देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! नवमी आदि तिथियोंमें ‘ॐ ह्रीं दुर्गां रक्षिणि’—इस मन्त्रसे देवी दुर्गाका पूजन करना चाहिये। मार्जारीय (आसन)-मार्गकी पूजाका विधिसे आरम्भ करके नाममन्त्रके अनुसार गौरी, काली, उमा, दुर्गा, भद्रा, कान्ति, सरस्वती, मङ्गला, विजया, लक्ष्मी, शिवा और नारायणी-रूपमें उन देवीका पूजन करनेवाले अभिज्ञ मनुष्यका इष्ट (प्रियजनों या प्रिय वस्तुओं)-से वियोग नहीं होता है।

हे विप्रयोग-कालमें एकत्र हैं। इनके हाथोंमें खेटक, घण्टा, दर्पण, तर्जनी-मुद्रा, धनुष, ध्वज, डमरू, चर्म, पाश और शूल, मृणल, कपाल, शरक (बाण), अंकुश, वज्र, चक्र और शलाक—ये सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसज्जित उन अष्टादश-भुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।

अष्टादश भुजावाली या अठारह भुजावाली अथवा बारह भुजावाली या आठ भुजा अथवा चार भुजावाली दुर्गादेवीका ही ध्यान करना चाहिये। महिषासुरका वध करनेवाली के देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं।

वासुदेवने कहा—हे रुद्र! सूर्यार्चनमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

वे भगवान् सूर्य तेजःस्वरूप, रक्त वर्णवाले, श्वेत पद्मपर विराजमान, एक चक्रवाले रथपर समसीन, दो भुजाओंसे युक्त तथा कमलको धारण करनेवाले हैं। इस रूपमें उनका सदैव ध्यान करना चाहिये।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे वृषध्वज! [अब] मैं माहेश्वरी-पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो—पहले स्नान तथा आचमन कर ले। इसके बाद आसनपर बैठकर न्यास करके मण्डलमें महेश्वरकी पूजा करे। हे महेशान! हरको पूजा परिवारके साथ करे। हे रुद्र! ‘ॐ ह्रीं शिवायैऽस्तु स्वाहा’—इस मन्त्रसे आसनके देवताओंका आवाहन करे। मण्डलके मुख्य द्वारपर शान्त, गन्ध आदिद्वारा ‘ॐ ह्रीं गणपतये नमः’ मन्त्रसे गणपतिकी, ‘ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः’ मन्त्रसे सरस्वतीकी, ‘ॐ ह्रीं नन्दिने नमः’ मन्त्रसे नन्दीकी, ‘ॐ ह्रीं महाकालाय नमः’ मन्त्रसे महाकालकी, ‘ॐ ह्रीं गङ्गायै नमः’ मन्त्रसे गङ्गाकी, ‘ॐ ह्रीं लक्ष्म्यै नमः’ मन्त्रसे लक्ष्मीकी, ‘ॐ ह्रीं महाकालाय नमः’ मन्त्रसे महाकालकी तथा ‘ॐ ह्रीं बलाय नमः’ मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।

