ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींक का फल तथा सूर्यचक्र आदि का निरूपण
श्रीहरि ने कहा—[हे शिव! अब मैं ग्रहों की महादशा का वर्णन कर रहा हूँ।] सूर्य की दशा छः वर्ष, चन्द्र की दशा पंद्रह वर्ष, मंगल की दशा आठ वर्ष, बुध की दशा सत्रह वर्ष, बृहस्पति की दशा सोलह वर्ष, शुक्र की दशा इक्कीस वर्ष, शनि की दशा चारह वर्ष तथा शुक्र की दशा इक्कीस वर्ष रहती है।
सूर्य की दशा राजा को देने वाली होती है और उद्योग को पैदा करती है तथा राजा को नाश करती है। चन्द्र की दशा ऐश्वर्य देने वाली, सुख पैदा करने वाली तथा (इष्ट) मनोऽनुकूल अन्न देने वाली होती है।
मंगल की दशा दुःख देने वाली तथा राज्यादि का विनाश करने वाली है। बुध की दशा स्त्री का लाभ, राज्य-प्राप्ति एवं कौतूहल वर्धकों को देने वाली है। शुक्र की दशा राजा का नाश और शत्रु-बान्धवों को कष्ट-प्रदान करने वाली है। बृहस्पति की दशा राज्य-लाभ और सुख-समृद्धि तथा धर्म देने वाली है। राहु की दशा राज्य का नाश करती है, व्याधि को प्राप्त करती है और दुःख पैदा करती है। शुक्र की दशा में हाथी, घोड़ा, राज्य तथा स्त्री का लाभ होता है।
मेष मंगल का, मिथुन बुध का, मिथुन शुक्र का और कर्क चन्द्रमा का क्षेत्र कहा गया है। सूर्य का क्षेत्र सिंह एवं बुध का क्षेत्र कन्या राशि है। तुलाराशि शुक्र का, वृश्चिक मंगल का, धनु बृहस्पति का, धनु शनि का क्षेत्र मकर एवं कुम्भ और मीन बृहस्पतिवार का क्षेत्र कहा गया है। कर्म राशि में सूर्य आ जाने पर भगवान् विष्णु का चयन करे।
अश्विनी, रेवती, चित्रा, धनिष्ठा—ये नक्षत्र आभूषण धारण करने में दाहिने हाथ में साँप, बन्दर, बिलाव, कुत्ता, सूअर, पक्षी (नीलकण्ठ आदि), नेवला तथा चूहा दिखायी देना मंगलकारी होता है। यात्रा में ब्राह्मण को नमस्कार दशा-शेष की महादशा भी नहीं दिखलायी गयी है। महर्षि पराशर के अनुसार प्रवृत्ता काल चक्र भी भगवान् विष्णु के इस संसार में सूर्य की महादशा छः वर्ष होती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इस प्रकार बुध तरह वर्ष, शुक्र तरह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा छः वर्ष होती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इस प्रकार बुध तरह वर्ष, शुक्र तरह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा है। मंगल की महादशा सात वर्ष है, राहु अठारह वर्ष है, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा है। मंगल की महादशा सात वर्ष है, राहु अठारह वर्ष है, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष है, केतु सात वर्ष एवं शुक्र बीस वर्ष तक भोग करता है। इन का योग एक सौ बीस वर्ष होता है, जो महर्षि पराशर द्वारा मानव-वर्ष के लिये परिकल्पित है। इसलिये यह विंशोत्तरी महादशा कहलाती है, इसी प्रकार दूसरा अष्टोत्तरी महादशा है, उन के संख्यानुसार योग पिण्ड क्रम तथा दश-सर्वथा भिन्न हैं।
दर्शन हो जाना मङ्गल होने का सूचक है तथा शत्रु का दर्शन हो जाना, वेणु, रम्भा, जल से भरा कलश दिखायी देना कल्याण-प्राप्ति का सूचक है।
यात्रा में बायीं ओर शृगाल, ऊँट और गदहा आदिका दिखायी देना मङ्गलकारी होता है। यात्रा में काण, औषधि, तैल, दहकते अङ्गार, सर्प, बाल बिखेरे, लाल माला पहने और नग्न अवस्था में यदि कोई व्यक्ति दिखायी दे तो अशुभ होता है।
