गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि
श्रीहरि ने कहा—हे शङ्कर! अब मैं गायत्रीदेवीके [पूजनमें] न्यासादिकका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, भरद्वाज गोत्र और छन्द त्रिष्टुप् है। गायत्री देवी परमात्मा की शक्ति और सिद्ध रूप हैं। मैं विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हूँ। वे वियोगिनी-कलहमें एकत्र हैं। इनका चक्षुर्मुख कल्यापानन-गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा वे पृथ्वीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीके स्वरूपको इस प्रकार जानकर [गायत्री-मन्त्रका] बारह लाख जप करना चाहिये।
इस मन्त्रके त्रिपाद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छः अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपादा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया है।
जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।
पैरके अँगूठे-भागमें, गुल्फके मध्यमें, दोनों जंघाओं, दोनों जानुओं, ऊरु-भाग, गुप्तस्थान, अण्डकोष, नाभि, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और पीछे तथा मस्तकमें इस (गायत्री)-मन्त्रका न्यास करके क्रमशः पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें न्यास करना चाहिये।
हे रुद्र! इन गायत्रीदेवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों)-को कह रहा हूँ। क्रमशः इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निकुण्डल, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युद्वर्ण, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पयोरानुराग, शङ्खवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसक्तके समान रक्तकुष्ठमणिवर्ण, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।
गायत्रीदेवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे जिनका-जिनका अवलोकन करता है, वे सभी पवित्र हो जाते हैं। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र नहीं है, ऐसा समझना चाहिये-
यत्प्रभवति सत्वेन यच्च पश्यति चक्षुषा।पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥ (३५।११)
श्रीहरि ने पुनः कहा—हे रुद्र! अब पापनाशिनी संध्याकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें। तीन बार प्राणायाम करके संध्या’-कालका उपक्रम करे। प्राणायामकी संध्याकर प्रणवमन्त्र (ॐकार) तथा सप्त व्याहृतियोंसे युक्त गायत्री-मन्त्रका (आगे ज्योतिरसोऽमृतं भूर्भुवः स्वः)-का मन्त्र गायत्री सिर्फके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, वाचिक तथा कायिक दोषोंको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि पचासियत सभी कृत्योंमें प्राणायामापरायण होना चाहिये।
प्रातः ‘सूर्यश्च’ इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्में ‘आपः पुनन्तु’ इस मन्त्रसे तथा सायंकाल ‘अग्निश्च मा मन्युश्च’ इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव-मन्त्रसे युक्त ‘आपो हि ष्ठा’ इस ऋचासे कुशोदकके द्वारा मार्जन करते हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के।
रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य पाप, जायज्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें होनेवाले पाप तथा कायिक, वाचिक एवं मानसिक-ये नबों पाप इन नौ मन्त्रोंसे (मार्जनद्वारा) भस्म हो जाते हैं-
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजांश्च।वाचसःकर्मजान् दोषान् नवेतान् नवमिर्दहेत्॥ (३६।६)
दाहिने हाथमें जल लेकर उसे ‘सूर्यश्च’ मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रितकर सिरपर छोड़ दे। अघमर्षण मन्त्रकी तीन, छः, आठ अथवा बारह आवृत्ति करके अघमर्षण करे।
तत्पश्चात् ‘उद् वयं’ तथा ‘चित्रं’-इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त पापोंका उस क्षण नाश हो जाता है।
प्रातः-कालकी संध्या छद्म होकर तथा मध्याह्न एवं सायंकालकी संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव (ॐकार) और महाव्याहृतियों अर्थात् ‘भूः, भुवः, स्वः’ से संयुक्त करके गायत्री-मन्त्रका दस बार जप करनेसे इस जन्मके पाप, सौ बार जप करनेपर पूर्वजन्मके पाप तथा हजार बार गायत्रीका जप करनेसे तीन युगोंके पाप नष्ट हो जाते हैं-
दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम्।त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्ति दुष्कृतम्॥ (३६।१०)
प्रातःकालमें गायत्री रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री शुक्लावर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कही गयी है।’ गायत्री-मन्त्रकी प्रथम व्याहृति ‘भूः’ का ‘ॐ भूः हृदयाय नमः’ से हृदयमें, द्वितीय व्याहृति ‘भुवः’ का ‘ॐ भुवः शिरसे स्वाहा’ से सिरमें तथा तृतीय व्याहृति ‘स्वः’ का ‘ॐ स्वः शिखायै वषट्’ से शिखामें न्यास करे। गायत्री-मन्त्रके प्रथम पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं)-का कवचमें, द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि)-का नेत्रोंमें तथा तृतीय पाद (धियो यो नः प्रचोदयात्)-का अस्त्रमें और चतुर्थ पाद (परोरजसेऽसावदोम्)-का सर्वाङ्गमें न्यास करे। संध्याके समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका जप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके अनन्तर सभी अङ्गोंमें न्यास करे।
त्रिपादा गायत्री ब्रह्म-विष्णु और शिवस्वरूप है। इसके ऋषि, छन्द और विनियोगको भलीभाँति जानकर जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
‘परोरजसेऽसावदोम्’ यह गायत्रीका तुरीय पाद कहा जाता है। जो व्यक्ति संध्यापासन नहीं करता है, उसको सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं।
जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली परब्रह्मा देवी गायत्रीका जप करता है, उसके महान्-से-महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।
प्रातः, मध्याह्न एवं सायम्–इन तीनों संध्याओंमें १००८ या १०८ बार गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक जानेका अधिकारी हो जाता है।
