भगवान् विष्णु के कौन-कौन से अवतार हैं और उनकी महिमा क्या है?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अथ भगवान् विष्णु की महिमा तथा उनके अवतारों का वर्णन
नारायण को नमस्कार करते हुए नैमिषारण्य में महर्षिगण सूतजी से पूछते हैं कि ये संसार कौन हैं, इनके पालक और संहारक कौन हैं? किनके द्वारा धर्म की मर्यादा प्रतिष्ठित होती है और दुष्टों का विनाशक कौन है? उन देवों का क्या स्वरूप है? किस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई है, ईश्वर कौन हैं और जिस रहस्य को जानकर मनुष्य अनायास ही तर जाता है, वह कौन-सा ज्ञानस्वरूप है? वेद, शास्त्रों, मत-मतान्तरों, आदि एवं पाञ्चरात्रों के द्वारा भली-भाँति प्रतिष्ठित, समस्त इन्द्रियों के अधिष्ठाता और सभी प्राणियों के हितैषी तथा माया से परे, उन सर्वव्यापक, परम पवित्र, मङ्गलमय, और अद्वय भगवान् श्रीहरि की वन्दना करनी चाहिए। मन, वाणी और कर्मों से विष्णु, शिव, ब्रह्मा, गणेश तथा देवी सरस्वती को सदा नमस्कार करना चाहिए।
एक बार सर्वव्यापकरूप, पूर्णशक्ति वाले, शान्ति-सहित महात्मा सूतजी तीर्थयात्रा करके नैमिषारण्य आए और एक पवित्र आसन पर स्थित होकर भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगे। इसी काल में तपस्वीजनों ने उनके दर्शन करके नैमिषारण्यवासियों के साथ उनकी पूजा और स्तुति करते हुए यह निवेदन किया कि- “सूतजी! आप तो सब कुछ जानते हैं, इसलिए हम सब आपसे पूछते हैं कि देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देव कौन हैं, ईश्वर कौन हैं और पूज्य कौन हैं? ध्यान करने योग्य कौन हैं? इस जगत् के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक कौन हैं? किनके द्वारा यह (सनातन) धर्म प्रतिष्ठित होता है और दुष्टों के विनाशक कौन हैं?”
इन प्रश्नों को सुनकर महामति सूतजी बोले कि इस गरुडमहापुराण में भगवान् श्रीहरि के चौबीस अवतारों का वर्णन किया गया है, जो सारभूत है और भगवान् विष्णु की कथाओं से परिपूर्ण है। प्राचीन काल में, यह पुराण श्रीगरुड ने कश्यप ऋषि को सुनाया था और मैंने इसे व्यासजी से सुना था। श्रीहरि ही इस जगत् के देवता हैं। वे ही परमात्मा एवं परात्पर हैं। उन्हीं से इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार की क्रियाएँ होती हैं। वे जरा-मरण से रहित हैं।
भगवान् श्रीहरि दुष्टों को दण्ड देने और जगत् को सन्तुलित रखने आदि अनेक कार्यों के लिए समय-समय पर अवतार ग्रहण करते रहे हैं। उनके श्रीविग्रह अवतारों को सुनकर कुमार-संभव तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।
उनका प्रथम अवतार ‘कुमार-संभव’ तथा ‘अखण्ड ब्रह्मचर्य’ धारण करने के रूप में हुआ। दूसरे अवतार में उन्होंने ‘उन्हीं ब्रह्मशक्ति’ का ज्ञान प्रकट किया। तीसरे अवतार में उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए और जगत् के हित के लिए एक ‘वराह’-शरीर को धारण किया। चौथे अवतार में ‘नर-नारायण’ के रूप में अवतरित होकर उन्होंने ‘सनातन धर्म’ का प्रवर्तन किया। पाँचवे अवतार में भगवान् श्रीहरि ने ‘कपिल’-नाम से अवतरित हुए, जो सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ हैं और जिन्होंने काल के प्रभाव से लुप्त हो चुके सांख्यशास्त्र की शिक्षा दी। छठे अवतार में भगवान् ने ‘अत्रि’ ऋषि की पत्नी अनुसूया के