श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजनविधि
श्रीधर-पूजनविधि
श्रीसूतजीने कहा – हे ऋषियो ! मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजीकी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शङ्खभृगु और शम्भुकी पूजा करे। दक्षिण तथा पूर्व दिशामें भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा करनी चाहिये।
मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कुबेरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुगण तथा विष्वक्सेनकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके परिवारकी अर्चना करे। मण्डलके मध्यमें शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशालक एवं ऐश्वर्यकी पूजा करे। ‘गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’-यह गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्नजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी चाहिये।
साथ ही श्रीगोपालके ढाल, चक्र, गदा, पद्म, मूसल, खड्ग, पाश, अङ्कुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकी भी अर्चना करनी चाहिये।
गोपीजनवल्लभाय नमः मन्त्रसे जपके तथा उनका ध्यान करने एवं उनकी (सद्भावना) पूजा करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है।
त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं –
‘ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।’ – ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले हैं।
श्रीसूतजी पुनः बोले – अब मैं श्रीधर भगवान् (विष्णु) – की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ।
साधकको सर्वप्रथम ‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट्, ॐ ऐं कवचाय हुम्, ॐ औं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ अः अस्त्राय फट्’ – इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवान्को शङ्ख, चक्र, गदाकमलपिञ्छी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आम्रपल्लव श्रीधर भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ श्रीपरात्परदेवता आगच्छस्व’ इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ॐ समस्तपरिवारायस्त्वागतासनाय नमः’, ‘ॐ धात्रे नमः’, ‘ॐ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ॐ पद्मायै नमः’, ‘ॐ आधारशक्तये नमः’, ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ पृथिव्यै नमः’, ‘ॐ धर्माय नमः’, ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, ‘ॐ अधर्माय नमः’, ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, ‘ॐ अवैराग्याय नमः’, ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’, ‘ॐ कन्दायनमः’, ‘ॐ नालाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’, ‘ॐ प्रह्वयै नमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘ॐ ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’- इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके (हे रुद्र!) पूर्वादि धाता, विधाता, गङ्गा आदि देवोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हरिका आवाहन करके पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ ह्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः आगच्छ!’– इस मन्त्रसे श्रीधरदेवका आवाहन तथा पूजन करना चाहिये।
इस पूजाके पश्चात् ‘ॐ श्रियै नमः’ – इस मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। ‘ॐ आं हृदयाय नमः’, ‘ॐ श्रीं शिरसे नमः’, ‘ॐ गूं शिखायै नमः’, ‘ॐ ऐं कवचाय नमः’, ‘ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ अः अस्त्राय नमः’, ‘ॐ गरुडाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ शार्ङ्गयै नमः’, ‘ॐ श्रीवत्सा नमः’, ‘ॐ कौस्तुभाय नमः’, ‘ॐ वनमालायै नमः’, ‘ॐ पीताम्बराय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ नारदाय नमः’, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ वास्ताय नमः’, ‘ॐ रजसे नमः’, ‘ॐ तमसे नमः’, ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’ – इत्यादि मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देव-परिवारकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर सपरिकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके प्रदक्षिणा करे। मूल मन्त्रको जप १०८ बार करे और किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित कर दे।
तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्तभर अपने हृदयदेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिवान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभावशाली, प्रसन्नमुख, सौम्य मुद्रावाले, चमकते हुए धवल-मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित, सिरपर मुकुटको धारण किये हुए, शुभलक्षणसम्पन्न अङ्गोंवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेवका ध्यान करे।
