भगवान् विष्णु का ध्यान-योग से रहस्यमय स्वरूप-वर्णन और विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र वर्णन
श्रीरुद्रदेव ने पूछा – हे प्रभो! मनुष्य किस मंत्र का जप करके इस अथाह संसार से पार हो सकता है? आप जप करने योग्य उस श्रेष्ठ मंत्र को बताने की कृपा करें।
श्रीहरि ने कहा – हे रुद्र! परम सत्य, परमात्मा, नित्य, परमेश्वर भगवान् विष्णु की सहस्रनाम से स्तुति करनी चाहिए, जिससे पापों का विच्छेद होता है। यही ‘सहस्रनाम’ स्तोत्र है।
श्रीहरि के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन:
- मैं विष्णु हूँ, मैं ही सभी का ईश्वर हूँ, मैं ही अनन्त हूँ और मैं ही शिव हूँ। मैं ही लोकादि का आदि हूँ, मृत्यु भय और विनाश से रहित हूँ।
- मैं ही वासुदेव हूँ, मैं ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रदायक हूँ।
- मैं ही सभी प्राणियों में वासुदेव हूँ। मैं ही प्रकृति, पुरुष और अहंकार का स्वरूप हूँ।
- मैं ही सत्यस्वरूप, सर्वोत्तम स्वरूप हूँ और प्राणियों के लिए दयावान हूँ।
- मैं ही बुद्धि, वक्ता, अन्न और विनाश का स्वरूप हूँ।
- मैं ही माया से परे, सर्वव्यापक, परम पवित्र, मंगलमय, अद्वय और अनादि हूँ।
- मैं निर्गुण, शुद्ध, बुद्ध, अजर, अमर हूँ, सत्यस्वरूप हूँ और शिवस्वरूप हूँ।
इस प्रकार, ध्यान-योग का अभ्यास करनेवाले योगी के लिए, मैं ही ध्यान करने योग्य परमात्मा हूँ। यह योग-साधन पापों का विनाशक है।
इन्द्रिय अधिष्ठाता के रूप में:
- मैं ही इन्द्रियों (इन्द्रियादि) का अधिष्ठाता हूँ। श्रोत्र और त्वचा (त्वक-इन्द्रियाँ) मैं ही हूँ।
- मैं इन्द्रियगम्य नहीं हूँ, मन और वाणी से परे हूँ।
- मैं ही सदा शुद्ध और बुद्ध हूँ, तथा सत्त्व और बुद्धि से अभिभूत हूँ।
- मैं ही सर्वशक्तिमान् हूँ और सभी प्राणियों में ब्रह्म-स्वरूप हूँ।
श्रीहरि (रुद्रदेव) का पूजन – वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये चार व्यूह हैं। ईश्वर और अविनाशी विष्णु की उपासना इन्हीं चार स्वरूपों के माध्यम से करनी चाहिए।
- वासुदेव महाविष्णु का स्वरूप है।
- बलराम वेदज्ञ और वेदरूप हैं।
- प्रद्युम्न वेद और वेद–वेदांग के स्वरूप हैं।
- अनिरुद्ध वैराग्य और वन में विचरने वाले हैं।
परमपद परमात्मा का चिन्तन: जो व्यक्ति इस विष्णुपञ्जरस्तोत्र का पाठ करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है। यह स्तोत्र सभी पापों का विनाशक है।
श्रीरुद्रदेव ने पूछा – हे प्रभो! मनुष्य किस मंत्र का जप करके इस अथाह संसार से पार हो सकता है? आप जप करने योग्य उस श्रेष्ठ मंत्र को बताने की कृपा करें।
श्रीहरि ने कहा – हे रुद्र! परम सत्य, परमात्मा, नित्य, परमेश्वर भगवान् विष्णु की सहस्रनाम से स्तुति करनी चाहिए, जिससे पापों का विच्छेद होता है। यही ‘सहस्रनाम’ स्तोत्र है।
श्रीहरि के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन:
- मैं विष्णु हूँ, मैं ही सभी का ईश्वर हूँ, मैं ही अनन्त हूँ और मैं ही शिव हूँ। मैं ही लोकादि का आदि हूँ, मृत्यु भय और विनाश से रहित हूँ।
- मैं ही वासुदेव हूँ, मैं ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रदायक हूँ।
- मैं ही सभी प्राणियों में वासुदेव हूँ। मैं ही प्रकृति, पुरुष और अहंकार का स्वरूप हूँ।
- मैं ही सत्यस्वरूप, सर्वोत्तम स्वरूप हूँ और प्राणियों के लिए दयावान हूँ।
- मैं ही बुद्धि, वक्ता, अन्न और विनाश का स्वरूप हूँ।
- मैं ही माया से परे, सर्वव्यापक, परम पवित्र, मंगलमय, अद्वय और अनादि हूँ।
- मैं निर्गुण, शुद्ध, बुद्ध, अजर, अमर हूँ, सत्यस्वरूप हूँ और शिवस्वरूप हूँ।
इस प्रकार, ध्यान-योग का अभ्यास करनेवाले योगी के लिए, मैं ही ध्यान करने योग्य परमात्मा हूँ। यह योग-साधन पापों का विनाशक है।
इन्द्रिय अधिष्ठाता के रूप में:
- मैं ही इन्द्रियों (इन्द्रियादि) का अधिष्ठाता हूँ। श्रोत्र और त्वचा (त्वक-इन्द्रियाँ) मैं ही हूँ।
- मैं इन्द्रियगम्य नहीं हूँ, मन और वाणी से परे हूँ।
- मैं ही सदा शुद्ध और बुद्ध हूँ, तथा सत्त्व और बुद्धि से अभिभूत हूँ।
- मैं ही सर्वशक्तिमान् हूँ और सभी प्राणियों में ब्रह्म-स्वरूप हूँ।
श्रीहरि (रुद्रदेव) का पूजन – वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये चार व्यूह हैं। ईश्वर और अविनाशी विष्णु की उपासना इन्हीं चार स्वरूपों के माध्यम से करनी चाहिए।
- वासुदेव महाविष्णु का स्वरूप है।
- बलराम वेदज्ञ और वेदरूप हैं।
- प्रद्युम्न वेद और वेद–वेदांग के स्वरूप हैं।
- अनिरुद्ध वैराग्य और वन में विचरने वाले हैं।
परमपद परमात्मा का चिन्तन: जो व्यक्ति इस विष्णुपञ्जरस्तोत्र का पाठ करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है। यह स्तोत्र सभी पापों का विनाशक है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: विष्णुसहस्रनाम