वास्तुमण्डल-पूजाविधि
श्रीहरि ने कहा—गृहनिर्माण के प्रारम्भ में जिसके करने से समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। संक्षेप में उस वास्तुपूजा की विधि कहता हूँ, यह पूजा ईशानकोण से प्रारम्भ होकर इक्यासी पदवाले मण्डल के अन्तर्गत पूर्ण की जानी चाहिये।
इस मण्डल के ईशानकोण में वास्तुदेवता का मस्तक होता है। नैर्ऋत्यकोण में उनके दोनों पाद तथा अग्नि और वायव्यकोण में दोनों हाथ होते हैं। आवास अर्थात् भवन, गृह आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिकपथ, प्रासाद, उद्यान, दुर्ग, देवालय तथा मठ आदि के निर्माण में वास्तुदेवता के स्थापन पूर्वक पूजा करनी चाहिये। वास्तु’ देवता ब्राह्मभाग में तथा तेरह देवता अन्तःभाग में अवस्थित रहते हैं।
यथा—ईश, शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशाद्रुष, सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश, वायु, पूषा, वितथ, गृहक्षेत्र, यम, गन्धर्व, भृगराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहिप्रमुख, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति तथा दिति–ये वास्तुमण्डल के बाह्य देव हैं।
—इन बाह्य देवों का पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह ईशानादि चारों कोणों पर स्थित देवताओं की पूजा करे। यथा—ईशानकोण में आप (जल), अग्निकोण में सावित्री, नैर्ऋत्यकोण में जय और वायव्यकोण में रुद्रदेव की पूजा करे। नवपद परिमाण के मध्य में ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओं का भी पूजन करे। पूर्वादि क्रम से उन पूजनीय देवों के नाम इस प्रकार हैं—
अर्थमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर और अपवत्स—ये आठ देव हैं, जो ब्रह्मा के चारों ओर मण्डलाकार स्थित हैं।
दुर्गादिक्रम में ईशानकोण से नैर्ऋत्यकोण पर्यन्त सूत्र द्वारा खिंचा गया रेखाद्वय वंश कहा जाता है और अग्निकोण से जब वायव्यकोण पर्यन्त दूसरी रेखा खींची जाती है तो वह वंश-रेखा, दुर्धर-रेखा कहलाती है। वंश-रेखा पर ईशानकोण में अदिति, दुर्गाभोग विन्दूपर हिमवान्, नैर्ऋत्यकोण अर्थात् वास्तुमण्डल के अन्तिम नैर्ऋत्य बिन्दू पर जयन्त के पुत्र नाका विधान है। तत्पश्चात् दुर्धर-रेखा के प्रारम्भ में अग्निकोण पर नायिका तथा अन्तिम छोर वायव्यकोण पर कालिकादेवी की पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्र से लेकर गर्गपर्यन्त उन वास्तुदेवों की पूजा करके भवन-निर्माण का कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।
कालु (भवन)-के सम्मुख-भाग में देवालय, अग्निकोण में पाकशाला, पूर्व दिशा में सूत्र-मण्डप, ईशानकोण में काष्ठ या प्रस्तर से बनी पट्टिकाओं के द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों तथा पुष्पों को रखने का स्थान, उत्तर दिशा में भाण्डारगार, वायव्यकोण में गोशाला, पश्चिम दिशा में छिड़की तथा जलाशय, नैर्ऋत्यकोण में सन्निधि, कुरङ्ग, ईंधन तथा अस्त्र-शस्त्र का कक्ष, दक्षिण दिशा में सूत्र-मण्डप, अस्त्र, पादुका, जल, अग्नि, दीप और स्रजन घृतों से युक्त अतिथि गृह का निर्माण करना चाहिये।
गृह के बीच समस्त रिक्भाग में कूप, जलसिञ्चित कदलीगृह और पाँच प्रकार के पुष्पवाटिका को सुनिर्योजित करे। भवन के बाह्य भाग में चारों ओर पाँच हाथ ऊँची दीवाल बनाकर वन और उपवन से आच्छादित भगवान् विष्णु का मन्दिर बनाना चाहिये।
