सन्ध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण

ब्रह्माजी ने कहा—जो मनुष्य प्रतिदिन शास्त्रविहित क्रियाओं का करता है, उसको दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। अतः ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर मनुष्य को धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिये।

उषःकाल होने पर विष्णु के सर्वाधिक सर्व प्रथम अपने इष्टदेव का चिन्तन करके सर्वप्रथम आनन्दन, अजर, अमर, सनातन इन्द्रियदमन विराजमान आनन्दन, अजर, अमर, सनातन रूप में एवं ईश्वरसम्बन्धी परम आनन्द के रूप में प्रसिद्ध हैं। सोकर देहेन्द्रियों को स्थिर करना कुम्भक और उस वायु को धीरे-धीरे बाहर निकालना रेचक नाम से कहा जाता है।

बाह्य नासाग्रों वाला प्राणायाम ‘लघु’ है। चौबीस मात्रा का प्राणायाम ‘मध्यम’ तथा छत्तीस मात्रा वाला प्राणायाम ‘उत्तम’ है। अपने-अपने विषयों से असम्बद्ध इन्द्रियों के द्वारा चित्त के स्वरूप मात्र का अनुकरण करना एक विशेष प्रकार का निरोध और इस निरोध को प्रत्याहार कहते हैं। ब्रह्म का चिन्तन करना (ब्रह्मकाखण्ड का अखण्ड प्रवाह) ध्यान है। उस काल में मन के द्वारा पीठ का अवलम्बन करना (धैर्य से चित्त को निश्चल रूप में स्थिति) धारणा है।

‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार अपने ज्ञान के साथ ब्रह्म रूप में अवस्थित ही समाधि है। मैं आत्मा ही परमात्मा—परब्रह्म हूँ। वह परब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानरूप और अनन्त है। वही ब्रह्म है। उसी को विद्वान् कहते हैं। वही आनन्दस्वरूप है। उसका ‘तत्त्वमसि’ इस श्रुति से बोध कराया गया है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’, मैं अशरीरी, इन्द्रियातीत हूँ, मन, बुद्धि, महत्त्तत्त्व, अहङ्कारादि से रहित, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं से युक्त जो ब्रह्म का तेजःस्वरूप है, मैं वही रूप हूँ। नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय कहा जाने वाला जो वह आदित्य पुरुष है, वही मैं पूर्ण पुरुष हूँ।’ इस प्रकार ब्रह्म का ध्यान करता हुआ ब्राह्मण ब्रह्मबन्ध से मुक्त हो जाता है। (अध्याय ४९)


श्रीहरि ने कहा—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। प्राणियों की हिंसा न करना अहिंसा है। प्रामाणिक हित में बोलना सत्य है। दूसरे की वस्तु अपहरण न करना अस्तेय है। मैथुन का परित्याग करना ब्रह्मचर्य है और सब कुछ त्याग देना अपरिग्रह है।

शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा प्रणिधान—ये पाँच नियम हैं। बाह्य और आभ्यन्तर रूप से शौच दो भेद का है। इस प्रकार संतोष की वृत्ति, इन्द्रिय-निग्रह रूपी तप, मन्त्र-जप को स्वाध्याय और भगवत्पूजा को प्रणिधान कहते हैं।

साधक के द्वारा पद्मादि प्रकार से स्थिर होना आसन कहा जाता है। वायु का निरोध करना प्राणायाम है। यह दो प्रकार का होता है। मन्त्रोच्चार करते हुए देव का ध्यान करना सगर्भ-प्राणायाम है। उसके विपरीत (अमन्त्रक, प्राणायाम) अगर्भ-प्राणायाम है। यह दो प्रकार का प्राणायाम प्रपूरक नाम से तीन प्रकार का कहा गया है। यथा—वायु अंदर खींचकर अवस्थित होना पूरक मानक प्राणायाम है।


ब्रह्माजी ने कहा—मनुष्य को चाहिये कि वह स्नान करके संध्या-वन्दनादि प्राथमिक कृत्य करने चाहिये (बिना प्रातःकाल-स्नान-कृत्य किये संध्या-वन्दनादि करना उचित नहीं है)।

