दानधर्म का निरूपण एवं विविध देवताओं की उपासना
ब्रह्माजी ने कहा—अब मैं सर्वोत्तम दानधर्म के विषय में कह रहा हूँ—
सत्पात्र में श्रद्धापूर्वक दिये गये अर्थ (धन)-का प्रतिपादन (विनियोग) दान कहलाता है—ऐसा दानधर्मवित्-जनों का कहना है। यह दान इस लोक में भोग और परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाला है। मनुष्य को चाहिये कि वह न्यायपूर्वक ही अर्थ का उपार्जन करे, क्योंकि न्याय से उपार्जित अर्थ का ही दान-योग सफल होता है।
अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह—ये तीनों ब्राह्मणों की वृत्ति (आजीविका) हैं। उनके लिये कुसीद अर्थात् वृद्धि (सुदखोरी, कुत्सित कर्म तथा वाणिज्य अथवा सस्यवृत्ति (शुद्धादि कृत्य) लभ्य है। उक्त सद्वृत्ति से प्राप्त हुआ धन यदि सुयोग्य पात्रों को दिया जाता है तो उसी को दान कहा जाता है। यह नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल—चार प्रकार का कहा गया है।
फल की अभिलाषा न रखकर प्रत्युपकार की भावना से रहित होकर ब्राह्मण को प्रतिदिन जो दान दिया जाता है, वह नित्यदान है। अपने पापों की शान्ति के लिये विद्वान् ब्राह्मणों को जो धन दिया जाता है, सत्पुरुषों के द्वारा अनुष्ठित ऐसा दान नैमित्तिक दान है। संतान, विजय, ऐश्वर्य और स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा से जो दान किया जाता है, उसको धर्मवित् ऋषिगण काम्य दान कहते हैं। ईश्वर की प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मवित्-जनों को सत्बुद्धि से युक्त चित्त वाले मनुष्य के द्वारा जो दान दिया जाता है, वह विमल दान है। यह दान कल्याणकारी है।
हरी-भरी फसल से युक्त या यव-गेहूँ की फसल से सम्पन्न भूमि का दान वेदविद् ब्राह्मणों को जो देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। भूमिदान से श्रेष्ठ दान न हुआ है और न होगा ही।
ब्राह्मण को विद्या प्रदान करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन ब्रह्मचारी को श्रद्धापूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह सभी पापों से विमुक्त होकर ब्रह्मलोक के परमपद को प्राप्त करता है।
चैत्राख्य मास की पूर्णिमा तिथि को उपवास रखकर जो व्यक्ति पाँच या सात ब्राह्मणों की विधि से पूजा करके उन्हें मधु, तिल और घृत से संतुष्ट करता है तथा उनको मनचाहे भली प्रकार पूजा करके उन्हें गृहदान करता है तथा स्वयं कहता है—
दीयन्तां धर्मराजेति यथा मनसि वर्तते॥ (५१।१३)
(हे धर्मराज! मेरे मन में जैसा भाव है, उसी के अनुकूल आप प्रसन्न हों।)
—ऐसा कहने पर उसके जन्म भर किये गये समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं।
जो व्यक्ति स्वर्ण, मधु एवं चाँदी के साथ तिलों को कृष्ण-मृगचर्म में रखकर ब्राह्मण को देता है, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है।
भूमिदान से युक्त अन्न और जल का दान करने से विशेष फल प्राप्त होता है। अतः उस में धर्मज्ञ को उदरेद्य करके घृत, अन्न और जल का दान ब्राह्मण को अवश्य करना चाहिये। ऐसा करने से सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। द्वादशी तिथि में स्वयं उपवास रखकर पापों का विनाश करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिये। ऐसा करने से निश्चित ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य जिस देवता की पूजा करने के लिये इच्छा करता है, उसकी पूजा वह अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिये करे और उसको उस देवता की प्रीति के लिये करे और उसको उस देवता की प्रीति के लिये करके ब्राह्मणों को पूजा करके उन्हें भोजन भी कराये। साथ ही सौभाग्यवती स्त्रियों तथा अन्य देवों को भी पूजन-भोजनादि के द्वारा संतुष्ट करे।