इसी प्रकार ‘ॐ ह्रीं ब्रह्मणे वास्त्वधिपतये नमः’ से वास्तुअधिपतिकी, ‘ॐ ह्रीं गुरुभ्यो नमः’ से गुरुकी, ‘ॐ ह्रीं आधारशक्तये नमः’ से आधारशक्तिकी, ‘ॐ ह्रीं अनन्ताय नमः’ से अनन्तकी, ‘ॐ ह्रीं धर्माय नमः’ से धर्मकी, ‘ॐ ह्रीं ज्ञानाय नमः’ से ज्ञानकी, ‘ॐ ह्रीं वैराग्याय नमः’ से वैराग्यकी, ‘ॐ ह्रीं ऐश्वर्याय नमः’ से ऐश्वर्यकी, ‘ॐ ह्रीं अधर्माय नमः’ से अधर्मकी, ‘ॐ ह्रीं अज्ञानाय नमः’ से अज्ञानकी, ‘ॐ ह्रीं अवैराग्याय नमः’ से अवैराग्यकी, ‘ॐ ह्रीं अनैश्वर्याय नमः’ से अनैश्वर्यकी, ‘ॐ ह्रीं ऊर्ध्वच्छन्दाय नमः’ से ऊर्ध्वच्छन्दकी, ‘ॐ ह्रीं अधश्छन्दाय नमः’ से अधश्छन्दकी, ‘ॐ ह्रीं पद्माय नमः’ से पद्मकी, ‘ॐ ह्रीं कर्णिकायै नमः’ से कर्णिकाकी, ‘ॐ ह्रीं वामायै नमः’ से वामाकी, ‘ॐ ह्रीं ज्येष्ठायै नमः’ से ज्येष्ठाकी, ‘ॐ ह्रीं रौद्र्यै नमः’ से रौद्रीकी, ‘ॐ ह्रीं काल्यै नमः’ से कालीकी, ‘ॐ ह्रीं कलविकरण्यै नमः’ से कलविकरणीकी, ‘ॐ ह्रीं बलप्रमथिन्यै नमः’ से बलप्रमथिनीकी, ‘ॐ ह्रीं सर्वभूतदमन्यै नमः’ से सर्वभूतदमनीकी, ‘ॐ ह्रीं मनोन्मन्यै नमः’ से मनोन्मनीकी, ‘ॐ ह्रीं मण्डलधिपतये नमः’ से मण्डलपतिकी, ‘ॐ ह्रीं ह्रीं शिवसूर्यै नमः’ से शिवसूर्यकी, ‘ॐ ह्रीं विद्याधिपतये नमः’ से विद्याधिपतिकी और ‘ॐ ह्रीं ह्रीं शिवाय नमः’ से शिवकी पूजा करे।

अनन्तर ‘ॐ ह्रीं हृदयाय नमः’ से हृदयकी, ‘ॐ ह्रीं शिरसे नमः’ से सिरकी, ‘ॐ ह्रीं शिखायै नमः’ से शिखाकी, ‘ॐ ह्रीं कवचाय नमः’ से कवचकी, ‘ॐ ह्रीं नेत्रत्रयाय नमः’ से नेत्रत्रयकी, ‘ॐ हः अस्त्राय नमः’ से अस्त्रकी और ‘ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः’ से सद्योजातकी पूजा करे। सद्योजातकी आठ कलाएँ जानी चाहिए, जो पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनकी पूजा [गन्ध आदिसे] इस प्रकार करनी चाहिये—’ॐ ह्रीं सिद्धये नमः’ से सिद्धिकी, ‘ॐ ह्रीं ऋद्धयै नमः’ से ऋद्धिकी, ‘ॐ ह्रीं विभूतये नमः’ -से विभूतिकी, ‘ॐ ह्रीं लक्ष्म्यै नमः’ से लक्ष्मीकी, ‘ॐ ह्रीं बोधायै नमः’ से बोधाकी, ‘ॐ ह्रीं काल्यै नमः’ से कालीकी, ‘ॐ ह्रीं स्वाधायै नमः’ से स्वाधाकी और ‘ॐ ह्रीं प्रभायै नमः’ से प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषध्वज! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, उनकी भी पूजा गन्ध-पुष्प आदिसे करनी चाहिये। उनकी पूजामें पहले ‘ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः’ कहकर वामदेवकी पूजा करनेके बाद उनकी कलाओंका पूजन करना चाहिये। जैसे—’ॐ ह्रीं रजसे नमः’ से रजस्की, ‘ॐ ह्रीं रक्षायै नमः’ से रक्षाकी, ‘ॐ ह्रीं रत्यै नमः’ से रतिका, ‘ॐ ह्रीं कन्यायै नमः’ से कन्याकी, ‘ॐ ह्रीं कामायै नमः’ से कामाकी, ‘ॐ ह्रीं जनन्यै नमः’ से जननीकी, ‘ॐ ह्रीं क्रियायै नमः’ से क्रियाकी, ‘ॐ ह्रीं बुद्धयै नमः’ से बुद्धिकी, ‘ॐ ह्रीं कायै नमः’ से कायकी, ‘ॐ ह्रीं रा (घा)-त्रये नमः’ से रा (घा)-त्रि (त्री)-की, ‘ॐ ह्रीं श्रामण्यै नमः’ से श्रामणीकी, ‘ॐ ह्रीं मोहिन्यै नमः’ से मोहिनीकी और ‘ॐ ह्रीं क्षं (त्वं) रायै नमः’ से क्षं (त्व)-राकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषध्वज! तत्पुरुषकी चार कलाएँ हैं। पहले ‘ॐ ह्रीं तत्पुरुषाय नमः’ इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुषकी पूजा करे। तदनन्तर ‘ॐ ह्रीं निवृत्त्यै नमः’ से निवृत्तिकी, ‘ॐ ह्रीं प्रतिष्ठायै नमः’ से प्रतिष्ठाकी, ‘ॐ ह्रीं विद्यायै नमः’ से विद्याकी और ‘ॐ ह्रीं शान्त्यै नमः’ से शान्तिकी पूजा करनी चाहिये।