प्रातःस्नान करने से अलक्ष्मी, कालकर्णी अर्थात् विघ्न डालने वाली अनिष्टकारी शक्तियाँ, दुःस्वप्न एवं दुविचार से होने वाले पाप धुल जाते हैं, इसमें संशय नहीं। यह स्मरणीय है कि बिना स्नान किये गये कार्य प्रशस्त नहीं होते। अतएव होम और जपादिक्के कार्य में विशेष रूप से सबसे पहले विधिवत् स्नान करना चाहिये।

अरुण होने पर बिना सिर पर जल डाले ही स्नान कर लेता है। आई वस्त्र से भी शरीर को पोंछा जा सकता है। इसको कायिक स्नान कहते हैं।

ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और यौगिक-ये छः प्रकार के स्नान हैं, यथाधिकार मनुष्य को स्नान करना चाहिये। मन्त्रों सहित कुश के द्वारा जल-बिन्दुओं से मार्जन करना ब्राह्म-स्नान है। सिर से लेकर पैर तक यथाविधि भस्म के द्वारा अङ्गों का लेपन आग्नेय-स्नान है। गोधूलि से शरीर को पवित्र करना वायव्य-स्नान कहा गया है। यह उस उत्तम स्नान माना जाता है। धूप के साथ होने वाली वृष्टि में किये गये स्नान को दिव्य-स्नान कहते हैं। जल में अवगाहन करना वारुण-स्नान है। योग द्वारा हरि का चिन्तन यौगिक स्नान है। इसको मानस-आत्मवेदन (ब्रह्म का अखण्ड चिन्तन) कहते हैं। यह स्नान ब्रह्मवादिओं के द्वारा सेवित है, इसे ही आत्यन्तिक भी कहते हैं।

(स्नान के पूर्व) दुग्धधारी वृक्षों से उत्पन्न काष्ठ, मालती, अपामार्ग, बिल्व अथवा कुशों से अर्थात् कनेर की दातौन लेकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर पवित्र स्थान में बैठकर दाँतों को स्वच्छ करना चाहिये और उसे धोकर पवित्र स्थान में त्याग करना चाहिये।

तदनन्तर स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितृगणों का विधिवत् तर्पण करना चाहिये। यहाँ यथास्थान स्नान का अभ्युक्त आचमन एवं संध्योपासन के अभ्युक्त आचमन का विधान है। संध्योपासन के अङ्गरूप में ही कुशोदक बिन्दुओं के ‘आपो हि ष्ठा०’ आदि वाक्यमन्त्र एवं यथाविधान सावित्रीमन्त्र के द्वारा मार्जन करना विहित है। इसी क्रम में ॐकार और ‘भूः भुवः स्वः’ इन व्याहृतियों से युक्त वेदमाता गायत्री का जप करके अर्ध्यपात्र में भगवान् सूर्य के प्रति जलाञ्जलि समर्पित करे (सूर्यार्घ्य प्रदान करे)।

इसी क्रम में पूर्व की ओर अग्रभाग वाले कुशों के आसन पर समाहितचित्त बैठकर प्राणायाम करके संध्या-ध्यान करने का श्रुति में विधान है। यह संध्या है, वही जगत् की सृष्टि करने वाली है, माया से परे है, निष्कला, ईश्वरी, केवला शक्ति तथा तीन तत्त्वों से समुद्भूत है। अतः अधिकारी व्यक्ति (प्रातःकाल) रक्तवर्ण, (मध्याह्नकाल) शुक्लवर्ण एवं (सायंकाल) कृष्णवर्ण गायत्री का ध्यान करके गायत्री-मन्त्र का जप करे।

द्विज को सदैव पूर्वाभिमुख होकर संध्योपासन करना चाहिये। संध्या-कृत्य से रहित ब्राह्मण सदा अपवित्र रहता है, वह सभी कार्य के लिये अयोग्य होता है। वह जो भी अन्य कोई कार्य करता है, उसका कुछ भी फल उसे प्राप्त नहीं होता। अतएव पवित्र होकर वेदपारङ्गत ब्राह्मणों ने विधिवत् संध्योपासन करके अपने पूर्वजों से द्वारा प्राप्त उत्तम शान्ति को प्राप्त किया है। संध्योपासन का त्यागकर जो द्विजोत्तम अन्य किसी धर्म-कार्य के लिये प्रवृत्त करता है, उसे इस हजार योनियों तक नरक भोग करना पड़ता है। अतः सभी प्रकार का प्रयत्न करके संध्योपासन अवश्य करना चाहिये।

