प्रासाद-लक्षण
श्रीसूतजीने पुनः कहा—हे शौनक! अब मैं प्रासाद-निर्माण एवं उसके लक्षणोंके विषयमें कह रहा हूँ। आप सुनें। सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्को देख-रेखमें चारों दिशाओंमें चौंसठ-चौंसठ पद परिमाणका एक चतुष्कोण भूखण्ड तैयार करना चाहिये। जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण-भूमिमें दीवालका निर्माण करे। साथ ही चारों दिशाओंमें कुल बारह द्वार (बारी) बनाये जायँ।
प्रासादकी ऊँचाईके परिमाणको अर्थात् पृथ्वीतलपर प्रासादका बनाया गया कैसा जो धरातल है, उसको प्रासादिक-ज्ञेया (कुर्सी) कहते हैं। भवनकी यह जंघा मानव जंघाकी अपेक्षा ढाई गुना अधिक होनी चाहिये। उसके ऊपर निर्मित होनेवाले गर्भगृहके विस्तार-परिमाणको सुस्थापित कहते हैं। गर्भगृहको पुनः तीन अथवा पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये और शुभ्रवर्णके द्वारकी ऊँचाई शिखर भागकी आधी करनी चाहिये। चार शिखर बनाकर उसके तीसरे भागपर वेदि-बन्धन करे। उसके चतुर्थ भागपर पुनः प्रासादके कण्ठ-भागके निर्माणका विधान है। अथवा भवनका निर्माण करनेके लिये भूखण्डको समान सोलह भागोंमें विभक्त करके उस सोलहवें भागके चतुर्थ-भागमें गर्भगृहका निर्माण करवाये। बचे हुए बारह भागमें भित्ति (दीवाल)-का निर्माण करे। चतुर्भागकी ऊँचाईके अनुसार ही अन्य भित्तियोंकी ऊँचाईका परिमाण निश्चित करना चाहिये। भित्तिको ऊँचाईके मानकी अपेक्षा शिखरकी ऊँचाई दो गुनी हो। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर भागकी ऊँचाईके भागका चतुथांश होना चाहिये।
बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें चारों दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार रखें। गर्भगृहकी चतुर्दिक् भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका पाँच भाग करके उसके मध्यके पाँचवें भागमें द्वार लगाना चाहिये। ऐसा ही गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित किया है। गर्भगृहके समान ही उसके अग्रभागमें मुखमण्डप बनाना चाहिये। यह प्रासादका सामान्य लक्षण कहा गया है। अब मैं लिङ्गनिर्माणके परिमाणको कह रहा हूँ।
हे शौनक! लिङ्गके परिमाणके अनुसार उसकी पीठका निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना चारों ओर पीठका गर्भभाग हो। पीठांगके अनुसार ही उसकी भित्ति तथा उसके विस्तारके अर्धपरिमाणसे उस लिङ्गपीठका जंघा-भाग निर्मित करे।
हे शौनक! जंघा-भागके परिमाणकी अपेक्षा द्विगुणित ऊँचा शिखर होना चाहिये। पीठ और गर्भभागके मध्य जो परिमाण है, उस शुभ्रभाग अनुसार शुष्कविभाग निर्मित होता है। द्वारनिर्माणके समय पहले जैसा कहा जा चुका है, शेष कार्य वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण छः यव (जौ)-का अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छः फुट)-का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुके आठवाँ हिस्सा होता है। स्वेच्छानुसार इसका दुगुना विस्तार हो सकता है।
द्वारके सदृश पीठके मध्यभागको छिद्रयुक्त ही रखना चाहिये। पादिक, सेंधविक तथा पिङ्गपर परिमाणके अनुसार ही उसके अर्ध-अर्ध परिमाणकी दूरीपर निर्मित करे। उस गर्भागृहके विस्तारके समान ही मण्डपके जंघाभागका विस्तार करके उस जंघाभागके द्विगुणके परिमाणमें ऊँचे शिखरभागको निर्मित करे। शुकविभागकी पहलेकी ही भाँति बनाकर निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा ही बनवायें—ऐसे मण्डपनिर्माणका विधान है। इसके अतिरिक्त शेष प्रासाद-भागके स्वलक्षणको कह रहा हूँ, सुनें—
