जीव का परम लक्ष्य क्या है और इसकी प्राप्ति के लिए कौन-से साधन अनिवार्य हैं?

इन उपदेशों के क्रम में आगे पुराणों के स्वामी, भक्तों के स्वामी श्रीहरि का स्वरूप बताया गया है, जो दुराराधी है, परन्तु भक्तों के लिए सुलभ है।

श्रीहरि का स्वरूप और महिमा

श्रीहरि अपने भक्त पर सर्वदा कृपा करते हैं, और उन्हें ज्ञान देते हैं कि वह दुराराधी मनुष्य की भाँति रक्त आदि से उत्पन्न नहीं हैं, किन्तु वह धर्म, अर्थ और काम–इन त्रिवर्गों की अधिकारिणी होती है। जो जीव स्वरूप से मुक्त है, उसे अन्य सुख या दुःख नहीं होता।

श्लोक: संसारोत्पत्तिविनाशके केशवादिषु भत्तिनम्। (१।२३।१३२)

इस संसार के विषवृक्ष के समान फल हैं, और जो भक्त भगवान् के भक्तों की रक्षा और दुरात्मा फल है, उनका नाश करता है।

नाम-संकीर्तन की महिमा का वर्णन करते हुए सनत्कुमार कहते हैं कि मुक्ति के कारणभूत, अन्त, जप, नित्य और अक्षय और अक्षय भगवान् विष्णु के नाम को जो मनुष्य जप करता है, वह समस्त संसार के लिए विष्णुकृष्णसहस्त्रनाम से उपाय को जानता है।

यदि कोई मनुष्य अपने पाप-आचरण को नष्ट कर देता है। यदि कोई मनुष्य बारम्बार परम्परा से जप कर नाम लेता है, तो फिर उसे विस्मृत करना ही क्या है? ‘हे कृष्ण! हे अच्युत! हे अनन्त! हे वासुदेव! आपका नमस्कार है!’ ऐसा कहकर श्रीविष्णु के विष्णुपद को प्राप्त करते हैं, वे पुनरावृत्ति नहीं करते। सूर्य के उदित हो जाने पर जैसे अंधकार विनष्ट हो जाता है, वैसे ही हरि के नामसंकीर्तन करने से पापौपयिक पाप-समूह का विनाश हो जाता है।

मुक्ति का मार्ग और योगाभ्यास

इसके अनन्तर श्रीतनुपुत्री भगवान् विष्णु द्वारा कहे गए नारदसंहिता (नृसिंहोत्तकाण्ड) का वर्णन करते हैं। इसके साथ ही ‘कुल**-अनुशासन‘ का वर्णन किया गया है, जो देवकार्य पुनरावृत्ति विष्णु की पूजा कही गई है। तदनन्तर महादेव मुनि द्वारा कहे गए मुक्ति का निर्धारण करने वाले ‘मृत्युआम्**-ये‘ आदि शिष्टाचार के पवित्र लक्षण कहे गए हैं। यहाँ प्रातःकाल जाननेवाले अमृतसत्त्व का वर्णन किया गया है। यहाँ श्लोक द्वारा नारद पुनरावृत्ति अमृतत्व ज्ञान को प्राप्त करते हैं।

आचार्यादि जन अज्ञान को जानकर अज्ञान, आज्ञान तथा मीमांसकों का निरूपण निष्कर्ष करते हैं।

जीव का अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीव को नमी प्राप्त गति है, जब वह पूर्वउक्त तत्त्व त्रिशूलप्रकृति का परिमाण कर देता है। जीव को मुक्ति प्राप्त करने के लिए प्रकृति स्वर्ग को अंग करना अनिवार्य है। इसके लिए शद् आदि विषयों से प्रति अनासक्ति होना आवश्यक है। प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान–ये छः योग के प्रमुख अंग माने गए हैं।

इन्द्रियसंयम से पाप का क्षय और पापरहित देववृत्ति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति और मुक्तिसाधकों की उन्मुख होने के लिए प्रथम और अनिवार्य साधन है।

आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान

भगवान् नारद जी कहते हैं-जो कर्म से परमब्रह्म और ज्ञान से जीव को संसार से मुक्त हो जाते हैं। इसलिए आत्माआत्मा का आश्रय करना सर्वोत्तम है। जो आत्माआत्मा से सत् है, उसे अज्ञान कहा जाता है। जब हृदय में स्वस्थ कर्म समाहित हो जाते हैं, तब जीव निस्संदेह जीवनकाल में ही अमृत सर्वस्व कर लेता है।

श्लोक: जीव विमुक्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। तदमृतमभिसम्पद्यते जीवन व न संशयः॥ (१।२३।९२)

वह मृत्यु के पार चला जाता है। तेजओज स्वरूप ब्रह्म है, और यह ब्रह्म स्वयं पुण्य स्वरूप संपन्न होना चाहिए। जैसे अपनी आत्मा सदा प्रिय है, वैसे ही सब जीव सबको प्रिय हैं; क्योंकि आत्मा ही प्रिय है। सभी तत्व ज्ञान से सम्पन्न हैं। इसलिए विद्वान् आत्मारूप बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मज्ञान है। यह पूर्ण है। बोधस्वरूप आत्मा सत्य तथा सुखसद्भाव से उत्पन्न होने पर मुक्ति प्राप्त होती है।

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: जीव का लक्ष्य