संतान-प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को इन्द्रदेव का पूजन करना चाहिये। ब्रह्मवर्चस् की कामना करने वाला व्यक्ति ब्रह्मरूप में ब्राह्मणों को स्वीकार करके उनकी पूजा करे। आरोग्य की इच्छा वाला मनुष्य सूर्य की तथा धन चाहने वाला मनुष्य अग्नि की पूजा करे। कार्य में सिद्धि प्राप्त करने के लिये विघ्नहर्ता देवनायक विनायक (गणेश)-का पूजन करे। भोग की कामना करने पर चन्द्रमा की तथा बल-प्राप्ति की इच्छा होने पर वायु की पूजा करे। संसार से मुक्त होने की अभिलाषा होने पर प्रयत्नपूर्वक भगवान् हरि की आराधना करनी चाहिये। निष्काम तथा सकाम सभी मनुष्यों को भगवान् गदाधर हरि की पूजा करनी चाहिये।
जलदान से तृप्ति, अन्नदान से उत्तम सुख, तिलदान से अभीष्ट संतान, दीपदान से उत्तम नेत्र, भूमिदान से समस्त अभिलषित पदार्थ, सुवर्णदान से दीर्घ आयु, गृहदान से उत्तम भवन तथा रजतदान से उत्तम रूप की प्राप्ति होती है।
वस्त्र प्रदान करने से चन्द्रलोक तथा अन्नदान करने से अग्निलोक को प्राप्त होती है। अनडुह (बैल)-का दान देने से विपुल सम्पत्ति का लाभ और गोदान से सूर्यलोक प्राप्त होता है।
यान और शय्या का दान करने पर भार्या तथा भार्या (भयहीन)-को अभय प्रदान करने से देवलोक प्राप्त होती है। धान्य-दान से साधत्व (अविनाशी) सुख तथा वेदके (वेदाध्ययन) दान से ब्रह्म का सान्निध्य लाभ होता है। वेदविद् ब्राह्मण को ज्ञानोपदेश करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति तथा गाय को घास देने से सभी पापों से मुक्ति हो जाती है।
ईंधन (अग्नि को प्रज्वलित करने)-के लिये काष्ठ आदिका दान करने पर व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है। रोगिशोक से रोगशान्ति के लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ एवं भोजन देने वाला मनुष्य रोगरहित होकर सुखी होता है।
छत्र और जूता का दान करने वाला मनुष्य प्रचण्ड धूप के कारण तीक्ष्ण ताप वाले तथा तलवार के समान तीक्ष्ण धार वाली नुकीली पत्तियों से परि व्याप्त असिपत्रवन नाम के नारकीय मार्ग को पार कर जाता है। जो मनुष्य परलोक में सुख की अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिये संसार या घर में जो वस्तु अभीष्टतम है तथा प्रिय है, उस वस्तु का दान गुणवान् ब्राह्मणों को करना चाहिये।
उत्तरायण, दक्षिणायन, महाविषुवकाल, सूर्य तथा चन्द्रग्रहण में एवं कर्क-मेष-मकरादि की संक्रान्तियों के आने पर ब्राह्मणों को दिया गया दान परलोक में अक्षय सुख देने वाला होता है। इस प्रकार के दान का महत्व प्रयागादि तीर्थों में बहुत है, गंगा-क्षेत्र के तीर्थों में किया गया दान विशेष महत्व रखता है।
दान-धर्म से बढ़कर श्रेष्ठ धर्म इस संसार में विशेष कर के कोई दूसरा नहीं है। दान स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करने की इच्छा से और अपने पापों की उपशान्ति के लिये भी किया जाता है। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवों को दिये जाने वाले दान से जो मनुष्य मोक्ष वश दूसरों को रोकता है, वह पापी तिर्यक् (पक्षी)-योनि को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति दुष्काल में और मरणासन्न ब्राह्मण की अवहेलना दान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्या करने वाले के समान तथा अति निन्दित है। (अध्याय ५१)