अब मैं छिक्का (छींक)-के शुभ-अशुभ फलों का वर्णन कर रहा हूँ। पूर्व दिशा में छींक होने पर बहुत बड़ा फल प्राप्त होता है। अग्निकोण में छींक होने पर शोक और संताप तथा दक्षिण में छींक होने पर हानि उठानी पड़ती है। नैर्ऋत्यकोण में छींक होने पर शोक और संताप तथा पश्चिम में छींक होने पर मिष्टान्न की प्राप्ति होती है। वायव्य में छींक होने पर धन की प्राप्ति और उत्तर में छींक होने पर कलह होता है। ईशानकोण में छींक होने पर मरण के समान कष्ट प्राप्त होता बताया गया है।
मध्य काल में भगवान् सूर्य की प्रतिमा का चित्रण करे। सूर्य की प्रतिमा बनाने में दिन सूर्य जिस नक्षत्र पर हो, उस नक्षत्र से तीन नक्षत्र उस प्रतिमा के मस्तक पर अंकित करे। मुख के मध्य में अंकित सूर्यनक्षत्र से आगे तीन नक्षत्र लिखे और उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों कपोलों पर लिखे। फिर उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों भुजाओं पर लिखे और उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों हाथों पर लिखे। उस से आगे पाँच नक्षत्र हृदय-प्रदेश पर लिखे तथा उस से आगे एक नक्षत्र नाभि मण्डल में लिखे। उस से आगे गुह्य स्थान में लिखे। उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों घुटनों पर लिखे। शेष नक्षत्र सूर्य के चरण पर लिखे।
सूर्य चक्र के चरणों में जातक का जन्म नक्षत्र हो तो जातक अल्पायु होता है। वही नक्षत्र यदि घुटनों पर पड़ता है तो जातक विदेश यात्रा वाला होता है और यदि गुह्य स्थान पर पड़े तो पर-स्त्री गामी होता है। नाभि मण्डल में पड़ने पर धनी हो जाने वाला है। यदि हृदय स्थान में पड़ता है तो महेश्वर होता है। यदि पाणिस्थान में पड़ता है तो चोर होता है। वही यदि भुजाओं पर पड़ता है तो उसका कहीं निश्चित स्थान नहीं रहता। यदि कपोलों पर पड़ जाय तो वह धन पति-कुबेर होता है। यदि मुख पर पड़ जाय तो मिष्टान्न प्राप्त करता रहता है और यदि मस्तक पर जातक-नक्षत्र पड़ जाय तो जातक रश्मि-बल धारी होता है। (अध्याय ६०)
श्रीहरि ने कहा—[हे शिव! अब मैं ग्रहों की महादशा का वर्णन कर रहा हूँ।] सूर्य की दशा छः वर्ष, चन्द्र की दशा पंद्रह वर्ष, मंगल की दशा आठ वर्ष, बुध की दशा सत्रह वर्ष, बृहस्पति की दशा सोलह वर्ष, शुक्र की दशा इक्कीस वर्ष, शनि की दशा चारह वर्ष तथा शुक्र की दशा इक्कीस वर्ष रहती है।
सूर्य की दशा राजा को देने वाली होती है और उद्योग को पैदा करती है तथा राजा को नाश करती है। चन्द्र की दशा ऐश्वर्य देने वाली, सुख पैदा करने वाली तथा (इष्ट) मनोऽनुकूल अन्न देने वाली होती है।
मंगल की दशा दुःख देने वाली तथा राज्यादि का विनाश करने वाली है। बुध की दशा स्त्री का लाभ, राज्य-प्राप्ति एवं कौतूहल वर्धकों को देने वाली है। शुक्र की दशा राजा का नाश और शत्रु-बान्धवों को कष्ट-प्रदान करने वाली है। बृहस्पति की दशा राज्य-लाभ और सुख-समृद्धि तथा धर्म देने वाली है। राहु की दशा राज्य का नाश करती है, व्याधि को प्राप्त करती है और दुःख पैदा करती है। शुक्र की दशा में हाथी, घोड़ा, राज्य तथा स्त्री का लाभ होता है।
मेष मंगल का, मिथुन बुध का, मिथुन शुक्र का और कर्क चन्द्रमा का क्षेत्र कहा गया है। सूर्य का क्षेत्र सिंह एवं बुध का क्षेत्र कन्या राशि है। तुलाराशि शुक्र का, वृश्चिक मंगल का, धनु बृहस्पति का, धनु शनि का क्षेत्र मकर एवं कुम्भ और मीन बृहस्पतिवार का क्षेत्र कहा गया है। कर्म राशि में सूर्य आ जाने पर भगवान् विष्णु का चयन करे।
