गृहस्थाश्रम में स्त्री-पुरुष के कर्तव्य
स्त्रियों को अपने पति को आराध्य मानकर उसका पालन करना चाहिए। वे किसी प्रकार के धर्म, अर्थ और काम-इन त्रिवर्गों की अधिकारिणी होती हैं। जो स्त्री पति को मृत्यु पश्चात् अथवा उनके जीवित रहते हुए किसी अन्य पुरुष का आश्रय नहीं लेती, वह इस लोक में यज्ञ प्राप्त करती है और अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से परलोक में जाकर पार्वती के साहचर्य में आनन्द प्राप्त करती है।
गृहस्थ को अग्निहोत्र का पालन, चतुःसूत्र का पालन, भृत्य का भरण-पोषण, देव एवं मनुष्य ऋण से मुक्ति, नित्यकर्म का निर्वाह, दम, मूल तथा निरन्तर भक्षण, निषिद्ध कर्मों का परित्याग, त्रिकाल–सन्ध्या, ब्रह्मचर्य का पालन और देवता तथा अतिथि की पूजा-ये सब याज्ञिक धर्म हैं।
इन सबमें अहिंसा, प्रिय और सत्य वचन, पवित्रता, श्रम तथा दया-ये सभी आश्रमों के वर्णाश्रमी धर्म कहे गए हैं।
श्लोक: क्षमिणों निगिर्णां चैव साधयो धर्म उच्यते।। (१।२३।२२)
सदाचार और शुद्धि का महत्त्व
सदाचार और शीखाचार का निरूपण करते हुए मनुजी और शौनकादि ऋषियों ने कहते हैं कि श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र) का भली प्रकार अध्ययन करके वृत्ति–प्रवृत्ति प्रतिपादित धर्म का पालन करना चाहिए, क्योंकि श्रुति ही सर्व कर्मों का मूल है। स्मृति को ही धर्म कहा गया है। स्मृति और शास्त्रों से प्रतिपादित धर्म अपर धर्म हैं।
कर्म का फलाकाँक्षा रहित होकर दान, निहलोभ, विश्वास, दया, पूजा और इन्द्रिय–दमन-ये आठ शिष्टाचार के पवित्र लक्षण कहे गए हैं।
शुद्धि दो प्रकार की होती है-पहली बाह्य शुद्धि तथा दूसरी आभ्यन्तरिक। मिट्टी तथा जल से जाने वाली बाह्य शुद्धि और भाषा की शुद्धि को आभ्यन्तरिक शुद्धि मानी गई है। आचमन को शुद्धि का प्रमुख अंग माना गया है।
प्रातःकाल का स्नान शरीर की शुद्धि हेतु मन को प्रसन्न रखने वाला तथा रूप और सौभाग्य की वृद्धि करने वाला है। यह शोक और दुःख का विनाशक है। गङ्गास्नान से भी अधिक पाप का नाश होता है।
धन का सदुपयोग और आजीविका
हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा-सदैव इनका दान और पूजन करना चाहिए।
पिता, माता, गुरु, भ्राता, पुत्र, दीन, दुःखी, अतिथिजन, अनाथ, अग्नि और अन्य-ये पोष्य वर्ग कहे गए हैं। पोष्यवर्ग का भरण-पोषण करना स्वर्ग का रास्ता है।
शास्त्र-सम्मत विहित अर्जित धन से लाभान्वित सभी लोगों को विष्णु, देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। ये संयुक्त होकर धनापाय में अज्ञात हुए दोषों को निःशेष शान्त कर देते हैं।
शिक्षा, शिल्प, सेवा, सेवा, गौरव, व्यापार, कृषि, कृति, भिक्षा और यात्र-ये दस जीवनोपाय के साधन हैं।
सन्ध्या, स्नान, जप, होम, देव और अतिथि–पूजन-इन पदकर्मों को प्रतिदिन करना कर्तव्य है।
न्याय–पूर्वक उपार्जित अर्थ ही दान–भोग का मूल होता है।
शालग्राम को धर्म का विशेष भाव माना गया है। ये पुरुषोत्तम हैं, देव हैं। एक लौह वस्तु का प्रतिपादन (विनियोग) दान करते हैं। इस लोक में यह दान भोग तथा परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाला है।