ब्रह्माजी ने कहा—अब मैं सर्वोत्तम दानधर्म के विषय में कह रहा हूँ—
सत्पात्र में श्रद्धापूर्वक दिये गये अर्थ (धन)-का प्रतिपादन (विनियोग) दान कहलाता है—ऐसा दानधर्मवित्-जनों का कहना है। यह दान इस लोक में भोग और परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाला है। मनुष्य को चाहिये कि वह न्यायपूर्वक ही अर्थ का उपार्जन करे, क्योंकि न्याय से उपार्जित अर्थ का ही दान-योग सफल होता है।
अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह—ये तीनों ब्राह्मणों की वृत्ति (आजीविका) हैं। उनके लिये कुसीद अर्थात् वृद्धि (सुदखोरी, कुत्सित कर्म तथा वाणिज्य अथवा सस्यवृत्ति (शुद्धादि कृत्य) लभ्य है। उक्त सद्वृत्ति से प्राप्त हुआ धन यदि सुयोग्य पात्रों को दिया जाता है तो उसी को दान कहा जाता है। यह नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल—चार प्रकार का कहा गया है।
फल की अभिलाषा न रखकर प्रत्युपकार की भावना से रहित होकर ब्राह्मण को प्रतिदिन जो दान दिया जाता है, वह नित्यदान है। अपने पापों की शान्ति के लिये विद्वान् ब्राह्मणों को जो धन दिया जाता है, सत्पुरुषों के द्वारा अनुष्ठित ऐसा दान नैमित्तिक दान है। संतान, विजय, ऐश्वर्य और स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा से जो दान किया जाता है, उसको धर्मवित् ऋषिगण काम्य दान कहते हैं। ईश्वर की प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मवित्-जनों को सत्बुद्धि से युक्त चित्त वाले मनुष्य के द्वारा जो दान दिया जाता है, वह विमल दान है। यह दान कल्याणकारी है।
हरी-भरी फसल से युक्त या यव-गेहूँ की फसल से सम्पन्न भूमि का दान वेदविद् ब्राह्मणों को जो देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। भूमिदान से श्रेष्ठ दान न हुआ है और न होगा ही।
ब्राह्मण को विद्या प्रदान करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन ब्रह्मचारी को श्रद्धापूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह सभी पापों से विमुक्त होकर ब्रह्मलोक के परमपद को प्राप्त करता है।
चैत्राख्य मास की पूर्णिमा तिथि को उपवास रखकर जो व्यक्ति पाँच या सात ब्राह्मणों की विधि से पूजा करके उन्हें मधु, तिल और घृत से संतुष्ट करता है तथा उनको मनचाहे भली प्रकार पूजा करके उन्हें गृहदान करता है तथा स्वयं कहता है—
दीयन्तां धर्मराजेति यथा मनसि वर्तते॥ (५१।१३)
(हे धर्मराज! मेरे मन में जैसा भाव है, उसी के अनुकूल आप प्रसन्न हों।)
—ऐसा कहने पर उसके जन्म भर किये गये समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं।
जो व्यक्ति स्वर्ण, मधु एवं चाँदी के साथ तिलों को कृष्ण-मृगचर्म में रखकर ब्राह्मण को देता है, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है।
भूमिदान से युक्त अन्न और जल का दान करने से विशेष फल प्राप्त होता है। अतः उस में धर्मज्ञ को उदरेद्य करके घृत, अन्न और जल का दान ब्राह्मण को अवश्य करना चाहिये। ऐसा करने से सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। द्वादशी तिथि में स्वयं उपवास रखकर पापों का विनाश करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिये। ऐसा करने से निश्चित ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य जिस देवता की पूजा करने के लिये इच्छा करता है, उसकी पूजा वह अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिये करे और उसको उस देवता की प्रीति के लिये करे और उसको उस देवता की प्रीति के लिये करके ब्राह्मणों को पूजा करके उन्हें भोजन भी कराये। साथ ही सौभाग्यवती स्त्रियों तथा अन्य देवों को भी पूजन-भोजनादि के द्वारा संतुष्ट करे।