अघोरकी भैरव-सम्बन्धी छः कलाएँ जाननी चाहिये। इनकी पूजामें पहले ‘ॐ ह्रीं अघोराय नमः’ मन्त्रद्वारा अघोरकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ ह्रीं क्षमायै नमः’ से क्षमाकी, ‘ॐ ह्रीं निद्रायै नमः’ से निद्राकी, ‘ॐ ह्रीं निष्ठायै नमः’ से निष्ठाकी, ‘ॐ ह्रीं स्वाहायै नमः’ से स्वाहाकी, ‘ॐ ह्रीं क्षुधायै नमः’ से क्षुधाकी तथा ‘ॐ ह्रीं तुष्टायै नमः’ – से तुष्णाकी पूजा करनी चाहिये।

हे वृषध्वज! ईशानदेवकी पाँच कलाएँ हैं, इनकी पूजामें ‘ॐ ह्रीं ईशानाय नमः’ इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ ह्रीं सद्यै नमः’ से समितिकी, ‘ॐ ह्रीं अङ्गदायै नमः’ से अङ्गदकी, ‘ॐ ह्रीं कृष्णायै नमः’ से कृष्णाकी, ‘ॐ ह्रीं मरीच्यै नमः’ से मरीचिकी और ‘ॐ ह्रीं ज्वालिन्यै नमः’ से ज्वालाकी पूजा करे।

तदनन्तर हे शङ्कर! ‘ॐ ह्रीं शिवाधिपतिभ्यो नमः’ से शिवाधिपतिको, ‘ॐ ह्रीं इन्द्राय सुराधिपतये नमः’ से सुराधिपति इन्द्रका, ‘ॐ ह्रीं अग्नये तेजोऽधिपतये नमः’ से तेजोऽधिपति अग्निका, ‘ॐ ह्रीं यमाय प्रेताधिपतये नमः’ से प्रेताधिपति यमका, ‘ॐ ह्रीं निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये नमः’ से रक्षोऽधिपति निर्ऋतिका, ‘ॐ ह्रीं वरुणाय जलाधिपतये नमः’ से जलाधिपति वरुणका, ‘ॐ ह्रीं वायवे प्राणाधिपतये नमः’ से प्राणाधिपति वायुका, ‘ॐ ह्रीं सोमाय ईशानाय सस्यधिपतये नमः’ से सस्यधिपति ईशानका, ‘ॐ ह्रीं विद्याधिपतये नमः’ से सर्वविद्याधिपति ईशानका, ‘ॐ ह्रीं अनन्ताय नागाधिपतये नमः’ से नागाधिपति अनन्तका, ‘ॐ ह्रीं ब्रह्मणे सर्वलोकधिपतये नमः’ से सर्वलोकधिपति ब्रह्माका और ‘ॐ ह्रीं भूर्भुवःस्वस्तदब्रह्मका आवाहन, स्थापन, सन्निधान, सन्निरोध तथा सकलीकरण करना चाहिये।

तदनन्तर तत्त्व-न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, अर्घ्य, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन-वस्त्र, अलंकार, भोग, अन्न-व्यास, धूप, दीप, नैवेद्य-अर्पण, करद्वर्तन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गन्ध एवं ताम्बूल निवेदन करके बाद गीत, वाद्य, नृत्यसे महेश्वरको संतुष्टकर छत्र आदि समर्पित करना चाहिये। मुद्राका प्रदर्शन करके आह्लादित देवके रूपका ध्यान, जप तथा तादात्म्य-भावसे मूलमन्त्रद्वारा जप और पूजाको समर्पित करे।

इस प्रकार विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये विश्वरूप गन्धर्व तथा देवी कालात्रि आदिकी उपासना करनी चाहिये। 

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: पूजन विधि