उस संध्योपासन कर्म के योग में परमात्मा भगवान् नारायण पूजित हो जाते हैं। अतः अधिकारी को चाहिये कि वह पवित्र होकर पूर्वाभिमुख बैठ करके नित्य संयत-भाव से एक सहस्र या एक सौ अथवा दस बार गायत्री का उपासन करे।


एकाग्रचित्त होकर उदय होते हुए भगवान् भास्कर का उपस्थान करे। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के आये हुए विविध सौर मन्त्रों से देवाधिदेव महयोगेश्वर भगवान् दिवाकर का उपस्थान करे और मन्त्रों से देवपति भास्कर देखकर इस मन्त्र से प्रणाम करे—

ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे॥त्वमेव ब्रह्म परममपि ज्योती रसोऽमृतम्।भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनाततः॥ (५०।२८-३०)

शान्तस्वरूप भगवान् भास्कर आप सृष्टि, स्थिति और संहार—इन तीनों कारणों के कारण हैं, आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको आत्मनिवेदन करता हूँ, आप ही परब्रह्म हैं, आप ही ज्योतिःस्वरूप, अप्-स्वरूप, रस रूप तथा अमृतरूप एवं आप ही ‘भूः, भुवः, स्वः’—ये तीनों आप ही हैं और आप ही ॐकाररूप, सर्वस्वरूप रुद्र तथा अविनाशी हैं, आपको नमस्कार है।

इस उत्तम आदित्य हृदय-स्तोत्र का जप करके भगवान् दिवाकर को प्रातः और मध्याह्न (तथा सायंकाल)-में नमस्कार करना चाहिये।

इसके पश्चात् घर पर आ करके ब्राह्मण पुनः विधिवत् आचमन करे।

तदनन्तर उसे अग्नि के प्रज्वलित करके विधिवत् भगवान् अग्निदेव की आहुति प्रदान करनी चाहिये। मुख्य अधिकारी की अशक्त्यावस्था में उनकी आज्ञा प्राप्त करके ऋत्विक् पुत्र अथवा पत्नी, शिष्य या सहोदर भ्राता भी हवन करे। मन्त्रहीन एवं विधिकी उपेक्षा करके किया गया कोई भी कर्म इस लोक या परलोक में फल देने वाला नहीं होता।

तदनन्तर देवताओं को नमस्कार करके (अर्घ्य, पाद्य, चन्दन, सुगन्धित पदार्थों का अनुलेपन, वस्त्र तथा नैवेद्यादि) पूजा के उपचारों से निदनकर गुरु का पूजन करे और उनके हित-साधन में लग जाय। तत्पश्चात् पुत्रकलत्रों को और उनके हित-साधन में लग जाय। तत्पश्चात् पुत्रकलत्रों को दिक्पालों को वेदो व्यास करना चाहिये और उसके बाद इष्ट मन्त्रों का जप (वेदपरायण) करके सिद्धियों के अध्ययन-कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये। वह स्त्रियों के वेदार्थ धारण करने और दम्भहीन होकर वेदार्थ का विचार करे। द्विजोत्तम धर्मशास्त्र आदि विविध शास्त्रों का अवलोकन करे और वेदादि निगमागमों (उपनिषदों) तथा छान्दोग्यादि वेदाङ्गों की अच्छी प्रकार अवलोकन करे। इसके बाद वह पुनः योग-शेष के लिये राजा या श्रीमन के पास जाय और अपने परिवार के लिये विविध प्रकार के अन्नार्थ उपार्जन करे।

इसके पश्चात् मनुष्य को चाहिये कि उसने शुद्ध मिट्टी, पुष्प, अक्षत, तिल, कुश और गोमय (गाय के गोबर) आदि पदार्थों को एकत्र करना चाहिये। उसके बाद नदी, देव, पोखर, तड़ाग या सरोवर में जाकर स्नान करे। प्रत्येक दिन तड़ाग, सरोवर या नदी आदि से पाँच मृतिकापिण्ड बिना निकाले स्नान करना दोषयुक्त होता है। (अतः पाँच पिण्ड मिट्टी निकाल करके ही स्नान करना चाहिये)। स्नान के समय (स्नान से लांघी गयी) मिट्टी के एक भाग से सिर धोना चाहिये, दूसरे भाग से नाभि के ऊपरी भाग को और तीसरे भाग से नाभि के नीचे के भाग तथा मुख शुद्धि के छठे भाग से पैरों का प्रक्षालन करना चाहिये। इन मृतिकापिण्डों को परिमाण में एक हुए आँवले के फल के समान होना चाहिये। मृतिका के समान ही गोमय स्नान भी होना चाहिये। तदनन्तर शरीर के अङ्गों को विधिवत् धोकर आचमन करके स्नान करना चाहिये।