उसके बाद इन स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति करनी चाहिये–
श्रीनिवासय देवाय नमः श्रीपतये नमः।श्रीधराय सशाङ्गाय श्रीप्रदाय नमो नमः॥श्रीवल्लभाय शान्ताय श्रीमते च नमो नमः।श्रीपतेर्वासिताय नमः श्रेयस्कराय नमः॥श्रेयसे चेश यज्ञानाय नमो नमः।नमः श्रेयस्कराय श्रीकराय नमो नमः॥शरण्याय वरेण्याय नमो भूयो नमो नमः।स्तोत्रं कृत्वा नमस्कृत्य देवदेवं विसर्जयेत्॥इति यः सम्प्रकुर्याच्च पूजां विष्णोर्महात्मनः।यः करोति महाभक्त्या स याति परमां पदम्॥ (३०। २५-२९)
‘ॐ ह्रीं श्रीं श्रीधराय विष्णवे नमः।’ – यह मन्त्र देवाधिदेव परमेश्वर विष्णुका वाचक है। यह समस्त दोनोंको हरण करनेवाला तथा सभी ग्रहोंका शमनकर्ता है। यह सर्वपापविनाशक और भुक्ति-मुक्ति प्रदायक है।
साधकको इन मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास करना चाहिये-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।’
आत्मज्ञानी साधकको चाहिये कि वह अङ्गन्यास करके आत्ममुद्रा प्रदर्शित करे। तदनन्तर हृदयगुहामें विराजमान शङ्ख-चक्रसे युक्त, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमाके समान शुभ कान्तिवाले, श्रीवत्स और कौस्तुभमणिसे समन्वित, वनमाला तथा रत्नाकर धारण किये हुए परमेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान करे।
तदनन्तर ‘विष्णुमण्डलमें अवस्थित होनेवाले आप सभी देवगणों, पार्षदोंने तथा शक्तियोंका मैं आवाहन करता हूँ, यहाँपर आप सब पधारें’ – ऐसा कहकर-
‘ॐ समस्तपरिवारसहितायगताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ गङ्गायै नमः, ॐ यमुनायै नमः, ॐ शङ्खनिधये नमः, ॐ पद्मनिधये नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ प्रचण्डाय नमः, ॐ श्रीधरायै नमः, ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ कं कन्दायनमः, ॐ नं नालाय नमः, ॐ लां पद्माय नमः, ॐ अं अर्धमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ क्रियायै नमः, ॐ उत्कर्षिण्यै नमः, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ योगायै नमः, ॐ प्रह्वयै नमः, ॐ सत्यायै नमः, ॐ ईशानायै नमः, ॐ अनुग्रहायै नमः’ – इन नाममन्त्रोंसे गन्ध-पुष्पादि उपचारोंके द्वारा धाता, विधाता, गङ्गा, यमुना आदि देवताओंका नमस्कारपूर्वक पूजन करना चाहिये।
तदनन्तर हे रुद्र! सृष्टि तथा संहार करनेवाले, सभी पापोंको दूर करनेवाले परमेश्वर, भगवान् विष्णुका मण्डलमें आवाहन करके इस विधिसे उनका पूजन करना चाहिये।
इस प्रकार सर्वप्रथम अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी प्रकार प्रतिमामें भी सर्वप्रथम न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मुद्राका प्रदर्शनकर अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंको अर्पण करना चाहिये। उसके बाद स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यरूपमें चर्च अर्पित करके उन देवको प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर उनके मन्त्रका जप करके इस जप-पूजनको उन्हें ही समर्पित कर देना चाहिये।
हे वृषध्वज! उन श्रीधरदेवकी पूजा उनके मूल मन्त्रसे करनी चाहिये। हे जितेन्द्र ! इस समय मैं उन मन्त्रोंको भी कह रहा हूँ, जिनसे न्यास तथा विष्णुके परिवार, दिवेदला और आयुध आदिकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें आप सुनें-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे नमः, ॐ हूं शिखायै नमः, ॐ हैं कवचाय नमः, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ ह्रः अस्त्राय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ गरुडाय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ श्रीवत्साय नमः, ॐ कौस्तुभाय नमः, ॐ वनमालाय नमः, ॐ पीताम्बराय नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ मुसलाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ अङ्कुशाय नमः, ॐ शार्ङ्गयै नमः, ॐ वराय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ वायुदेवेभ्यो नमः, ॐ गुरुभ्यो नमः, ॐ परमगुरुभ्यो नमः, ॐ इन्द्राय सुराधिपतये स्वाहाऽग्नये स्वाहा परिवाराय नमः, ॐ यमाय प्रेताधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वरुणाय जलाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वायवे प्राणाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ सोमाय नक्षत्राधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ ईशानाय विद्याधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ अनन्ताय नागाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ ब्रह्मणे लोकाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वज्राय हुं फट् नमः, ॐ शक्तये हुं फट् नमः, ॐ दण्डाय हुं फट् नमः, ॐ खड्गाय हुं फट्, ॐ पाशाय हुं फट् नमः, ॐ ध्वजाय हुं फट् नमः, ॐ गदायै हुं फट् नमः, ॐ त्रिशूलाय हुं फट् नमः, ॐ पद्माय हुं फट् नमः, ॐ चक्राय हुं फट् नमः, तथा ॐ श्रीं विष्णवेऽस्त्राय नमः।’