गर्भ से ‘दत्तात्रेय’ के रूप में अवतीर्ण होकर ‘यज्ञ’ और ‘योग’ का उपदेश दिया। सातवें अवतार में ‘श्रीव्यास’ भगवान् ने इन्द्रादि देवताओं के साथ यज्ञ का अनुष्ठान किया और इसी उद्देश्य के लिए ‘मनु’ के अन्तर्गत ‘गांगेय’ ऋषि के पुत्ररूप में ‘यज्ञदेव’ नाम से अवतीर्ण हुए। आठवें अवतार में वे ही भगवान् विष्णु ‘नाभि’ एवं ‘मेरुदेवी’ के पुत्ररूप में ‘ऋषभदेव’ नाम से अवतरित हुए। दसवें अवतार में उन्होंने ‘चाक्षुष’ मनु के प्रलय काल में पृथ्वी को नौका बनाकर ‘मत्स्य’ रूप धारण किया। ग्यारहवें अवतार में उन्होंने ‘कच्छप’ अवतार धारण किया। बारहवें अवतार में ‘धन्वन्तरि’ तथा तेरहवें अवतार में ‘मोहिनी’ का रूप ग्रहण किया। चौदहवें अवतार में भगवान् विष्णु ने ‘नृसिंह’ का रूप धारण करके अपने तेज पराक्रम से हिरण्यकशिपु के टुकड़े कर दिए। पंद्रहवें अवतार में उन्होंने ‘वामन’ रूप धारण कर बलि से तीन पग भूमि माँगी। सोलहवें अवतार में उन्होंने ब्राह्मणी शक्ति की अभिवृद्धि हेतु दैत्यों को नष्ट किया और ‘भार्गव’ रूप में अवतार लिया। सत्रहवें अवतार में उन्होंने ‘वेदव्यास’ के नाम से अवतरित होकर मनुष्यों की अल्पज्ञता को जानकर ‘वृक्षों’ के अनेक शाखाओं में विभक्त किया। अठारहवें अवतार में उन्होंने देवताओं के कार्यों को सिद्ध करने के लिए ‘श्रीराम’ नाम से अवतार लिया। उन्नीसवें तथा बीसवें अवतार में ‘बलराम’ और ‘कृष्ण’ के रूप धारण करके पृथ्वी का भार हरण किया। इक्कीसवें अवतार में ‘कल्कि’ का अवतार होगा, जो कलियुग के अन्त में होगा और ‘परशुराम’ का अवतार भी इसी क्रम में मान्य है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अथ भगवान् विष्णु की महिमा तथा उनके अवतारों का वर्णन
नारायण को नमस्कार करते हुए नैमिषारण्य में महर्षिगण सूतजी से पूछते हैं कि ये संसार कौन हैं, इनके पालक और संहारक कौन हैं? किनके द्वारा धर्म की मर्यादा प्रतिष्ठित होती है और दुष्टों का विनाशक कौन है? उन देवों का क्या स्वरूप है? किस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई है, ईश्वर कौन हैं और जिस रहस्य को जानकर मनुष्य अनायास ही तर जाता है, वह कौन-सा ज्ञानस्वरूप है? वेद, शास्त्रों, मत-मतान्तरों, आदि एवं पाञ्चरात्रों के द्वारा भली-भाँति प्रतिष्ठित, समस्त इन्द्रियों के अधिष्ठाता और सभी प्राणियों के हितैषी तथा माया से परे, उन सर्वव्यापक, परम पवित्र, मङ्गलमय, और अद्वय भगवान् श्रीहरि की वन्दना करनी चाहिए। मन, वाणी और कर्मों से विष्णु, शिव, ब्रह्मा, गणेश तथा देवी सरस्वती को सदा नमस्कार करना चाहिए।
एक बार सर्वव्यापकरूप, पूर्णशक्ति वाले, शान्ति-सहित महात्मा सूतजी तीर्थयात्रा करके नैमिषारण्य आए और एक पवित्र आसन पर स्थित होकर भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगे। इसी काल में तपस्वीजनों ने उनके दर्शन करके नैमिषारण्यवासियों के साथ उनकी पूजा और स्तुति करते हुए यह निवेदन किया कि- “सूतजी! आप तो सब कुछ जानते हैं, इसलिए हम सब आपसे पूछते हैं कि देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देव कौन हैं, ईश्वर कौन हैं और पूज्य कौन हैं? ध्यान करने योग्य कौन हैं? इस जगत् के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक कौन हैं? किनके द्वारा यह (सनातन) धर्म प्रतिष्ठित होता है और दुष्टों के विनाशक कौन हैं?”