प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें श्वेत अर्थात् त्रिघटिता निर्माण करवाना चाहिये, जिसके शेषभागमें देवगण विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके मानका अवधारण करके बाह्य भागका निर्माण करे।
इस निर्माणकार्यमें प्रासादके चारों ओर एक पाद परिमाणका वेदी निर्मित या नौका निर्माण करना चाहिये। वैसे संसारमें गर्भगृहके परिमाणके अनुसार नौकाका मान उसका द्विगुण है। भित्तिकी चौड़ाईसे दो गुणा ऊँचा उसका शिखर-भाग होना चाहिये।
लक्षणों एवं स्वरूपकी भिन्नताके कारण प्रासाद अनेक प्रकारके होते हैं। यथा—वैराज, पुष्प, कैलास, मालिक (माणिक) तथा त्रिविष्टप–ये पाँच प्रकारके प्रासाद हैं। इनमें प्रथम प्रकारका वैराज नामक प्रासाद सब प्रकारसे चौकोर और समतल होता है। द्वितीय प्रकारका पुष्पक प्रासाद आयताकार होता है। तृतीय प्रकारका कैलास नामक प्रासाद वृत्ताकार, चौथा माणिक नामक प्रासाद वृत्तायत और पाँचवाँ त्रिविष्टप नामक प्रासाद अष्टकोणकार होता है। इस प्रकारसे बने हुए ये प्रासाद बड़े ही मनोहारी होते हैं। इन प्रासादोंसे ही अन्य प्रकारके प्रासादोंका स्वरूप निर्मित हुआ है।
यथा—मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स–ये नौ प्रकारके चौकोर प्रासाद वैराज नामक प्रासादकी कलासे ही उत्पन्न हुए हैं।
वलभी, गृहराज, शालगृह, मन्दिर, विमान, ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेरम–ये नौ प्रकारके पुष्पक नामक प्रासादकलासे उपम हुए हैं।
वल्लभ, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, मुकुली, उष्णीषी, शंख, कलश, गुवावृक्ष तथा हंस—ये अठारह प्रकारके कैलास प्रासादसे निकले हैं। राज, वृषभ, हंस, गरुड, सिंह, सम्मुख, भूमुख, भूधर, श्रीजय तथा पृथ्वीधर—इन प्रासादोंसे उद्भव ‘मालिक’ (माणिक) नामक वृत्तयत प्रासादसे हुआ है।
वज्र, चक्र, मुष्टिकवज्र, वक्रस्वस्तिक, खङ्ग, गदा, श्रीवृक्ष, विजय तथा श्वेत—इन नौ प्रासादोंका प्रादुर्भाव त्रिविष्टप नामक प्रासादसे हुआ है।
इसके अतिरिक्त त्रिविष्टप, पद्माकर, अर्धचन्द्रकर, चतुष्कोण तथा षोडशकोणीय प्रासाद भी मण्डपके संस्थानसे निर्मित जहाँ-तहाँ किया जा सकता है, जो क्रमशः—रम्य, ऐश्वर्य, आयुष्प्रद, पुत्रप्रद और स्त्रीप्राप्ति करनेवाले होते हैं।
मुख्याद्वारे स्थानमें ही ध्रुवा आदि तथा गर्भगृहका निर्माण करना चाहिये। द्वारके द्वारा सम संख्यक गृहिणी मण्डपका निर्माण करके उस मण्डपके चतुर्भाग अर्थात् सीमा परिमाणका एक भ्रङ्गगृह निर्मित करवाये। भ्रङ्गगृहको समानता बताया (वेधबन्धन)-से अथवा बायनसे रहित बनाना चाहिये। कहीं मण्डपकी दीवालके बराबर अथवा कहीं उससे डेढ़ गुणा ढालू मण्डप बनाये जाने चाहिये। प्रासादके लावण्यकी भूमि विषम तथा चित्र-विचित्र (रंग-बिरंगी) वर्णकी बनानी चाहिये। परिमाण-विरोध रहनेपर उसे विषम रेखाओंसे अलंकृत किया जा सकता है।
प्रासादकी आधारभूमि प्रत्येक दिशाओंमें अवस्थित चार द्वारों और चार मण्डपोंसे सुशोभित होनी चाहिये। जो प्रासाद सौ शृंगोंवाला अर्थात् सौ मीनारोंसे युक्त रहता है, उसे मेरु-संज्ञासे अभिहित किया जाता है। यह अन्य प्रासादोंकी अपेक्षा उत्तम कोटिका होता है। इस प्रकारके प्रासादमें प्रत्येक मण्डप तीन-तीन भद्रगृहोंसे अलंकृत होने चाहिये।