इस मन्दिर के निर्माणकाल के प्रारम्भ में चौंसठ पद का वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेव की विधि से पूजा करे। उक्त रीति के अनुसार वास्तुमण्डल के मध्य भाग में चार पद के मण्डलान्तर्गत ब्रह्मा तथा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो पद पर अर्यमादि आठ देवों की पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर कर्णभाग पर कार्पटिक्य आदिका पूजन करके, दोनों ओर पार्श्व विन्दुओं पर दो-दो पदों की दूरी से स्थित अन्य पार्श्व देवों का पूजन करे। तत्पश्चात् वास्तुमण्डल के ईशानादि कोणों पर क्रमशः चरकी, विदारी, पूतना और पापराक्षसी नामक देवियों की पूजा करनी चाहिये। उसके बाद बाह्य भाग में इन्द्रादि देवों का पूजन करे।
इनके नाम हेंतुका, त्रिपुरातक, अग्नि, वैतल, यम, अग्निजिह्वा, कालक, करल और एकपाद हैं। उनकी पूजा करने के पश्चात् ईशानकोण में भीमरूप, पाताल में प्रेतनायक, आकाश में गन्धमाली तथा उसके बाद क्षेत्रपाल देवों की पूजा करनी चाहिये। यथासाथ्य वस्तु संकुचित या विस्तृत क्षेत्र फल की राशि को वस्तुओं की संख्या अर्थात् आठ से पहले भाग दे, उसके बचे हुए शेष भाग को यम मन। पुनः उक्त वास्तु राशि की आठ से गुणा करे, जो गुणनफल हो उसकी ब्रह्म भाग अर्थात् सत्ताईस से भाग दे, जो शेष हो उसे ब्रह्म या नक्षत्राशि कहते हैं और जो भागफल है, वह अभ्यय कहलाता है।
उस ब्रह्मराशि को चार से गुणा करके गुणनफल में नौ से भाग दे, जो शेषराशि हो उसका नाम स्थिति है। इसी स्थिति के अनुसार वास्तुमण्डल का निर्माण करना चाहिये। ऐसा देवल ऋषिका अभिमत है।
उक्त वास्तु राशि को आठ से गुणा करके जो गुणनफल हो उसे पिण्ड कहते हैं। उस पिण्ड को साठ से भाग देना चाहिये, जो शेष हो हो उसके द्वारा गृहस्वामी के जीवन-मरण और परिजनों के विनाश का निर्धारण होता है।
मनुष्य को चाहिये कि वास्तुमण्डल के मध्य में ही सदा गृह का निर्माण करे। उसके पृष्ठभाग में न करे। इसी प्रकार वास्तुमण्डल के वामपार्श्व में भी गृह-निर्माण करना उचित नहीं होता है, क्योंकि वामपार्श्व में वासुदेव सोये रहते हैं। अतः इसमें गृह-निर्माण नहीं करना चाहिये।
सिंह, कन्या तथा तुला राशि रहने पर उत्तर दिशा के द्वार का शोधन करे और उसी प्रकार वृषिकादि अन्य राशियों के रहने पर पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम द्वार का शोधन करना चाहिये (क्योंकि भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक मास में पूर्व दिशा में मस्तक, उत्तर दिशा में पुच्छ, दक्षिण दिशा में क्रोड़ और पश्चिम दिशा में चरण फैलाकर वास्तुनाग सोये रहते हैं। अतः उस द्वार का द्वार इस काल में प्रशस्त होता है। वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि अर्थात् मार्गशीर्ष, पौष और माघ में वास्तुनाग का सिर दक्षिण, पूंछ पूर्व, क्रोड़ पश्चिम और पैर उत्तर दिशा में रहता है। जिससे उस समय पूर्व दिशा का द्वार-शोधन उचित तथा कुलटा होता है। मीन मेष एवं वृषिका अर्थात् फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाख मास में वास्तुनाग का मस्तक पश्चिम, पूंछ दक्षिण तथा पैर उत्तर-पूर्व दिशा में रहता है। अतः दक्षिण दिशा के द्वार का शोधन इस काल में श्रेयस्कर है। इसी प्रकार वृष, मिथुन और कर्क राशि अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़ तथा श्रावण मास में वास्तुनाग का सिर उत्तर, पृष्ठ पश्चिम, क्रोड़ पूर्व और पैर दक्षिण दिशा में रहता है। इस समय पश्चिम द्वार का शोधन करना उचित होता है)।
वास्तु के विस्तार के अनुसार आधे भाग में द्वार का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार आठ दिशाओं में आठ द्वार कहे गये हैं।
यदि उपर्युक्त शास्त्र-सम्मत विधि से द्वार-शोधन नहीं होता है तो हानि होती है।
अतः उपर्युक्त विधि से प्रासाद या भवन का निर्माण करके उसके पूर्व में पीपल, दक्षिण में पाकरूं, पश्चिम में बरगद, उत्तर में गूलर तथा ईशानकोण में सेमल का वृक्ष लगाना चाहिये, जो घर के लिये शुभ-फलदायी होते हैं। इस प्रकार पूजित वास्तु प्रासाद और घर के विनोका नाश करनेवाला होता है।