हे महादेव! इस प्रकार इन मन्त्रोंसे अधिकारी मनुष्यको चाहिये कि वे विष्णुके विभिन्न अङ्गोंकी पूजा करें, तदनन्तर अष्टस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिसे उन अविनाशी परमात्मा प्रभुका स्तवन करें-
विश्वायै देवदेवाय नमो वै प्रभविष्णवे॥विश्वायै वासुदेवाय नमः स्थितिकराय च।प्रसिद्धायै नमस्तेऽस्तु नमः प्रलयकारिणे॥देवानां प्रभवे चैव यज्ञानां प्रभवे नमः।मुनीनां प्रभवे नित्यं यज्ञानां प्रभविष्णवे॥विश्वायै सर्वदेवाय सर्वज्ञाय महात्मने।बहून्येकरूपाय सर्वरूपाय नमो नमः॥सर्वलोकहितार्थाय लोकनाथाय वै नमः।सर्वज्ञत्वे सर्वकर्त्रे सर्वबुद्धिप्रदायिने॥वरप्रदाय शान्ताय वरेण्याय नमो नमः।शरण्याय सूक्ष्माय धर्माकामार्थदायिने॥ (३१। २४-२९)
देवाधिदेव, तेजोमूर्ति भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार है। संसारकी स्थिति (पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके लिये नमन है। प्रलयके समग्र संसारको अपने मूल कारण प्रकृतिमें लीन करके आत्मसाक्षात्कार करनेवाले विष्णुको प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको नमन है। मुनियों तथा यज्ञोंके प्रभु और समस्त देवोंपर विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, ब्रह्मा, इन्द्र-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके लिये नमस्कार है।
समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले, लोकधामज्ञ, सर्वगन्ता, सर्वज्ञता तथा समत्व दृष्टिके विनाशक भगवान् विष्णुके लिये नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म-काम तथा अर्थ- इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके लिये बार-बार प्रणाम है।
हे शङ्कर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अक्षय, परात्पर भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमें उनका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे उन विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहिये। जो अधिकारी व्यक्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। हे रुद्र! इस प्रकार मैंने आपसे इस रहस्यपूर्ण, परम गुह्य, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णुकी पूजाविधिको कहा है। हे शङ्कर! जो विद्वान् पुरुष इसका पाठ करता है, वह विष्णुभक्त हो जाता है। इसे जो सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है।
श्रीधर-पूजनविधि
श्रीसूतजीने कहा – हे ऋषियो ! मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजीकी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शङ्खभृगु और शम्भुकी पूजा करे। दक्षिण तथा पूर्व दिशामें भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा करनी चाहिये।
मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कुबेरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुगण तथा विष्वक्सेनकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके परिवारकी अर्चना करे। मण्डलके मध्यमें शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशालक एवं ऐश्वर्यकी पूजा करे। ‘गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’-यह गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्नजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी चाहिये।
साथ ही श्रीगोपालके ढाल, चक्र, गदा, पद्म, मूसल, खड्ग, पाश, अङ्कुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकी भी अर्चना करनी चाहिये।
गोपीजनवल्लभाय नमः मन्त्रसे जपके तथा उनका ध्यान करने एवं उनकी (सद्भावना) पूजा करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है।
त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं –
‘ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।’ – ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले हैं।
श्रीसूतजी पुनः बोले – अब मैं श्रीधर भगवान् (विष्णु) – की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ।
साधकको सर्वप्रथम ‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट्, ॐ ऐं कवचाय हुम्, ॐ औं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ अः अस्त्राय फट्’ – इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवान्को शङ्ख, चक्र, गदाकमलपिञ्छी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आम्रपल्लव श्रीधर भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ श्रीपरात्परदेवता आगच्छस्व’ इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ॐ समस्तपरिवारायस्त्वागतासनाय नमः’, ‘ॐ धात्रे नमः’, ‘ॐ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ॐ पद्मायै नमः’, ‘ॐ आधारशक्तये नमः’, ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ पृथिव्यै नमः’, ‘ॐ धर्माय नमः’, ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, ‘ॐ अधर्माय नमः’, ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, ‘ॐ अवैराग्याय नमः’, ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’, ‘ॐ कन्दायनमः’, ‘ॐ नालाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’, ‘ॐ प्रह्वयै नमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘ॐ ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’- इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके (हे रुद्र!) पूर्वादि धाता, विधाता, गङ्गा आदि देवोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हरिका आवाहन करके पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ ह्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः आगच्छ!’– इस मन्त्रसे श्रीधरदेवका आवाहन तथा पूजन करना चाहिये।
इस पूजाके पश्चात् ‘ॐ श्रियै नमः’ – इस मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। ‘ॐ आं हृदयाय नमः’, ‘ॐ श्रीं शिरसे नमः’, ‘ॐ गूं शिखायै नमः’, ‘ॐ ऐं कवचाय नमः’, ‘ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ अः अस्त्राय नमः’, ‘ॐ गरुडाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ शार्ङ्गयै नमः’, ‘ॐ श्रीवत्सा नमः’, ‘ॐ कौस्तुभाय नमः’, ‘ॐ वनमालायै नमः’, ‘ॐ पीताम्बराय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ नारदाय नमः’, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ वास्ताय नमः’, ‘ॐ रजसे नमः’, ‘ॐ तमसे नमः’, ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’ – इत्यादि मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देव-परिवारकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर सपरिकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके प्रदक्षिणा करे। मूल मन्त्रको जप १०८ बार करे और किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित कर दे।
तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्तभर अपने हृदयदेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिवान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभावशाली, प्रसन्नमुख, सौम्य मुद्रावाले, चमकते हुए धवल-मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित, सिरपर मुकुटको धारण किये हुए, शुभलक्षणसम्पन्न अङ्गोंवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेवका ध्यान करे।
उसके बाद इन स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति करनी चाहिये–
श्रीनिवासय देवाय नमः श्रीपतये नमः।श्रीधराय सशाङ्गाय श्रीप्रदाय नमो नमः॥श्रीवल्लभाय शान्ताय श्रीमते च नमो नमः।श्रीपतेर्वासिताय नमः श्रेयस्कराय नमः॥श्रेयसे चेश यज्ञानाय नमो नमः।नमः श्रेयस्कराय श्रीकराय नमो नमः॥शरण्याय वरेण्याय नमो भूयो नमो नमः।स्तोत्रं कृत्वा नमस्कृत्य देवदेवं विसर्जयेत्॥इति यः सम्प्रकुर्याच्च पूजां विष्णोर्महात्मनः।यः करोति महाभक्त्या स याति परमां पदम्॥ (३०। २५-२९)
‘ॐ ह्रीं श्रीं श्रीधराय विष्णवे नमः।’ – यह मन्त्र देवाधिदेव परमेश्वर विष्णुका वाचक है। यह समस्त दोनोंको हरण करनेवाला तथा सभी ग्रहोंका शमनकर्ता है। यह सर्वपापविनाशक और भुक्ति-मुक्ति प्रदायक है।
साधकको इन मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास करना चाहिये-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।’
आत्मज्ञानी साधकको चाहिये कि वह अङ्गन्यास करके आत्ममुद्रा प्रदर्शित करे। तदनन्तर हृदयगुहामें विराजमान शङ्ख-चक्रसे युक्त, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमाके समान शुभ कान्तिवाले, श्रीवत्स और कौस्तुभमणिसे समन्वित, वनमाला तथा रत्नाकर धारण किये हुए परमेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान करे।
तदनन्तर ‘विष्णुमण्डलमें अवस्थित होनेवाले आप सभी देवगणों, पार्षदोंने तथा शक्तियोंका मैं आवाहन करता हूँ, यहाँपर आप सब पधारें’ – ऐसा कहकर-
‘ॐ समस्तपरिवारसहितायगताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ गङ्गायै नमः, ॐ यमुनायै नमः, ॐ शङ्खनिधये नमः, ॐ पद्मनिधये नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ प्रचण्डाय नमः, ॐ श्रीधरायै नमः, ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ कं कन्दायनमः, ॐ नं नालाय नमः, ॐ लां पद्माय नमः, ॐ अं अर्धमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ क्रियायै नमः, ॐ उत्कर्षिण्यै नमः, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ योगायै नमः, ॐ प्रह्वयै नमः, ॐ सत्यायै नमः, ॐ ईशानायै नमः, ॐ अनुग्रहायै नमः’ – इन नाममन्त्रोंसे गन्ध-पुष्पादि उपचारोंके द्वारा धाता, विधाता, गङ्गा, यमुना आदि देवताओंका नमस्कारपूर्वक पूजन करना चाहिये।
तदनन्तर हे रुद्र! सृष्टि तथा संहार करनेवाले, सभी पापोंको दूर करनेवाले परमेश्वर, भगवान् विष्णुका मण्डलमें आवाहन करके इस विधिसे उनका पूजन करना चाहिये।
