चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओं के विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरों के नाम
श्रीहरि ने कहा—हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिला को पूजा सब प्रकार के कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।
प्रथम शालग्राम-शिला का नाम सुदर्शन है। (इस में एक चक्र का चिह्न अंकित होता है।) दूसरी शिला का नाम लक्ष्मीनारायण है। (इस में दो चक्र के चिह्न होते हैं।) तीन चक्रों वाली शिला को अच्युत तथा चार चक्रों वाली शिला को चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्र समन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओं को क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तम के नाम से अभिहित किया गया है। नौ चक्रों वाली शिला को नवव्यूह और दस चक्रों वाली शिला को दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रों से युक्त शिला को अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रों से समन्वित शिला का नाम द्वादशात्मक है। उस के ऊपर चक्रों की चाहे जितनी संख्या हो, उन से लक्षित शिला मूर्ति का नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिला मूर्ति सब से सुन्दर हो, उस का पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियों पूजित होने पर सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं।
जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती है और इन दोनों शिलाओं का जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इस में संशय नहीं है।
शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः। उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥ (६६।५)
हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तम क्षेत्र तथा महाकाल का अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकार के पापों का विनाश करने वाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।
प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्व, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नाम के अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करने वाले हैं।
श्रीहरि ने कहा—हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिला को पूजा सब प्रकार के कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।
प्रथम शालग्राम-शिला का नाम सुदर्शन है। (इस में एक चक्र का चिह्न अंकित होता है।) दूसरी शिला का नाम लक्ष्मीनारायण है। (इस में दो चक्र के चिह्न होते हैं।) तीन चक्रों वाली शिला को अच्युत तथा चार चक्रों वाली शिला को चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्र समन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओं को क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तम के नाम से अभिहित किया गया है। नौ चक्रों वाली शिला को नवव्यूह और दस चक्रों वाली शिला को दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रों से युक्त शिला को अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रों से समन्वित शिला का नाम द्वादशात्मक है। उस के ऊपर चक्रों की चाहे जितनी संख्या हो, उन से लक्षित शिला मूर्ति का नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिला मूर्ति सब से सुन्दर हो, उस का पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियों पूजित होने पर सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं।
जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती है और इन दोनों शिलाओं का जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इस में संशय नहीं है।
शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः। उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥ (६६।५)
हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तम क्षेत्र तथा महाकाल का अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकार के पापों का विनाश करने वाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।
प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्व, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नाम के अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करने वाले हैं।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: शालग्राम