भद्रगृहाकृति, आकार और परिमाणके वैभिन्यके कारण वे प्रासाद भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं। जिनमें कुछ प्रासादोंका आधार होता है, किंतु कुछ आधारसे रहित होते हैं। वे प्रासाद अपने ही जातिके और रचना-पद्धतिके भेदसे भी भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं। रचना-पद्धति तथा नामके भेदसे परस्पर संवीर्यके कारण भी भिन्न-भिन्न प्रकारके प्रासाद हो जाते हैं।
देवताओंकी विशेषताके कारण बहुत प्रकारके प्रासाद बताये गये हैं। यद्यपि स्वयंभू (स्वतः प्रादुर्भूत देवमूर्ति) लिङ्गके नियमित होनेसे प्रासादके निमित्त कोई नियम नहीं है, तथापि देवोंके लिये उक्त मानके अनुसार ही उन प्रासादोंका निर्माण करवाना चाहिये, जो चतुरस्र अर्थात् चौरस भूमिपर समान चार कोणोंसे समन्वित हों। वे प्रासाद चन्द्रशालाओं (बारी)-से युक्त तथा घेरोंसहित (नींववालाओं)-से संयुक्त होने चाहिये। उनके सामनेके भागमें वाहनके लिये लघु मण्डप भी निर्मित हों।
प्रासादके द्वारदेशकी सन्निधिमें नाट्यशाला बनवानी चाहिये। प्रासादके विभिन्न दिशाओंके मुख्य द्वारोंपर अलग-अलग द्वारपाल बनाने चाहिये। उस देवप्रासादसे कुछ दूर देवालयमें रहनेवाले सेवकवर्गके लिये आवास बनवाना चाहिये।
देवप्रासादकी भूमि फल, पुष्प और जलसे परिपूर्ण होनी चाहिये। ऐसे प्रासादोंमें देवप्रासादकी स्वादिष्ट करके उनको अर्ध्यादिके विविध प्रकारके उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। वासुदेव तो सर्वमय हैं, उनके भवनका निर्माण करनेवाला व्यक्ति सभी फलोंको प्राप्त करता है।
श्रीसूतजीने पुनः कहा—हे शौनक! अब मैं प्रासाद-निर्माण एवं उसके लक्षणोंके विषयमें कह रहा हूँ। आप सुनें। सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्को देख-रेखमें चारों दिशाओंमें चौंसठ-चौंसठ पद परिमाणका एक चतुष्कोण भूखण्ड तैयार करना चाहिये। जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण-भूमिमें दीवालका निर्माण करे। साथ ही चारों दिशाओंमें कुल बारह द्वार (बारी) बनाये जायँ।
प्रासादकी ऊँचाईके परिमाणको अर्थात् पृथ्वीतलपर प्रासादका बनाया गया कैसा जो धरातल है, उसको प्रासादिक-ज्ञेया (कुर्सी) कहते हैं। भवनकी यह जंघा मानव जंघाकी अपेक्षा ढाई गुना अधिक होनी चाहिये। उसके ऊपर निर्मित होनेवाले गर्भगृहके विस्तार-परिमाणको सुस्थापित कहते हैं। गर्भगृहको पुनः तीन अथवा पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये और शुभ्रवर्णके द्वारकी ऊँचाई शिखर भागकी आधी करनी चाहिये। चार शिखर बनाकर उसके तीसरे भागपर वेदि-बन्धन करे। उसके चतुर्थ भागपर पुनः प्रासादके कण्ठ-भागके निर्माणका विधान है। अथवा भवनका निर्माण करनेके लिये भूखण्डको समान सोलह भागोंमें विभक्त करके उस सोलहवें भागके चतुर्थ-भागमें गर्भगृहका निर्माण करवाये। बचे हुए बारह भागमें भित्ति (दीवाल)-का निर्माण करे। चतुर्भागकी ऊँचाईके अनुसार ही अन्य भित्तियोंकी ऊँचाईका परिमाण निश्चित करना चाहिये। भित्तिको ऊँचाईके मानकी अपेक्षा शिखरकी ऊँचाई दो गुनी हो। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर भागकी ऊँचाईके भागका चतुथांश होना चाहिये।
बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें चारों दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार रखें। गर्भगृहकी चतुर्दिक् भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका पाँच भाग करके उसके मध्यके पाँचवें भागमें द्वार लगाना चाहिये। ऐसा ही गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित किया है। गर्भगृहके समान ही उसके अग्रभागमें मुखमण्डप बनाना चाहिये। यह प्रासादका सामान्य लक्षण कहा गया है। अब मैं लिङ्गनिर्माणके परिमाणको कह रहा हूँ।
हे शौनक! लिङ्गके परिमाणके अनुसार उसकी पीठका निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना चारों ओर पीठका गर्भभाग हो। पीठांगके अनुसार ही उसकी भित्ति तथा उसके विस्तारके अर्धपरिमाणसे उस लिङ्गपीठका जंघा-भाग निर्मित करे।
हे शौनक! जंघा-भागके परिमाणकी अपेक्षा द्विगुणित ऊँचा शिखर होना चाहिये। पीठ और गर्भभागके मध्य जो परिमाण है, उस शुभ्रभाग अनुसार शुष्कविभाग निर्मित होता है। द्वारनिर्माणके समय पहले जैसा कहा जा चुका है, शेष कार्य वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण छः यव (जौ)-का अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छः फुट)-का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुके आठवाँ हिस्सा होता है। स्वेच्छानुसार इसका दुगुना विस्तार हो सकता है।
द्वारके सदृश पीठके मध्यभागको छिद्रयुक्त ही रखना चाहिये। पादिक, सेंधविक तथा पिङ्गपर परिमाणके अनुसार ही उसके अर्ध-अर्ध परिमाणकी दूरीपर निर्मित करे। उस गर्भागृहके विस्तारके समान ही मण्डपके जंघाभागका विस्तार करके उस जंघाभागके द्विगुणके परिमाणमें ऊँचे शिखरभागको निर्मित करे। शुकविभागकी पहलेकी ही भाँति बनाकर निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा ही बनवायें—ऐसे मण्डपनिर्माणका विधान है। इसके अतिरिक्त शेष प्रासाद-भागके स्वलक्षणको कह रहा हूँ, सुनें—
प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें श्वेत अर्थात् त्रिघटिता निर्माण करवाना चाहिये, जिसके शेषभागमें देवगण विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके मानका अवधारण करके बाह्य भागका निर्माण करे।
इस निर्माणकार्यमें प्रासादके चारों ओर एक पाद परिमाणका वेदी निर्मित या नौका निर्माण करना चाहिये। वैसे संसारमें गर्भगृहके परिमाणके अनुसार नौकाका मान उसका द्विगुण है। भित्तिकी चौड़ाईसे दो गुणा ऊँचा उसका शिखर-भाग होना चाहिये।
लक्षणों एवं स्वरूपकी भिन्नताके कारण प्रासाद अनेक प्रकारके होते हैं। यथा—वैराज, पुष्प, कैलास, मालिक (माणिक) तथा त्रिविष्टप–ये पाँच प्रकारके प्रासाद हैं। इनमें प्रथम प्रकारका वैराज नामक प्रासाद सब प्रकारसे चौकोर और समतल होता है। द्वितीय प्रकारका पुष्पक प्रासाद आयताकार होता है। तृतीय प्रकारका कैलास नामक प्रासाद वृत्ताकार, चौथा माणिक नामक प्रासाद वृत्तायत और पाँचवाँ त्रिविष्टप नामक प्रासाद अष्टकोणकार होता है। इस प्रकारसे बने हुए ये प्रासाद बड़े ही मनोहारी होते हैं। इन प्रासादोंसे ही अन्य प्रकारके प्रासादोंका स्वरूप निर्मित हुआ है।
यथा—मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स–ये नौ प्रकारके चौकोर प्रासाद वैराज नामक प्रासादकी कलासे ही उत्पन्न हुए हैं।
वलभी, गृहराज, शालगृह, मन्दिर, विमान, ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेरम–ये नौ प्रकारके पुष्पक नामक प्रासादकलासे उपम हुए हैं।