इस प्रकार सर्वप्रथम अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी प्रकार प्रतिमामें भी सर्वप्रथम न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मुद्राका प्रदर्शनकर अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंको अर्पण करना चाहिये। उसके बाद स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यरूपमें चर्च अर्पित करके उन देवको प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर उनके मन्त्रका जप करके इस जप-पूजनको उन्हें ही समर्पित कर देना चाहिये।
हे वृषध्वज! उन श्रीधरदेवकी पूजा उनके मूल मन्त्रसे करनी चाहिये। हे जितेन्द्र ! इस समय मैं उन मन्त्रोंको भी कह रहा हूँ, जिनसे न्यास तथा विष्णुके परिवार, दिवेदला और आयुध आदिकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें आप सुनें-
‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे नमः, ॐ हूं शिखायै नमः, ॐ हैं कवचाय नमः, ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ ह्रः अस्त्राय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ गरुडाय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ श्रीवत्साय नमः, ॐ कौस्तुभाय नमः, ॐ वनमालाय नमः, ॐ पीताम्बराय नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ मुसलाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ अङ्कुशाय नमः, ॐ शार्ङ्गयै नमः, ॐ वराय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ वायुदेवेभ्यो नमः, ॐ गुरुभ्यो नमः, ॐ परमगुरुभ्यो नमः, ॐ इन्द्राय सुराधिपतये स्वाहाऽग्नये स्वाहा परिवाराय नमः, ॐ यमाय प्रेताधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वरुणाय जलाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वायवे प्राणाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ सोमाय नक्षत्राधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ ईशानाय विद्याधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ अनन्ताय नागाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ ब्रह्मणे लोकाधिपतये स्वाहाऽग्नये परिवाराय नमः, ॐ वज्राय हुं फट् नमः, ॐ शक्तये हुं फट् नमः, ॐ दण्डाय हुं फट् नमः, ॐ खड्गाय हुं फट्, ॐ पाशाय हुं फट् नमः, ॐ ध्वजाय हुं फट् नमः, ॐ गदायै हुं फट् नमः, ॐ त्रिशूलाय हुं फट् नमः, ॐ पद्माय हुं फट् नमः, ॐ चक्राय हुं फट् नमः, तथा ॐ श्रीं विष्णवेऽस्त्राय नमः।’
हे महादेव! इस प्रकार इन मन्त्रोंसे अधिकारी मनुष्यको चाहिये कि वे विष्णुके विभिन्न अङ्गोंकी पूजा करें, तदनन्तर अष्टस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिसे उन अविनाशी परमात्मा प्रभुका स्तवन करें-
विश्वायै देवदेवाय नमो वै प्रभविष्णवे॥विश्वायै वासुदेवाय नमः स्थितिकराय च।प्रसिद्धायै नमस्तेऽस्तु नमः प्रलयकारिणे॥देवानां प्रभवे चैव यज्ञानां प्रभवे नमः।मुनीनां प्रभवे नित्यं यज्ञानां प्रभविष्णवे॥विश्वायै सर्वदेवाय सर्वज्ञाय महात्मने।बहून्येकरूपाय सर्वरूपाय नमो नमः॥सर्वलोकहितार्थाय लोकनाथाय वै नमः।सर्वज्ञत्वे सर्वकर्त्रे सर्वबुद्धिप्रदायिने॥वरप्रदाय शान्ताय वरेण्याय नमो नमः।शरण्याय सूक्ष्माय धर्माकामार्थदायिने॥ (३१। २४-२९)
देवाधिदेव, तेजोमूर्ति भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार है। संसारकी स्थिति (पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके लिये नमन है। प्रलयके समग्र संसारको अपने मूल कारण प्रकृतिमें लीन करके आत्मसाक्षात्कार करनेवाले विष्णुको प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको नमन है। मुनियों तथा यज्ञोंके प्रभु और समस्त देवोंपर विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, ब्रह्मा, इन्द्र-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके लिये नमस्कार है।
समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले, लोकधामज्ञ, सर्वगन्ता, सर्वज्ञता तथा समत्व दृष्टिके विनाशक भगवान् विष्णुके लिये नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म-काम तथा अर्थ- इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके लिये बार-बार प्रणाम है।
हे शङ्कर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अक्षय, परात्पर भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमें उनका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे उन विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहिये। जो अधिकारी व्यक्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। हे रुद्र! इस प्रकार मैंने आपसे इस रहस्यपूर्ण, परम गुह्य, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णुकी पूजाविधिको कहा है। हे शङ्कर! जो विद्वान् पुरुष इसका पाठ करता है, वह विष्णुभक्त हो जाता है। इसे जो सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: पूजन विधि