त्रों से हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र में न्यास करे। तदनन्तर न्यास के बाद दशार बीजमंत्र तथा द्वादशाक्षर मंत्र से वासुदेव नारायण का ध्यान करे।
नव्यूहचक्र के अनुसार शरीर-न्यास तथा ध्यान: साधक को पहले योग-क्रिया द्वारा जीवात्मा को मस्तक, नाभि और हृदय में स्थित करना चाहिए। फिर ‘व’ बीजमन्त्र से आकाश तत्त्व में और ‘रं’ बीजमन्त्र से वायु तत्त्व में शरीर को विलीन करे। ‘लं’ बीजमन्त्र से पृथ्वी को, ‘हं’ बीजमन्त्र से अग्नि को शरीर में संयुक्त करे। इस प्रकार तत्त्वों को बीजमन्त्रों के साथ संयुक्त करके शरीर का संशोधन करे।
तदनन्तर अमृत के अवलंबन से अपने शरीर को पूर्ण करे। पीताम्बरधारी चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि का ध्यान करने के पश्चात् उनके पाद से शिखर पर्यन्त न्यास करे।
षडङ्गन्यास:
- ॐ हृदयाय नमः (हृदय)
- ॐ शिरसे नमः (सिर)
- ॐ शिखायै नमः (शिखा)
- ॐ कवचाय नमः (कवच)
- ॐ नेत्रत्रयाय नमः (नेत्र)
- ॐ अस्त्राय फट् (अस्त्र)
तत्पश्चात् दशार बीजमन्त्रों से दिशाओं में न्यास करना चाहिए।
- पूर्व दिशा में: ॐ अं (अध्याय) नमः
- दक्षिण दिशा में: ॐ आं (अनादि) नमः
- पश्चिम दिशा में: ॐ इं (ईश) नमः
- उत्तर दिशा में: ॐ ईं (ईश्वर) नमः
- आग्नेय दिशा में: ॐ उं (उर्ध्वांग) नमः
- नैऋत्य दिशा में: ॐ ऊं (ऊर्ध्वगति) नमः
- वायव्य दिशा में: ॐ ऋं (ऋषि) नमः
- ईशान दिशा में: ॐ ॠं (ॠक्ष) नमः
- ऊपर की दिशा में: ॐ ळें (ळक्ष्मी) नमः
- नीचे की दिशा में: ॐ ळूं (ळकार) नमः
साधक को चाहिए कि वह अखण्ड मण्डलाकार सूर्य, चन्द्र तथा अग्निमण्डल के ऊपर सर्वेश्वर परमात्मा का चिन्तन करे। इसके बाद पूर्वादि दिशाओं में षडङ्गन्यासों को स्थापित करे।
इस प्रकार ध्यान करके साधक योगपीठिका (ध्यान करने का स्थान) की पूजा करे। उसे वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के ध्यान से युक्त होकर चतुर्भुज भगवान् का पूजन करना चाहिए।
द्वादशाक्षर मन्त्रों से न्यास:
- ॐ अं से हृदय
- ॐ आं से सिर
- ॐ इं से शिखा
- ॐ ईं से कवच
- ॐ उं से नेत्र
- ॐ ऊं से अस्त्र
साधक द्वादशाक्षर मन्त्रों के साथ बीजमन्त्रों का प्रयोग कर चार प्रकार से नमस्कार करे:
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
- ॐ नमो भगवते संकर्षणाय नमः
- ॐ नमो भगवते प्रद्युम्नाय नमः
- ॐ नमो भगवते अनिरुद्धाय नमः
द्वादशाक्षर मन्त्र से केशव, नारायण, माधव, गोविन्द आदि बारह नामों द्वारा नमस्कार करना चाहिए।
अर्घ्य आदि देने के बाद षडङ्गन्यास करके अग्नि की स्थापना करे। बीजमन्त्र द्वारा देवताओं को आहुति प्रदान करे।
पूजन के बाद श्रीविष्णु की स्तुति करें, जो महासौभाग्यरूप हैं और विष्णुस्तोत्र से उनकी स्तुति करनी चाहिए। इस स्तोत्र का नाम ‘विष्णुपञ्जर’ है, जो कल्याणकारी है।
अथ विष्णुपञ्जरस्तोत्र
प्रवक्ष्यामि महातेजं विष्णुपञ्जरमुत्तमम्॥ नमो नमस्ते गोविन्द चक्रेण सुदर्शन॥ आदित्यादिं च वन्देयं नमामि विष्णुमव्ययम्। सदामृतं च वन्देयं नमामि पद्मलोचनम्॥
इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए, जिनके अष्ट भुज हैं तथा जो सुदर्शनचक्र, गदा, पद्म और शङ्ख से सुशोभित हैं।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: नव्यूहचक्रविधान