स्त्रियों को अपने पति को आराध्य मानकर उसका पालन करना चाहिए। वे किसी प्रकार के धर्म, अर्थ और काम-इन त्रिवर्गों की अधिकारिणी होती हैं। जो स्त्री पति को मृत्यु पश्चात् अथवा उनके जीवित रहते हुए किसी अन्य पुरुष का आश्रय नहीं लेती, वह इस लोक में यज्ञ प्राप्त करती है और अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से परलोक में जाकर पार्वती के साहचर्य में आनन्द प्राप्त करती है।
गृहस्थ को अग्निहोत्र का पालन, चतुःसूत्र का पालन, भृत्य का भरण-पोषण, देव एवं मनुष्य ऋण से मुक्ति, नित्यकर्म का निर्वाह, दम, मूल तथा निरन्तर भक्षण, निषिद्ध कर्मों का परित्याग, त्रिकाल–सन्ध्या, ब्रह्मचर्य का पालन और देवता तथा अतिथि की पूजा-ये सब याज्ञिक धर्म हैं।
इन सबमें अहिंसा, प्रिय और सत्य वचन, पवित्रता, श्रम तथा दया-ये सभी आश्रमों के वर्णाश्रमी धर्म कहे गए हैं।
श्लोक: क्षमिणों निगिर्णां चैव साधयो धर्म उच्यते।। (१।२३।२२)
सदाचार और शुद्धि का महत्त्व
सदाचार और शीखाचार का निरूपण करते हुए मनुजी और शौनकादि ऋषियों ने कहते हैं कि श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र) का भली प्रकार अध्ययन करके वृत्ति–प्रवृत्ति प्रतिपादित धर्म का पालन करना चाहिए, क्योंकि श्रुति ही सर्व कर्मों का मूल है। स्मृति को ही धर्म कहा गया है। स्मृति और शास्त्रों से प्रतिपादित धर्म अपर धर्म हैं।
कर्म का फलाकाँक्षा रहित होकर दान, निहलोभ, विश्वास, दया, पूजा और इन्द्रिय–दमन-ये आठ शिष्टाचार के पवित्र लक्षण कहे गए हैं।
शुद्धि दो प्रकार की होती है-पहली बाह्य शुद्धि तथा दूसरी आभ्यन्तरिक। मिट्टी तथा जल से जाने वाली बाह्य शुद्धि और भाषा की शुद्धि को आभ्यन्तरिक शुद्धि मानी गई है। आचमन को शुद्धि का प्रमुख अंग माना गया है।
प्रातःकाल का स्नान शरीर की शुद्धि हेतु मन को प्रसन्न रखने वाला तथा रूप और सौभाग्य की वृद्धि करने वाला है। यह शोक और दुःख का विनाशक है। गङ्गास्नान से भी अधिक पाप का नाश होता है।
धन का सदुपयोग और आजीविका
हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा-सदैव इनका दान और पूजन करना चाहिए।
पिता, माता, गुरु, भ्राता, पुत्र, दीन, दुःखी, अतिथिजन, अनाथ, अग्नि और अन्य-ये पोष्य वर्ग कहे गए हैं। पोष्यवर्ग का भरण-पोषण करना स्वर्ग का रास्ता है।
शास्त्र-सम्मत विहित अर्जित धन से लाभान्वित सभी लोगों को विष्णु, देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। ये संयुक्त होकर धनापाय में अज्ञात हुए दोषों को निःशेष शान्त कर देते हैं।
शिक्षा, शिल्प, सेवा, सेवा, गौरव, व्यापार, कृषि, कृति, भिक्षा और यात्र-ये दस जीवनोपाय के साधन हैं।
सन्ध्या, स्नान, जप, होम, देव और अतिथि–पूजन-इन पदकर्मों को प्रतिदिन करना कर्तव्य है।
न्याय–पूर्वक उपार्जित अर्थ ही दान–भोग का मूल होता है।
शालग्राम को धर्म का विशेष भाव माना गया है। ये पुरुषोत्तम हैं, देव हैं। एक लौह वस्तु का प्रतिपादन (विनियोग) दान करते हैं। इस लोक में यह दान भोग तथा परलोक में मोक्ष प्रदान करने वाला है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: गृहस्थाश्रम