जलाशन के तीर पर ही ध्रुव को, गोमय आदि का अपने अङ्गों में लेपन करना चाहिये और इस लेपन के अङ्गभूत स्नान के अनन्तर पुनः वारुण (वरुणदेवता के)-मन्त्रों से जल शुद्ध करके जल में भगवान् विष्णु का ही रूप है। यह स्नान की प्रक्रिया जल के भगवान् विष्णु का ही रूप है। यह स्नान की प्रक्रिया प्रज्वस्त भाग पर सूर्य का दर्दानकर जलाशय में तीन बार निमज्जन (डुबकी लगाना)-से पूरी होती है। तदनन्तर स्नानाङ्ग आचमन करके नीचे लिखे मन्त्र से आचमन करे—

अनाहृतये भूतेषु गुणेषु विशेषतः।त्वं यवस्त्वं बह्वकार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ (५०।४९-५०)

हे जलदेव! आप समस्त प्राणियों के अन्तःकरण रूपी गुहा में विचरण करते हैं। आप सर्वत्र मुख वाले हैं। आप तेज हैं। आप ही षड्रकार हैं। आप ही ज्योतिःस्वरूप तेज और आप ही अमृतमय रसस्वरूप हैं।


तर्पण अस्त और जल के साथ करना चाहिये। पितृगणों, देवों और मुनियों के लिये अपने शास्त्र सूत्र के विधान से भक्ति पूर्वक तर्पण करे। तर्पण जलाञ्जलियों के द्वारा करे। देवताओं का तर्पण यथोवीती अर्थात् सव्य होकर देवतीर्थ से करे और निवीती होकर (कण्ठ में यज्ञोपवीत कर) ऋषियों का ऋषि तीर्थ से तथा प्राचीन वीती अर्थात् अपसव्य होकर पितृ तीर्थ से पितरों का तर्पण करे।

तदनन्तर हे हर! स्वनर्म प्रयुक्त वस्त्र को निचोड़कर मौन होकर आचमन करके मन से पुष्प, पत्र तथा जल से ब्रह्मा, शिव, सूर्य एवं मधुसूदन विष्णु देव का पूजन करे। क्रोधा रहित होकर भक्ति पूर्वक अन्य अभीष्ट देवों की भी पूजा करनी चाहिये। ‘पुरुषसूक्त’ के द्वारा पूजा समर्पित करे। जल सर्वमय देव है अर्थात् समस्त देवता जल में व्याप्त रहते हैं। अतः उस जल स्नान से भी सभी देवता पूजित होते हैं। इन पूजा में पूर्वजों की समाप्ति सहित तथा प्रणव के साथ देवताओं का ध्यान करना चाहिये। उसके बाद प्रणाम करते हुए समस्त देवों को पुष्प-पत्र पूर्वक पूजा समर्पित करे।

देवताओं की आराधना के बिना कोई भी वैदिक कर्म पुण्यप्रद नहीं होता है। अतएव समस्त कार्यों के आदि, मध्य और अन्त में हृदय में भगवान् हरि के ध्यान करना चाहिये। ‘ॐ तत्पुरुषेति०’ मन्त्र तथा पुरुषसूक्त के मन्त्रों का जप करते हुए निर्मल विष्णु के परम तेज के सामने आत्मनिवेदन करे अर्थात् शरणागत हो जाय।

उसके बाद विष्णु में अनुरक्तचित्त, शान्तात्म भाव यह भक्त ‘तद्विष्णोः’ इस मन्त्र से और ‘अग्नेतेजस्वि०’ इस मन्त्र से अभिमन्त्रित पुष्प मात्र विसर्जन होकर पुनः पूजा करके देवयक्ष, भूतयक्ष, पितृयक्ष, मानुषयक्ष और ब्रह्मयक्ष नामक पञ्चयज्ञों को करे। तर्पण से पूर्व ब्रह्मयज्ञ श्रेष्ठ हो सकता है? अतः मनुष्य यज्ञ करके स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये।