श्रीहरि ने कहा—हे शङ्कर! अब मैं गायत्रीदेवीके [पूजनमें] न्यासादिकका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, भरद्वाज गोत्र और छन्द त्रिष्टुप् है। गायत्री देवी परमात्मा की शक्ति और सिद्ध रूप हैं। मैं विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हूँ। वे वियोगिनी-कलहमें एकत्र हैं। इनका चक्षुर्मुख कल्यापानन-गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा वे पृथ्वीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीके स्वरूपको इस प्रकार जानकर [गायत्री-मन्त्रका] बारह लाख जप करना चाहिये।
इस मन्त्रके त्रिपाद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छः अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपादा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया है।
जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।
पैरके अँगूठे-भागमें, गुल्फके मध्यमें, दोनों जंघाओं, दोनों जानुओं, ऊरु-भाग, गुप्तस्थान, अण्डकोष, नाभि, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और पीछे तथा मस्तकमें इस (गायत्री)-मन्त्रका न्यास करके क्रमशः पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें न्यास करना चाहिये।
हे रुद्र! इन गायत्रीदेवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों)-को कह रहा हूँ। क्रमशः इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निकुण्डल, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युद्वर्ण, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पयोरानुराग, शङ्खवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसक्तके समान रक्तकुष्ठमणिवर्ण, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।
गायत्रीदेवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे जिनका-जिनका अवलोकन करता है, वे सभी पवित्र हो जाते हैं। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र नहीं है, ऐसा समझना चाहिये-
यत्प्रभवति सत्वेन यच्च पश्यति चक्षुषा।पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥ (३५।११)
श्रीहरि ने पुनः कहा—हे रुद्र! अब पापनाशिनी संध्याकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें। तीन बार प्राणायाम करके संध्या’-कालका उपक्रम करे। प्राणायामकी संध्याकर प्रणवमन्त्र (ॐकार) तथा सप्त व्याहृतियोंसे युक्त गायत्री-मन्त्रका (आगे ज्योतिरसोऽमृतं भूर्भुवः स्वः)-का मन्त्र गायत्री सिर्फके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, वाचिक तथा कायिक दोषोंको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि पचासियत सभी कृत्योंमें प्राणायामापरायण होना चाहिये।
प्रातः ‘सूर्यश्च’ इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्में ‘आपः पुनन्तु’ इस मन्त्रसे तथा सायंकाल ‘अग्निश्च मा मन्युश्च’ इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव-मन्त्रसे युक्त ‘आपो हि ष्ठा’ इस ऋचासे कुशोदकके द्वारा मार्जन करते हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के।
रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य पाप, जायज्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें होनेवाले पाप तथा कायिक, वाचिक एवं मानसिक-ये नबों पाप इन नौ मन्त्रोंसे (मार्जनद्वारा) भस्म हो जाते हैं-
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजांश्च।वाचसःकर्मजान् दोषान् नवेतान् नवमिर्दहेत्॥ (३६।६)
दाहिने हाथमें जल लेकर उसे ‘सूर्यश्च’ मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रितकर सिरपर छोड़ दे। अघमर्षण मन्त्रकी तीन, छः, आठ अथवा बारह आवृत्ति करके अघमर्षण करे।
तत्पश्चात् ‘उद् वयं’ तथा ‘चित्रं’-इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त पापोंका उस क्षण नाश हो जाता है।
प्रातः-कालकी संध्या छद्म होकर तथा मध्याह्न एवं सायंकालकी संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव (ॐकार) और महाव्याहृतियों अर्थात् ‘भूः, भुवः, स्वः’ से संयुक्त करके गायत्री-मन्त्रका दस बार जप करनेसे इस जन्मके पाप, सौ बार जप करनेपर पूर्वजन्मके पाप तथा हजार बार गायत्रीका जप करनेसे तीन युगोंके पाप नष्ट हो जाते हैं-
दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम्।त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्ति दुष्कृतम्॥ (३६।१०)
प्रातःकालमें गायत्री रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री शुक्लावर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कही गयी है।’ गायत्री-मन्त्रकी प्रथम व्याहृति ‘भूः’ का ‘ॐ भूः हृदयाय नमः’ से हृदयमें, द्वितीय व्याहृति ‘भुवः’ का ‘ॐ भुवः शिरसे स्वाहा’ से सिरमें तथा तृतीय व्याहृति ‘स्वः’ का ‘ॐ स्वः शिखायै वषट्’ से शिखामें न्यास करे। गायत्री-मन्त्रके प्रथम पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं)-का कवचमें, द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि)-का नेत्रोंमें तथा तृतीय पाद (धियो यो नः प्रचोदयात्)-का अस्त्रमें और चतुर्थ पाद (परोरजसेऽसावदोम्)-का सर्वाङ्गमें न्यास करे। संध्याके समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका जप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके अनन्तर सभी अङ्गोंमें न्यास करे।
त्रिपादा गायत्री ब्रह्म-विष्णु और शिवस्वरूप है। इसके ऋषि, छन्द और विनियोगको भलीभाँति जानकर जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
‘परोरजसेऽसावदोम्’ यह गायत्रीका तुरीय पाद कहा जाता है। जो व्यक्ति संध्यापासन नहीं करता है, उसको सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं।
जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली परब्रह्मा देवी गायत्रीका जप करता है, उसके महान्-से-महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।
प्रातः, मध्याह्न एवं सायम्–इन तीनों संध्याओंमें १००८ या १०८ बार गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक जानेका अधिकारी हो जाता है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: पूजन विधि