श्रीहरि ने कहा—गृहनिर्माण के प्रारम्भ में जिसके करने से समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। संक्षेप में उस वास्तुपूजा की विधि कहता हूँ, यह पूजा ईशानकोण से प्रारम्भ होकर इक्यासी पदवाले मण्डल के अन्तर्गत पूर्ण की जानी चाहिये।
इस मण्डल के ईशानकोण में वास्तुदेवता का मस्तक होता है। नैर्ऋत्यकोण में उनके दोनों पाद तथा अग्नि और वायव्यकोण में दोनों हाथ होते हैं। आवास अर्थात् भवन, गृह आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिकपथ, प्रासाद, उद्यान, दुर्ग, देवालय तथा मठ आदि के निर्माण में वास्तुदेवता के स्थापन पूर्वक पूजा करनी चाहिये। वास्तु’ देवता ब्राह्मभाग में तथा तेरह देवता अन्तःभाग में अवस्थित रहते हैं।
यथा—ईश, शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशाद्रुष, सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश, वायु, पूषा, वितथ, गृहक्षेत्र, यम, गन्धर्व, भृगराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहिप्रमुख, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति तथा दिति–ये वास्तुमण्डल के बाह्य देव हैं।
—इन बाह्य देवों का पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह ईशानादि चारों कोणों पर स्थित देवताओं की पूजा करे। यथा—ईशानकोण में आप (जल), अग्निकोण में सावित्री, नैर्ऋत्यकोण में जय और वायव्यकोण में रुद्रदेव की पूजा करे। नवपद परिमाण के मध्य में ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओं का भी पूजन करे। पूर्वादि क्रम से उन पूजनीय देवों के नाम इस प्रकार हैं—
अर्थमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर और अपवत्स—ये आठ देव हैं, जो ब्रह्मा के चारों ओर मण्डलाकार स्थित हैं।
दुर्गादिक्रम में ईशानकोण से नैर्ऋत्यकोण पर्यन्त सूत्र द्वारा खिंचा गया रेखाद्वय वंश कहा जाता है और अग्निकोण से जब वायव्यकोण पर्यन्त दूसरी रेखा खींची जाती है तो वह वंश-रेखा, दुर्धर-रेखा कहलाती है। वंश-रेखा पर ईशानकोण में अदिति, दुर्गाभोग विन्दूपर हिमवान्, नैर्ऋत्यकोण अर्थात् वास्तुमण्डल के अन्तिम नैर्ऋत्य बिन्दू पर जयन्त के पुत्र नाका विधान है। तत्पश्चात् दुर्धर-रेखा के प्रारम्भ में अग्निकोण पर नायिका तथा अन्तिम छोर वायव्यकोण पर कालिकादेवी की पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्र से लेकर गर्गपर्यन्त उन वास्तुदेवों की पूजा करके भवन-निर्माण का कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।
कालु (भवन)-के सम्मुख-भाग में देवालय, अग्निकोण में पाकशाला, पूर्व दिशा में सूत्र-मण्डप, ईशानकोण में काष्ठ या प्रस्तर से बनी पट्टिकाओं के द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों तथा पुष्पों को रखने का स्थान, उत्तर दिशा में भाण्डारगार, वायव्यकोण में गोशाला, पश्चिम दिशा में छिड़की तथा जलाशय, नैर्ऋत्यकोण में सन्निधि, कुरङ्ग, ईंधन तथा अस्त्र-शस्त्र का कक्ष, दक्षिण दिशा में सूत्र-मण्डप, अस्त्र, पादुका, जल, अग्नि, दीप और स्रजन घृतों से युक्त अतिथि गृह का निर्माण करना चाहिये।
गृह के बीच समस्त रिक्भाग में कूप, जलसिञ्चित कदलीगृह और पाँच प्रकार के पुष्पवाटिका को सुनिर्योजित करे। भवन के बाह्य भाग में चारों ओर पाँच हाथ ऊँची दीवाल बनाकर वन और उपवन से आच्छादित भगवान् विष्णु का मन्दिर बनाना चाहिये।
इस मन्दिर के निर्माणकाल के प्रारम्भ में चौंसठ पद का वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेव की विधि से पूजा करे। उक्त रीति के अनुसार वास्तुमण्डल के मध्य भाग में चार पद के मण्डलान्तर्गत ब्रह्मा तथा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो पद पर अर्यमादि आठ देवों की पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर कर्णभाग पर कार्पटिक्य आदिका पूजन करके, दोनों ओर पार्श्व विन्दुओं पर दो-दो पदों की दूरी से स्थित अन्य पार्श्व देवों का पूजन करे। तत्पश्चात् वास्तुमण्डल के ईशानादि कोणों पर क्रमशः चरकी, विदारी, पूतना और पापराक्षसी नामक देवियों की पूजा करनी चाहिये। उसके बाद बाह्य भाग में इन्द्रादि देवों का पूजन करे।