वैश्वदेव ही देवयज्ञ है। काक आदि प्राणियों के लिये जो बलि प्रदान की जाती है, वह भूतयज्ञ है। हे द्विजोत्तम! चाण्डाल एवं पतित आदि को घर के बाहर अन्न देना चाहिये और कुत्ता आदि पशुओं तथा पक्षियों को घर के बाहर भूमि पर अन्न देना चाहिये। पितरों के उद्देश्य से प्रतिदिन एक ब्राह्मण को भोजन कराये। पितरों के निमित्त जो नित्य श्राद्ध प्रदान किया जाता है, उसी को पितृयज्ञ कहते हैं। यह उत्तम गति है।


अश्रुवा समाहितचित्त होकर यथाशक्ति कुछ कच्चा अन्न निकालकर वैदिक तत्त्ववेत्ता विद्वान् ब्राह्मण को प्रदान करे। प्रतिदिन अतिथि-सत्कार करना चाहिये। घर पर आये हुए स्वमनोहर द्विज (ब्राह्मण)-को मन, और वचन से स्नान पूर्वक नमस्कार करे तथा उनका अर्चन करे।

एक ग्रास परिमाण मात्र अन्न को ‘मिक्षा’ कहा गया है। उस का जो चार गुना अन्न है उसको ‘पुष्कल’ तथा उस पुष्कल के चार गुना अन्न को ‘हनकार भिक्षा’ कहते हैं।

गोदोह मात्र काल तक अतिथि के आगमन की प्रतीक्षा स्वयं करनी चाहिये। आये हुए अभ्यागत (अतिथि)-का सत्कार यथाशक्ति करना चाहिये।

ब्रह्मचारी भिक्षु को विधिवत् भिक्षा देनी चाहिये। लोभ से रहित होकर याचकों को अन्न प्रदान करे। तत्पश्चात् अपने बन्धुजनों के साथ मौन होकर अन्न की निन्दा न करते हुए भोजन करे।

हे द्विजश्रेष्ठ! जो देव यज्ञादि पञ्चयज्ञों को बिना किये भोजन करते हैं, वे मृङ्गाला विरिञ्च-योनि (पक्षी योनि)-में जाते हैं। यथाशक्ति प्रतिदिन किये जाने वाले वेदाभ्यास से षडाङ्गवेदमन्त्र एवं देवतार्चन शीघ्र ही सभी पापों को नष्ट कर देते हैं। जो मोक्ष का अथवा आत्म सत्य के कारण बिना देवर्चन के ही रहते हैं, नाना प्रकार के कष्टदायक नरकों में जाकर सूकर की योनि में जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

अब मैं अशौच का सम्यक् प्रकार से वर्णन करता हूँ। जो अपवित्र है, वह सदा पातकी है। अपवित्र व्यक्ति के संसर्ग से अशौच होता है और उनके संसर्ग का परित्याग कर देने से शरीर पवित्र हो जाता है। हे द्विजोत्तम! सभी विद्वान् ब्राह्मण दस दिन का अशौच मानते हैं। यह अशौच मृत्यु अथवा जन्म दोनों में होता है। दस दिन के पूर्व की अशौच में मृत्यु होने पर सद्यः स्नान करने से अशौच की निवृत्ति हो जाती है। उसके बाद चूड़ा (मुण्डन)-संस्कार पर्यन्त बालक की मृत्यु होने पर एक रात्रिका अशौच होता है।

उपनयन-संस्कार के पूर्व तक बालक की मृत्यु होने पर तीन रात्रियों का अशौच होता है। उपनयन-संस्कार के बाद किसी का मरण होने पर यथाविधान दस रात्रिका अशौच ब्राह्मणों को होता है।

क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पंद्रह दिनों में तथा शूद्र एक मास में शुद्ध होता है। क्योंकि इन को यथाक्षम बारह दिन का, पंद्रह दिन का एवं एक मास का अशौच होता है। संन्यासियों को अशौच नहीं लगता है। गर्भ स्राव होने पर गर्भ मास के अनुसार जितने मास का गर्भ हो, उतनी रात्रिका अशौच होता है। (अर्थात् एक मास का गर्भस्राव होने पर एक रात्रि, दो मास का गर्भस्राव होने पर दो रात्रिका अशौच होता है। इसी क्रम में नौ मास की गणना करके अशौच में रात्रीयोपिका निश्चय करना चाहिये)। (अध्याय ५०)

ज्ञान विवरण

पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण

विषय: नित्य कर्म