वर्ण और आश्रम धर्म का निरूपण

ध्यान दें की यहाँ लिखी बात सिर्फ गरुड पुराण मे लिखी हुई जानकारी को दोहरा कर बताई गई है। आधुनिक समाज मे संविधान के हिसाब से चलते हुए वर्ण के आधार पर भेदभाव का हम कोई समर्थन नहीं करते हैं। इसे किसी व्यक्तिगत विचार के तौर पर न लें।

वर्णाश्रम-धर्म का निरूपण करते हुए ब्रह्माजी ने व्यक्त किया कि परमेश्वर ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन चार वर्णों को अपने-अपने धर्म के अनुसार कराया है। उनके द्वारा ये पृथक्-पृथक् रूप से धर्म का वर्णन किया गया है:

  • ब्राह्मणों का धर्म है यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन
  • क्षत्रिय का धर्म है प्रजा का साधारण धर्म
  • वैश्यों तथा शूद्रों का धर्म है कर्म

गृहस्थ धर्म को साधन रूप में बताया गया है। तपस्या, कृषिकर्म तथा व्यापार-ये वैश्यवृत्ति कही गई हैं। द्विजातियों की सेवा करना शूद्रों का कर्तव्य है। शिल्पकारी उनकी आजीविका कही गई है।

आश्रम-धर्म में भिक्षाचरण, गुरुओं की सेवा, स्वाध्याय तथा अग्निकार्य-ये ब्रह्मचारियों के धर्म हैं।

आदिगृहस्थ-धर्मों का पालन तथा कहे गए विहित कर्मों (जैसे-अग्निहोत्र-जीविकोपार्जन, पत्नियों को छोड़कर अन्य स्त्रियों से गर्भधारणा सहित सम्भोग, देवकार्य, पितृकार्य तथा अतिथिसेवा) को धर्म कहा गया है। इनके साथ ही संस्कारों का भी वर्णन किया गया है। तदनुसार गर्भधारण से लेकर मृत्युपर्यन्त संस्कार बताए गए हैं।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: वर्ण और आश्रम