इनके नाम हेंतुका, त्रिपुरातक, अग्नि, वैतल, यम, अग्निजिह्वा, कालक, करल और एकपाद हैं। उनकी पूजा करने के पश्चात् ईशानकोण में भीमरूप, पाताल में प्रेतनायक, आकाश में गन्धमाली तथा उसके बाद क्षेत्रपाल देवों की पूजा करनी चाहिये। यथासाथ्य वस्तु संकुचित या विस्तृत क्षेत्र फल की राशि को वस्तुओं की संख्या अर्थात् आठ से पहले भाग दे, उसके बचे हुए शेष भाग को यम मन। पुनः उक्त वास्तु राशि की आठ से गुणा करे, जो गुणनफल हो उसकी ब्रह्म भाग अर्थात् सत्ताईस से भाग दे, जो शेष हो उसे ब्रह्म या नक्षत्राशि कहते हैं और जो भागफल है, वह अभ्यय कहलाता है।
उस ब्रह्मराशि को चार से गुणा करके गुणनफल में नौ से भाग दे, जो शेषराशि हो उसका नाम स्थिति है। इसी स्थिति के अनुसार वास्तुमण्डल का निर्माण करना चाहिये। ऐसा देवल ऋषिका अभिमत है।
उक्त वास्तु राशि को आठ से गुणा करके जो गुणनफल हो उसे पिण्ड कहते हैं। उस पिण्ड को साठ से भाग देना चाहिये, जो शेष हो हो उसके द्वारा गृहस्वामी के जीवन-मरण और परिजनों के विनाश का निर्धारण होता है।
मनुष्य को चाहिये कि वास्तुमण्डल के मध्य में ही सदा गृह का निर्माण करे। उसके पृष्ठभाग में न करे। इसी प्रकार वास्तुमण्डल के वामपार्श्व में भी गृह-निर्माण करना उचित नहीं होता है, क्योंकि वामपार्श्व में वासुदेव सोये रहते हैं। अतः इसमें गृह-निर्माण नहीं करना चाहिये।
सिंह, कन्या तथा तुला राशि रहने पर उत्तर दिशा के द्वार का शोधन करे और उसी प्रकार वृषिकादि अन्य राशियों के रहने पर पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम द्वार का शोधन करना चाहिये (क्योंकि भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक मास में पूर्व दिशा में मस्तक, उत्तर दिशा में पुच्छ, दक्षिण दिशा में क्रोड़ और पश्चिम दिशा में चरण फैलाकर वास्तुनाग सोये रहते हैं। अतः उस द्वार का द्वार इस काल में प्रशस्त होता है। वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि अर्थात् मार्गशीर्ष, पौष और माघ में वास्तुनाग का सिर दक्षिण, पूंछ पूर्व, क्रोड़ पश्चिम और पैर उत्तर दिशा में रहता है। जिससे उस समय पूर्व दिशा का द्वार-शोधन उचित तथा कुलटा होता है। मीन मेष एवं वृषिका अर्थात् फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाख मास में वास्तुनाग का मस्तक पश्चिम, पूंछ दक्षिण तथा पैर उत्तर-पूर्व दिशा में रहता है। अतः दक्षिण दिशा के द्वार का शोधन इस काल में श्रेयस्कर है। इसी प्रकार वृष, मिथुन और कर्क राशि अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़ तथा श्रावण मास में वास्तुनाग का सिर उत्तर, पृष्ठ पश्चिम, क्रोड़ पूर्व और पैर दक्षिण दिशा में रहता है। इस समय पश्चिम द्वार का शोधन करना उचित होता है)।
वास्तु के विस्तार के अनुसार आधे भाग में द्वार का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार आठ दिशाओं में आठ द्वार कहे गये हैं।
यदि उपर्युक्त शास्त्र-सम्मत विधि से द्वार-शोधन नहीं होता है तो हानि होती है।
अतः उपर्युक्त विधि से प्रासाद या भवन का निर्माण करके उसके पूर्व में पीपल, दक्षिण में पाकरूं, पश्चिम में बरगद, उत्तर में गूलर तथा ईशानकोण में सेमल का वृक्ष लगाना चाहिये, जो घर के लिये शुभ-फलदायी होते हैं। इस प्रकार पूजित वास्तु प्रासाद और घर के विनोका नाश करनेवाला होता है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: वास्तु एवं गृहनिर्माण