प्रायश्चित्त-निरूपण

ब्रह्माजी ने कहा—हे ब्राह्मणो! अब मैं प्रायश्चित्त-विधि को भली प्रकार कह रहा हूँ—

ब्राह्मण की हत्या करने वाला ब्रह्महत्यारा, मदिरा-पान करने से विरत मद्यपी, चोरी करने वाला स्तेयी तथा गुरु की पत्नी के साथ गमन करने वाला गुरुतल्पगामी (गुरुपत्नीगामी)—ये चार महापातकी हैं। इन सभी का संसर्ग (साथ) करने वाला पाँचवाँ महापातकी है। गोहत्यादि जो अन्य पाप होते हैं—वे उपपातक हैं, ऐसा देवनाओं का कहना है।

जिससे ब्रह्महत्या की है, उसने स्वयं पर्णकुटी बनाकर उसमें उपवास करते हुए बारह वर्षों तक रहना चाहिये अथवा पर्वत के उस ऊँचे भाग से गिरकर अपने प्राणों का परित्याग करना चाहिये, जिस भाग से गिरने पर प्राणियों का नाश हो जाता है। इससे ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है। वेदेविद् ब्राह्मण को सर्वस्व दान करने से ब्रह्महत्या जनित पाप का नाश हो जाता है। सरस्वती, गङ्गा तथा यमुना—इन नदियों के पवित्र संगम पर तीन रात्रियों तक उपवास रह करके प्रतिदिन तीनों कालों में स्नान करके भी द्विज ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। सेतुबन्ध-रामेश्वरम् (कालमेघवन तीर्थ या वाराणसी के पवित्र तीर्थ)-में स्नान करके ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति हो जाती है।

मद्यपी द्विज अग्निवर्ण के सदृश (अन्तःकरण को जला देने वाली) खौलती हुई मदिरा अथवा दुग्ध, घृत या गोमूत्र का पान करके तत्जनित पाप से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। सुवर्ण की चोरी करने वाला राजाओं के द्वारा दण्डस्वरूप मुसल से पनमृक्त हो जाता है अथवा जीर्ण-शीर्ण वस्त्र धारण करके वन में ब्रह्मनाशक प्रायश्चित्त-व्रत को करने से वायमुक्त हो जाता है।

काम से मोहित ब्राह्मण यदि अपने गुरु की पत्नी के पास जाता है तो इसे इस गुरुपत्नीगमन रूप पाप से मुक्त होने के लिये जलती हुई—तपती हुई लौह-निर्मित स्त्री का सवाङ्ग आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिये जो व्रत विहित है, उस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिये। चार या पाँच चान्द्रायण व्रत करने से गुरुपत्नीगमन जनित पाप से मुक्ति हो सकती है।

जो द्विज पतिजनों का संसर्ग करता है, उसे विभिन्न संसर्ग से होने वाले पापों को दूर करने के लिये उन-उन पापों के निमित्त कहे गये व्रतों का पालन करना चाहिये।

अथवा वह आत्यन्तरे रहित होकर एक संवत्सर पर्यन्त तप्तकृच्छ्रव्रत का अनुष्ठान करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापों को दूर करने वाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायण व्रत तथा अतिकृच्छ्रव्रत भी सभी पापों को दूर करने वाला होता है।

अथवा वह आत्यन्तरे रहित होकर एक संवत्सर पर्यन्त तप्तकृच्छ्रव्रत का अनुष्ठान करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापों को दूर करने वाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायण व्रत तथा अतिकृच्छ्रव्रत भी सभी पापों को दूर करने वाला होता है।

अथवा वह आत्यन्तरे रहित होकर एक संवत्सर पर्यन्त तप्तकृच्छ्रव्रत का अनुष्ठान करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापों को दूर करने वाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायण व्रत तथा अतिकृच्छ्रव्रत भी सभी पापों को दूर करने वाला होता है।

जो मनुष्य कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि में उपवास रखकर सत्य पावन पवित्र नदी में स्नान करके ॐकार से युक्त यम, धर्मराज, मृत्यु, अनन्त, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतक्षय—इन नामों का उच्चारण कर के तिल से संयुक्त सात जलाञ्जलियों से तर्पण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

इन व्रतों के पालन करते समय शान्त रहकर तथा मन का निग्रह कर, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भूमि पर सोना चाहिये और उपवास रखकर ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिये। (कायिक) सुवर्ण की पत्नी तिथि में उपवास रखकर सयामी तिथि को सूर्यदेव की पूजा करने से भी सभी प्रकार के पापों से मुक्ति हो जाती है।

शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में निराहार रहकर जो द्वादशी तिथि में भगवान् विष्णु की पूजा करता है, वह समस्त महापापों से मुक्त हो जाता है। सूर्य-चन्द्र-ग्रहण आदि समयों में मन्त्रका जप, तपस्या, तीर्थसेवन, देवर्चन तथा ब्राह्मण-पूजन—ये सभी कृत्य भी महापातकों को नष्ट करने वाले होते हैं। समस्त पापों से युक्त मनुष्य भी पुण्य-तीर्थों में जाकर नियम पूर्वक अपने प्राणों का परित्याग कर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

पतिव्रता नारी पति के देवसान के बाद पति का वियोग होने के कारण पति-धर्म के अनुसार पति के शरीर के साथ शास्त्रीय विधि का पालन करते हुए अग्नि में प्रवेश करती है तो वह ब्रह्महत्या, कृतघ्नता आदि बड़े-बड़े पातकों से दूषित भी अपने पति का उद्धार कर देती है।

जो स्त्री पतिव्रता है, अपने पति की सेवा-शुश्रूषा में दत्तचित्त रहती है, उसको इस लोक तथा परलोक में कोई पाप नहीं लगता। वह वैसे ही निर्दोष रहती है, जैसे दहरपर श्री राम की पत्नी जगद्विख्यात भगवती सीता देवी सङ्कट में रहकर भी निर्दोष रही तथा (अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से) उसने राक्षसराज रावण पर विजय प्राप्त की।

संशय रहित हो कर विविध शास्त्रीय व्रतों का अनुष्ठान करने वाले। भगवान् विष्णु ने मुझे बहुत पहले ही यह बताया था कि गङ्गा में स्थित पप्लु (नदी) आदि तीर्थों में यथाविधि श्रद्धा पूर्वक स्नान करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है और समस्त सदाचार का फल भी प्राप्त करता है। (अध्याय ५२)

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: नित्य कर्म