वल्लभ, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, मुकुली, उष्णीषी, शंख, कलश, गुवावृक्ष तथा हंस—ये अठारह प्रकारके कैलास प्रासादसे निकले हैं। राज, वृषभ, हंस, गरुड, सिंह, सम्मुख, भूमुख, भूधर, श्रीजय तथा पृथ्वीधर—इन प्रासादोंसे उद्भव ‘मालिक’ (माणिक) नामक वृत्तयत प्रासादसे हुआ है।
वज्र, चक्र, मुष्टिकवज्र, वक्रस्वस्तिक, खङ्ग, गदा, श्रीवृक्ष, विजय तथा श्वेत—इन नौ प्रासादोंका प्रादुर्भाव त्रिविष्टप नामक प्रासादसे हुआ है।
इसके अतिरिक्त त्रिविष्टप, पद्माकर, अर्धचन्द्रकर, चतुष्कोण तथा षोडशकोणीय प्रासाद भी मण्डपके संस्थानसे निर्मित जहाँ-तहाँ किया जा सकता है, जो क्रमशः—रम्य, ऐश्वर्य, आयुष्प्रद, पुत्रप्रद और स्त्रीप्राप्ति करनेवाले होते हैं।
मुख्याद्वारे स्थानमें ही ध्रुवा आदि तथा गर्भगृहका निर्माण करना चाहिये। द्वारके द्वारा सम संख्यक गृहिणी मण्डपका निर्माण करके उस मण्डपके चतुर्भाग अर्थात् सीमा परिमाणका एक भ्रङ्गगृह निर्मित करवाये। भ्रङ्गगृहको समानता बताया (वेधबन्धन)-से अथवा बायनसे रहित बनाना चाहिये। कहीं मण्डपकी दीवालके बराबर अथवा कहीं उससे डेढ़ गुणा ढालू मण्डप बनाये जाने चाहिये। प्रासादके लावण्यकी भूमि विषम तथा चित्र-विचित्र (रंग-बिरंगी) वर्णकी बनानी चाहिये। परिमाण-विरोध रहनेपर उसे विषम रेखाओंसे अलंकृत किया जा सकता है।
प्रासादकी आधारभूमि प्रत्येक दिशाओंमें अवस्थित चार द्वारों और चार मण्डपोंसे सुशोभित होनी चाहिये। जो प्रासाद सौ शृंगोंवाला अर्थात् सौ मीनारोंसे युक्त रहता है, उसे मेरु-संज्ञासे अभिहित किया जाता है। यह अन्य प्रासादोंकी अपेक्षा उत्तम कोटिका होता है। इस प्रकारके प्रासादमें प्रत्येक मण्डप तीन-तीन भद्रगृहोंसे अलंकृत होने चाहिये।
भद्रगृहाकृति, आकार और परिमाणके वैभिन्यके कारण वे प्रासाद भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं। जिनमें कुछ प्रासादोंका आधार होता है, किंतु कुछ आधारसे रहित होते हैं। वे प्रासाद अपने ही जातिके और रचना-पद्धतिके भेदसे भी भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं। रचना-पद्धति तथा नामके भेदसे परस्पर संवीर्यके कारण भी भिन्न-भिन्न प्रकारके प्रासाद हो जाते हैं।
देवताओंकी विशेषताके कारण बहुत प्रकारके प्रासाद बताये गये हैं। यद्यपि स्वयंभू (स्वतः प्रादुर्भूत देवमूर्ति) लिङ्गके नियमित होनेसे प्रासादके निमित्त कोई नियम नहीं है, तथापि देवोंके लिये उक्त मानके अनुसार ही उन प्रासादोंका निर्माण करवाना चाहिये, जो चतुरस्र अर्थात् चौरस भूमिपर समान चार कोणोंसे समन्वित हों। वे प्रासाद चन्द्रशालाओं (बारी)-से युक्त तथा घेरोंसहित (नींववालाओं)-से संयुक्त होने चाहिये। उनके सामनेके भागमें वाहनके लिये लघु मण्डप भी निर्मित हों।
प्रासादके द्वारदेशकी सन्निधिमें नाट्यशाला बनवानी चाहिये। प्रासादके विभिन्न दिशाओंके मुख्य द्वारोंपर अलग-अलग द्वारपाल बनाने चाहिये। उस देवप्रासादसे कुछ दूर देवालयमें रहनेवाले सेवकवर्गके लिये आवास बनवाना चाहिये।
देवप्रासादकी भूमि फल, पुष्प और जलसे परिपूर्ण होनी चाहिये। ऐसे प्रासादोंमें देवप्रासादकी स्वादिष्ट करके उनको अर्ध्यादिके विविध प्रकारके उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। वासुदेव तो सर्वमय हैं, उनके भवनका निर्माण करनेवाला व्यक्ति सभी फलोंको प्राप्त करता है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: वास्तु एवं गृहनिर्माण