इन प्रश्नों को सुनकर महामति सूतजी बोले कि इस गरुडमहापुराण में भगवान् श्रीहरि के चौबीस अवतारों का वर्णन किया गया है, जो सारभूत है और भगवान् विष्णु की कथाओं से परिपूर्ण है। प्राचीन काल में, यह पुराण श्रीगरुड ने कश्यप ऋषि को सुनाया था और मैंने इसे व्यासजी से सुना था। श्रीहरि ही इस जगत् के देवता हैं। वे ही परमात्मा एवं परात्पर हैं। उन्हीं से इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार की क्रियाएँ होती हैं। वे जरा-मरण से रहित हैं।
भगवान् श्रीहरि दुष्टों को दण्ड देने और जगत् को सन्तुलित रखने आदि अनेक कार्यों के लिए समय-समय पर अवतार ग्रहण करते रहे हैं। उनके श्रीविग्रह अवतारों को सुनकर कुमार-संभव तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।
उनका प्रथम अवतार ‘कुमार-संभव’ तथा ‘अखण्ड ब्रह्मचर्य’ धारण करने के रूप में हुआ। दूसरे अवतार में उन्होंने ‘उन्हीं ब्रह्मशक्ति’ का ज्ञान प्रकट किया। तीसरे अवतार में उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए और जगत् के हित के लिए एक ‘वराह’-शरीर को धारण किया। चौथे अवतार में ‘नर-नारायण’ के रूप में अवतरित होकर उन्होंने ‘सनातन धर्म’ का प्रवर्तन किया। पाँचवे अवतार में भगवान् श्रीहरि ने ‘कपिल’-नाम से अवतरित हुए, जो सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ हैं और जिन्होंने काल के प्रभाव से लुप्त हो चुके सांख्यशास्त्र की शिक्षा दी। छठे अवतार में भगवान् ने ‘अत्रि’ ऋषि की पत्नी अनुसूया के गर्भ से ‘दत्तात्रेय’ के रूप में अवतीर्ण होकर ‘यज्ञ’ और ‘योग’ का उपदेश दिया। सातवें अवतार में ‘श्रीव्यास’ भगवान् ने इन्द्रादि देवताओं के साथ यज्ञ का अनुष्ठान किया और इसी उद्देश्य के लिए ‘मनु’ के अन्तर्गत ‘गांगेय’ ऋषि के पुत्ररूप में ‘यज्ञदेव’ नाम से अवतीर्ण हुए। आठवें अवतार में वे ही भगवान् विष्णु ‘नाभि’ एवं ‘मेरुदेवी’ के पुत्ररूप में ‘ऋषभदेव’ नाम से अवतरित हुए। दसवें अवतार में उन्होंने ‘चाक्षुष’ मनु के प्रलय काल में पृथ्वी को नौका बनाकर ‘मत्स्य’ रूप धारण किया। ग्यारहवें अवतार में उन्होंने ‘कच्छप’ अवतार धारण किया। बारहवें अवतार में ‘धन्वन्तरि’ तथा तेरहवें अवतार में ‘मोहिनी’ का रूप ग्रहण किया। चौदहवें अवतार में भगवान् विष्णु ने ‘नृसिंह’ का रूप धारण करके अपने तेज पराक्रम से हिरण्यकशिपु के टुकड़े कर दिए। पंद्रहवें अवतार में उन्होंने ‘वामन’ रूप धारण कर बलि से तीन पग भूमि माँगी। सोलहवें अवतार में उन्होंने ब्राह्मणी शक्ति की अभिवृद्धि हेतु दैत्यों को नष्ट किया और ‘भार्गव’ रूप में अवतार लिया। सत्रहवें अवतार में उन्होंने ‘वेदव्यास’ के नाम से अवतरित होकर मनुष्यों की अल्पज्ञता को जानकर ‘वृक्षों’ के अनेक शाखाओं में विभक्त किया। अठारहवें अवतार में उन्होंने देवताओं के कार्यों को सिद्ध करने के लिए ‘श्रीराम’ नाम से अवतार लिया। उन्नीसवें तथा बीसवें अवतार में ‘बलराम’ और ‘कृष्ण’ के रूप धारण करके पृथ्वी का भार हरण किया। इक्कीसवें अवतार में ‘कल्कि’ का अवतार होगा, जो कलियुग के अन्त में होगा और ‘परशुराम’ का अवतार भी इसी क्रम में मान्य है।
ज्ञान विवरण
पुस्तक/ग्रंथ: गरुड़ पुराण
विषय: आचारकाण्ड