संतान-प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को इन्द्रदेव का पूजन करना चाहिये। ब्रह्मवर्चस् की कामना करने वाला व्यक्ति ब्रह्मरूप में ब्राह्मणों को स्वीकार करके उनकी पूजा करे। आरोग्य की इच्छा वाला मनुष्य सूर्य की तथा धन चाहने वाला मनुष्य अग्नि की पूजा करे। कार्य में सिद्धि प्राप्त करने के लिये विघ्नहर्ता देवनायक विनायक (गणेश)-का पूजन करे। भोग की कामना करने पर चन्द्रमा की तथा बल-प्राप्ति की इच्छा होने पर वायु की पूजा करे। संसार से मुक्त होने की अभिलाषा होने पर प्रयत्नपूर्वक भगवान् हरि की आराधना करनी चाहिये। निष्काम तथा सकाम सभी मनुष्यों को भगवान् गदाधर हरि की पूजा करनी चाहिये।
जलदान से तृप्ति, अन्नदान से उत्तम सुख, तिलदान से अभीष्ट संतान, दीपदान से उत्तम नेत्र, भूमिदान से समस्त अभिलषित पदार्थ, सुवर्णदान से दीर्घ आयु, गृहदान से उत्तम भवन तथा रजतदान से उत्तम रूप की प्राप्ति होती है।
वस्त्र प्रदान करने से चन्द्रलोक तथा अन्नदान करने से अग्निलोक को प्राप्त होती है। अनडुह (बैल)-का दान देने से विपुल सम्पत्ति का लाभ और गोदान से सूर्यलोक प्राप्त होता है।
यान और शय्या का दान करने पर भार्या तथा भार्या (भयहीन)-को अभय प्रदान करने से देवलोक प्राप्त होती है। धान्य-दान से साधत्व (अविनाशी) सुख तथा वेदके (वेदाध्ययन) दान से ब्रह्म का सान्निध्य लाभ होता है। वेदविद् ब्राह्मण को ज्ञानोपदेश करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति तथा गाय को घास देने से सभी पापों से मुक्ति हो जाती है।
ईंधन (अग्नि को प्रज्वलित करने)-के लिये काष्ठ आदिका दान करने पर व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है। रोगिशोक से रोगशान्ति के लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ एवं भोजन देने वाला मनुष्य रोगरहित होकर सुखी होता है।
छत्र और जूता का दान करने वाला मनुष्य प्रचण्ड धूप के कारण तीक्ष्ण ताप वाले तथा तलवार के समान तीक्ष्ण धार वाली नुकीली पत्तियों से परि व्याप्त असिपत्रवन नाम के नारकीय मार्ग को पार कर जाता है। जो मनुष्य परलोक में सुख की अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिये संसार या घर में जो वस्तु अभीष्टतम है तथा प्रिय है, उस वस्तु का दान गुणवान् ब्राह्मणों को करना चाहिये।
उत्तरायण, दक्षिणायन, महाविषुवकाल, सूर्य तथा चन्द्रग्रहण में एवं कर्क-मेष-मकरादि की संक्रान्तियों के आने पर ब्राह्मणों को दिया गया दान परलोक में अक्षय सुख देने वाला होता है। इस प्रकार के दान का महत्व प्रयागादि तीर्थों में बहुत है, गंगा-क्षेत्र के तीर्थों में किया गया दान विशेष महत्व रखता है।
दान-धर्म से बढ़कर श्रेष्ठ धर्म इस संसार में विशेष कर के कोई दूसरा नहीं है। दान स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करने की इच्छा से और अपने पापों की उपशान्ति के लिये भी किया जाता है। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवों को दिये जाने वाले दान से जो मनुष्य मोक्ष वश दूसरों को रोकता है, वह पापी तिर्यक् (पक्षी)-योनि को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति दुष्काल में और मरणासन्न ब्राह्मण की अवहेलना दान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्या करने वाले के समान तथा अति निन्दित है। (अध्याय ५१)
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: नित्य कर्म