अश्विनी, रेवती, चित्रा, धनिष्ठा—ये नक्षत्र आभूषण धारण करने में दाहिने हाथ में साँप, बन्दर, बिलाव, कुत्ता, सूअर, पक्षी (नीलकण्ठ आदि), नेवला तथा चूहा दिखायी देना मंगलकारी होता है। यात्रा में ब्राह्मण को नमस्कार दशा-शेष की महादशा भी नहीं दिखलायी गयी है। महर्षि पराशर के अनुसार प्रवृत्ता काल चक्र भी भगवान् विष्णु के इस संसार में सूर्य की महादशा छः वर्ष होती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इस प्रकार बुध तरह वर्ष, शुक्र तरह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा छः वर्ष होती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इस प्रकार बुध तरह वर्ष, शुक्र तरह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा है। मंगल की महादशा सात वर्ष है, राहु अठारह वर्ष है, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष की महादशा है। मंगल की महादशा सात वर्ष है, राहु अठारह वर्ष है, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष है, केतु सात वर्ष एवं शुक्र बीस वर्ष तक भोग करता है। इन का योग एक सौ बीस वर्ष होता है, जो महर्षि पराशर द्वारा मानव-वर्ष के लिये परिकल्पित है। इसलिये यह विंशोत्तरी महादशा कहलाती है, इसी प्रकार दूसरा अष्टोत्तरी महादशा है, उन के संख्यानुसार योग पिण्ड क्रम तथा दश-सर्वथा भिन्न हैं।
दर्शन हो जाना मङ्गल होने का सूचक है तथा शत्रु का दर्शन हो जाना, वेणु, रम्भा, जल से भरा कलश दिखायी देना कल्याण-प्राप्ति का सूचक है।
यात्रा में बायीं ओर शृगाल, ऊँट और गदहा आदिका दिखायी देना मङ्गलकारी होता है। यात्रा में काण, औषधि, तैल, दहकते अङ्गार, सर्प, बाल बिखेरे, लाल माला पहने और नग्न अवस्था में यदि कोई व्यक्ति दिखायी दे तो अशुभ होता है।
अब मैं छिक्का (छींक)-के शुभ-अशुभ फलों का वर्णन कर रहा हूँ। पूर्व दिशा में छींक होने पर बहुत बड़ा फल प्राप्त होता है। अग्निकोण में छींक होने पर शोक और संताप तथा दक्षिण में छींक होने पर हानि उठानी पड़ती है। नैर्ऋत्यकोण में छींक होने पर शोक और संताप तथा पश्चिम में छींक होने पर मिष्टान्न की प्राप्ति होती है। वायव्य में छींक होने पर धन की प्राप्ति और उत्तर में छींक होने पर कलह होता है। ईशानकोण में छींक होने पर मरण के समान कष्ट प्राप्त होता बताया गया है।
मध्य काल में भगवान् सूर्य की प्रतिमा का चित्रण करे। सूर्य की प्रतिमा बनाने में दिन सूर्य जिस नक्षत्र पर हो, उस नक्षत्र से तीन नक्षत्र उस प्रतिमा के मस्तक पर अंकित करे। मुख के मध्य में अंकित सूर्यनक्षत्र से आगे तीन नक्षत्र लिखे और उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों कपोलों पर लिखे। फिर उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों भुजाओं पर लिखे और उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों हाथों पर लिखे। उस से आगे पाँच नक्षत्र हृदय-प्रदेश पर लिखे तथा उस से आगे एक नक्षत्र नाभि मण्डल में लिखे। उस से आगे गुह्य स्थान में लिखे। उस से आगे एक-एक नक्षत्र दोनों घुटनों पर लिखे। शेष नक्षत्र सूर्य के चरण पर लिखे।
सूर्य चक्र के चरणों में जातक का जन्म नक्षत्र हो तो जातक अल्पायु होता है। वही नक्षत्र यदि घुटनों पर पड़ता है तो जातक विदेश यात्रा वाला होता है और यदि गुह्य स्थान पर पड़े तो पर-स्त्री गामी होता है। नाभि मण्डल में पड़ने पर धनी हो जाने वाला है। यदि हृदय स्थान में पड़ता है तो महेश्वर होता है। यदि पाणिस्थान में पड़ता है तो चोर होता है। वही यदि भुजाओं पर पड़ता है तो उसका कहीं निश्चित स्थान नहीं रहता। यदि कपोलों पर पड़ जाय तो वह धन पति-कुबेर होता है। यदि मुख पर पड़ जाय तो मिष्टान्न प्राप्त करता रहता है और यदि मस्तक पर जातक-नक्षत्र पड़ जाय तो जातक रश्मि-बल धारी होता है। (अध्याय ६०)
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: योगों तथा मुहूर्तों का वर्णन